बीते पखवाड़े नगालैंड की सत्ताधारी पार्टी- नगा पीपुल्स फ्रंट (एनपीएफ) के विधायक पड़ोसी असम के हरे-भरे काजीरंगा नेशनल पार्क के एक रिजॉर्ट में इकट्‌ठे हुए थे. छह महीने के भीतर यहां आने का उनका यह दूसरा मौका था, लेकिन इसका कारण घूमना-फिरना नहीं बल्कि राज्य की सत्ता में बदलाव था. ऐसे ही पिछली बार ये सभी विधायक फरवरी के महीने में यहां जमा हुए थे. उस वक्त वे राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री टीआर ज़ेलियांग को बाहर कर पार्टी के वरिष्ठ नेता शुरहोज़ेली लिज़ित्सू को सरकार की कमान सौंपने की रणनीति बना रहे थे. इस बार मामला ठीक उल्टा था. यानी ये विधायक लिज़ित्सू की जगह फिर जे़ेलियांग को मुख्यमंत्री बनवाने की कवायद कर रहे थे.

यह बदलाव यूं ही नहीं हुआ था. सूत्र बताते हैं कि ज़ेलियांग ने कुछ समय पहले ही दिल्ली की गुपचुप यात्रा की थी और वहां से लौटते ही एनपीएफ के अधिकांश विधायक उनके समर्थन में लामबंद हो गए. इन बाग़ी विधायकों को भारतीय जनता पार्टी का भी समर्थन मिला हुआ था. इन सभी की मदद से ज़ेलियांग ने बीते बुधवार को फिर राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले ली. शुक्रवार को उन्होंने विधानसभा में बहुमत भी साबित कर दिया. उनको विधानसभा के 59 में से 47 सदस्यों का समर्थन मिला.

हालांकि इसके साथ ही एनपीएफ की केंद्रीय समिति ने न सिर्फ भाजपा के साथ गठबंधन ख़त्म करने का ऐलान कर दिया बल्कि ज़ेलियांग को भी पार्टी से निकाल दिया. पार्टी विरोधी गतिविधियों की सज़ा के तौर ज़ेलियांग के ख़िलाफ यह कार्रवाई की गई. यानी नगालैंड में अब ऐसे मुख्यमंत्री सत्ता संभाल रहे हैं जो किसी पार्टी से ताल्लुक नहीं रखते. यही नहीं पार्टी भी दो धड़ों में बंटी हुई साफ नज़र आती है. जबकि इससे पहले तक एनपीएफ राज्य के गठबंधन (इसमें भाजपा भी शामिल है) में 2003 से वरिष्ठ घटक के तौर पर शामिल थी.

नगालैंड की राजनीतिक उठापटक के साथ संकेत मिलने लगे हैं कि जैसे समूचा पूर्वाेत्तर ही अस्थिरता के नए दौर में प्रवेश कर गया हो. ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक ही है कि पूर्वोत्तर के नए राजनीतिक रूपांतरण में कहीं वहां की क्षेत्रीय पार्टियों के अस्तित्व पर ख़तरा तो नहीं?

रंग बदलती राजनीति

सवाल बेमानी नहीं है क्योंकि पूर्वोत्तर के कई राज्यों में दशकों से राजनीतिक स्थिरता रही है. उदाहरण नगालैंड का ही ले लें. यहां एनपीएफ 2003 से सत्ता में है और वह जिस गठबंधन अगुवाई कर रहा है उसमें भाजपा और जनता दल-यूनाइटेड (जद-यू) भी लंबे समय से साझीदार हैं. इस सत्ताधारी गठबंधन की अगुवाई 2014 तक पूर्व मुख्यमंत्री और एनपीएफ के नेता नेफियू रियो कर रहे थे. इसके बाद 2015 से तो ऐसा वक़्त भी आया जब एनपीएफ की सरकार में भाजपा के साथ कांग्रेस के विधायक भी सत्ता पक्ष की बेंचों में बैठे नज़र आए. और इस तरह यह देश का इकलौता ऐसा राज्य बन गया जहां विपक्ष का एक भी विधायक नहीं था.

लेकिन 2013 से विधानसभा चुनाव के जीतने के बाद से एनपीएफ में आंतरिक बगावत का सिलसिला भी साथ-साथ चल पड़ा. पहले इसी के चलते सत्ता रियो के हाथ से निकलकर ज़ेलियांग के पास आई. फिर ज़ेलियांग से लिज़ित्सू. अब एक बार फिर यह लिज़ित्सू से ज़ेलियांग के हाथ में आ चुकी है. दिलचस्प बात यह है कि सत्ताधारी गठबंधन की सहयोगी पार्टियां अब तक हर बार बागी विधायकों के साथ ही रही हैं. लेकिन इस बार एनपीएफ ने खुले तौर पर भाजपा पर आरोप लगाया है कि वह अपनी पसंद का मुख्यमंत्री बनवाने के लिए राज्यपाल का इस्तेमाल कर रही है. इसी आधार पर वह हाईकोर्ट भी गई. हालांकि वहां उसकी याचिका खारिज़ हो गई.

कुल मिलाकर अब स्थिति यह है कि राज्य में एनपीएफ का अस्तित्व ख़तरे में नज़र आ रहा है क्योंकि विधानसभा में हुए बहुमत परीक्षण के दौरान ज़्यादातर विधायकों ने पार्टी व्हिप का उल्लंघन कर ज़ेलियांग के पक्ष में वोट दिया.

नगालैंड में एक आयोजन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
नगालैंड में एक आयोजन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

पूर्वोत्तर के अन्य राज्य भी, जहां परंपरागत रूप से अब तक कांग्रेस मज़बूत रही है, धीरे-धीरे भाजपा की तरफ झुक रहे हैं. इसका पहला कारण तो यही है कि पूर्वोत्तर के राज्य हमेशा से केंद्र में सत्ताधारी पार्टी के साथ रहे हैं क्योंकि इससे उन्हें अपने विकास के लिए केंद्र से अधिक वित्तीय मदद का आश्वासन मिलता है. दूसरा कारण यह है कि भाजपा ने ख़ुद अब तक पूर्वोत्तर को लेकर काफी रुचि दिखाई है. उसने यहां पूर्वोत्तर जनतांत्रिक गठबंधन (एनईडीए) के नाम से अलग गठजोड़ भी बनाया है. यह गठबंधन पूर्वोत्तर के सभी सातों राज्यों में फैला हुआ है. भाजपा की रणनीति का ही असर था कि एक साल के भीतर पार्टी क्षेत्र के तीन राज्यों में सत्ता पर काबिज़ हो चुकी है.

जबकि एक साल पहले तक पूर्वोत्तर में सत्ता तो दूर, भाजपा की पहुंच तक काबिले गौर नहीं थी. पार्टी भले हर जगह चुनाव जीतकर सत्ता तक न पहुंची हो इसके बावज़ूद क्षेत्र में उसका औचक उभार साफ नज़र आ रहा है. अरुणाचल प्रदेश का ही उदाहरण ले लें. भाजपा पर आरोप है कि उसने यहां राज्यपाल के कार्यालय का दुरुपयोग कर कांग्रेस को सत्ता से बेदख़ल किया. कांग्रेस इस राज्य में 2007 से सत्ता में थी. लेकिन अचानक वहां मुख्यमंत्री नबाम तुकी के ख़िलाफ पार्टी विधायकों ने विद्रोह कर दिया और उन्हें सत्ता से हटा दिया गया.

तुकी और कांग्रेस मामले को सुप्रीम कोर्ट तक ले गए. कोर्ट ने तुकी को दोबारा मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपते हुए उन्हें सदन में बहुमत साबित करने का निर्देश दिया. लेकिन तुकी बहुमत नहीं जुटा सके. उन्हें पद छोड़ना पड़ा. इसके बाद जुलाई 2016 में कांग्रेस ने बागी विधायकों में से ही एक पेमा खांडू को मुख्यमंत्री बनाकर जैसे-तैसे सरकार तो बचा ली. मगर कुछ समय बाद खांडू अपने समर्थक विधायकाें के साथ भाजपा में शामिल हो गए. इस तरह अब राज्य में पेमा खांडू के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार है. और पार्टी के साथ बिना चुनाव के ही 60 सदस्यीय विधानसभा में 47 विधायक हैं.

असम का उदाहरण दूसरा है. यहां तरुण गोगोई लगातार तीन चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री बने हुए थे. उन्हें सत्ता से बाहर करने के लिए भाजपा ने 2016 के चुनाव से पहले क्षेत्रीय पार्टियों का ‘इंद्रधनुषी गठबंधन’ बनाया. इस गठबंधन को कांग्रेस के 31 फीसदी की तुलना में दो फीसद कम (29.5 प्रतिशत) वोट मिले. इसके बावज़ूद सीटें ज़्यादा मिलीं. प्रदेश विधानसभा की 126 में से 60 सीटें तो भाजपा ने ही जीत लीं और कुछ समय बाद हुए उपचुनाव में एक और. इस तरह राज्य में सरकार चलाने के लिए भाजपा अब गठबंधन के क्षेत्रीय सहयोगियों पर भी ज़्यादा निर्भर नहीं है.

मणिपुर एक और मिसाल है. यहां इसी साल विधानसभा चुनाव हुए. भाजपा ने यहां भी लगातार तीन बार से चुनाव जीत रहे मुख्यमंत्री इबोबी सिंह और उनकी सरकार को सत्ता से बेदख़ल कर दिया. हालांकि कांग्रेस ने यहां 28 सीटें जीतीं और भाजपा ने सिर्फ 21 ही. लेकिन सटीक मौके पर कुछेक नए विधायकों ने शपथ लेने से पहले ही भाजपा का दामन थाम लिया और उसके विधायकों की संख्या बढ़कर 31 हो गई. कांग्रेस के पास विधानसभा के 40 सदस्यों में से सिर्फ 19 रह गए और इस तरह मणिपुर में भी अब भाजपा की सरकार सत्ता संभाल रही है.

क्षेत्रीय पार्टियां जो शायद धीरे-धीरे किनारे हाे रही हैं

यानी स्थिति साफ है. पूर्वोत्तर का राजनीतिक नक्शा धीरे-धीरे बदल रह है. या यूं कहें कि काफी हद तक बदल चुका है और इसमें क्षेत्रीय दलों पर धीरे-धीरे किनारे हो जाने का ख़तरा मंडरा रहा है.

असम की मिसाल फिर ली जा सकती है जहां 1986 के बाद से बहुकोणीय चुनावी संघर्ष हुआ करता था. उस वक़्त असम गण परिषद ताक़तवर क्षेत्रीय दल के तौर पर उभरी ओर उसने राज्य में सरकार भी बनाई. हालांकि आगे चलकर 2001 से 2016 तक कांग्रेस सत्ता में रही लेकिन चुनावी मुक़ाबला बहुकोणीय ही होता रहा. अखिल भारतीय संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (एआईयूडीएफ) के बैनर तले तमाम क्षेत्रीय दल अपना अस्तित्व बचाए और बनाए रहे. लेकिन अब 2016 के चुनाव के बाद से हालात ऐसे बनते नज़र आ रहे हैं मानो चुनावी संघर्ष भाजपा और कांग्रेस के बीच सिमटने की दिशा में आगे बढ़ रहा हो. इसकी वज़ह यह है कि भाजपा इस वक़्त भले छोटी पार्टियों के गठजोड़ के साथ सत्ता में हो, लेकिन वास्तव में सरकार चलाने के लिए उसे उनकी ज़रूरत नहीं है. ऐसे ही विपक्ष में कांग्रेस ने उन्हें पूरी तरह किनारे कर दिया है.

इसी तरह की स्थिति मणिपुर में भी है. यहां मुख्य विपक्षी दल के तौर पर कांग्रेस है और क्षेत्रीय पार्टियां सत्ताधारी भाजपा के पिछलग्गू की तरह उसके साथ खड़ी हैं. जबकि भाजपा के पास ख़ुद के बल पर ही सरकार चलाने लायक बहुमत है. यानी उसे इन क्षेत्रीय दलों की ज़्यादा ज़रूरत नहीं है. ज़ाहिर तौर ऐसे में सरकार में उनकी बात बहुत ध्यान से सुनी जाएगी इसकी संभावना कम ही नज़र आ रही है.

नगालैंड अब तक ऐसा राज्य था जहां क्षेत्रीय पार्टियों ने कभी राष्ट्रीय दलों की छत्र छाया को स्वीकार नहीं किया. लेकिन सत्ताधारी एनपीएफ अब भाजपा का पिछलग्गू बनता दिख रहा है. जबकि पहले वह भाजपा के ‘बड़े भाई’ के तौर पर सरकार चला रहा था.

संकेत तो ऐसे भी मिल रहे हैं जैसे भाजपा के सामने वह रक्षात्मक मुद्रा में है. मसलन उसने बीती 19 जुलाई को पार्टी के अधिकृत नेतृत्व की बैठक के दौरान चर्चों को सांप्रदायिक तत्वों के ख़िलाफ आग़ाह किया. सभी राष्ट्रीय दलों से अपील की गई कि वे क्षेत्रीय पार्टियों की सरकारों को अस्थिर करने की बेजा प्रवृत्ति के ख़िलाफ खड़े हों. इसके एक दिन बाद उसने राज्यपाल पर असंवैधानिक तरीके से बाग़ी विधायकों की सरकार को समर्थन देने का आरोप लगाया. साथ ही उन्हें पार्टी की ओर से आयोजित ‘गोमांस भोज’ में भी आमंत्रित किया. यह कार्यक्रम भाजपा का साथ छूटने की खुशी में आयोजित किया गया.

विविधता जो कहीं खोती जा रही है

यानी अब यह मानने में गुरेज़ नहीं होना चाहिए कि पूर्वाेत्तर में क्षेत्रीय पार्टियों का दायरा सिमटता जा रहा है. और इसका अर्थ क्या लगाया जाना चाहिए? यह कि सांस्कृतिक और राजनीतिक विविधता की संस्कृति कहीं खोती जा रही है. क्योंकि पूर्वोत्तर की क्षेत्रीय पार्टियां सिर्फ राजनीतिक दल नहीं हैं बल्कि अपनी जातीय-सांस्कृतिक पहचान को अपने अाप में समेट कर रखने वाले समूह भी हैं. इनमें से अधिकांश तो हिंसक आंदोलनों से उभरकर शासन व्यवस्था की मुख्यधारा में शरीक हुए हैं. फिर चाहे वह 1985 के असम आंदोलन से निकली ‘असम गण परिषद हो या फिर बोडो लिबरेशन टाइगर्स से जुड़ा बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट. ऐसे ही नगा पीपुल्स फ्रंट भी 2002 में तब बना जब सभी भूमिगत नगा समूहों ने संघर्ष विराम को मंज़ूर करते हुए सत्ता में भागीदार बनने पर अपनी सहमति दी. इसी तरह असम में एआईयूडीएफ असम में बंगाली मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व करता है.

यानी इन तमाम क्षेत्रीय दलों ने अब तक यह सुनिश्चित किया है कि सरकारें जातीय समुदाय से जुड़ी मांगों पर ध्यान दें. उनकी ताकत ने सरकारों को इस मज़बूर भी किया है. इस तरह उन्होंने भारतीय लोकतंत्र को भी एक तरह से समृद्ध ही किया है. उसे विविधता दी है. लेकिन राष्ट्रीय दलों के संघर्ष ने अब इसी विविधता के सामने ख़तरा पैदा कर दिया है जिसे लोकतंत्र के लिए अच्छा तो क़तई नहीं कहा जा सकता.