1965 में हुए भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने यूं ही अभिनेता मनोज कुमार से कह दिया था कि वे उनके नारे ‘जय जवान जय किसान’ पर आधारित एक फिल्म बनाएं. इसके बाद साल 1967 में मनोज कुमार की अगली फिल्म आई - उपकार. इसमें वे किसान और जवान की भूमिकाएं निभाते दिखाई दिए थे. इस फिल्म से मनोज कुमार ने बतौर निर्देशक भी डेब्यू किया था. इस फिल्म के बाद उन्होंने देशभक्ति की इतनी फिल्में बनाईं कि उनका नाम ही भारत कुमार हो गया. चूंकि समय राष्ट्रवाद का है इसलिए यह सवाल किया जा सकता है कि आज मनोज कुमार फिल्मों में सक्रिय होते तो क्या वे वर्तमान सरकार के वैसे ही चहेते होते जैसे अक्षय कुमार या अनुपम खेर हैं?

शहीद, उपकार, रोटी कपड़ा और मकान जैसी फिल्में बनाने वाले इस अभिनेता की फिल्में आजकल बन रही देशभक्ति की उन फिल्मों से एकदम अलग थीं जिनमें नायक देश को बचाने के लिए अकेले ही एक खतरनाक और असंभव लगने वाले मिशन को अंजाम देता दिखाया जाता है. उनकी फिल्में अपेक्षाकृत तार्किक और सच्चाई को दिखाने वाली हुआ करती थीं. मनोज कुमार जिस तरह से अपनी फिल्मों में मजदूरों और मेहनतकश लोगों के अधिकारों की बातें करते दिखाई पड़ते थे, वह थोड़ा हीरोइज्म के साथ उस दौर के संघर्ष की वास्तविकता को भी दिखाता था. अगर आज वे इस तरह से असंतुष्ट कामगारों को दिखाने वाली फिल्में बनाते तो वामपंथी और देश की छवि खराब करने वाले बन सकते थे. और तब हो सकता था कि उन्हें इसके लिए सोशल मीडिया पर जमकर ट्रोल किया जाता.

सोशल मीडिया की ही बात करें तो हिंदू ब्राह्मण होना मनोज कुमार यानी हरिकृष्ण गिरी गोस्वामी के पक्ष में जाने वाला था. सरकार भले ही मुसलमान सितारों पर किसी तरह की आपत्ति न जताती हो लेकिन भाजपा समर्थक कई लोग हिंदू कलाकारों के समर्थन और बॉलीवुड के खानों के विरोध में अक्सर सोशल मीडिया पर आंदोलन चलाते देखे जा सकते हैं.

आज जो कद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का है वही कद उनके समय में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का था. उनके द्वारा लगाई गई इमरजेंसी के उस दौर में मनोज कुमार उन कुछेक कलाकारों में से एक थे जिन्होंने श्रीमती गांधी की नाराजगी मोल ली थी. अपनी फिल्मों ‘शोर’ और ‘दस नंबरी’ के दूरदर्शन पर प्रसारण को लेकर हुए विवाद को लेकर वे कोर्ट तक गए. यह मामला इतना बढ़ा कि इस चक्कर में उनकी बन रही फिल्म ‘नया भारत’ कभी पूरी ही नहीं हो पाई. इसके साथ ही फिल्म ‘शोले’ को लेकर सेंसर बोर्ड से हुए विवाद में भी उन्होंने फिल्म निर्माताओं का साथ दिया. हालांकि ये दोनों घटनाएं इमरजेंसी के दौर की होते हुए भी सीधे उससे जुड़ी हुई नहीं हैं. लेकिन इनके जरिए यह जरूर समझा जा सकता है कि आज की परिस्थितियों में मनोज कुमार का रुख वर्तमान सरकार के प्रति भी उतना नर्म नहीं होता.

ऐसे में चुटकी लेते हुए कहा जा सकता है कि मनोज कुमार अपने इस रुख का एक बड़ा फायदा उठा सकते थे. यह फायदा उन्हें बार-बार उनके जन्मस्थान ऐबटाबाद की यात्रा के रूप में मिल सकता था. जैसे ही वे सत्ता या सत्ताधारी किसी पर कोई नकारात्मक टिप्पणी करते, नेताओं से लेकर उनके समर्थक तक उन्हें पाकिस्तान का वीजा और टिकट देने की तैयारी में नजर आते. और पाकिस्तान भी इस मौके को चूक कैसे सकता था. वह खुले दिल से भारत को चिढ़ाने के लिए उनका स्वागत करता नजर आता.