छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी की रमन सिंह सरकार से जुड़ा एक खुलासा इन दिनों सुर्खियों में है. मामला राज्य के वरिष्ठ मंत्री बृजमोहन अग्रवाल और उनकी पत्नी सरिता अग्रवाल से जुड़ा है. आरोप है कि जनहित में दान की गई एक जमीन सरिता अग्रवाल ने एक रिजॉर्ट के लिए कौड़ियों के भाव खरीद ली. आरोपों के कटघरे में बृजमोहन अग्रवाल भी हैं.

मामला क्या है?

राज्य के कृषि, जल संसाधन और धार्मिक न्यास मंत्री अग्रवाल की पत्नी महासमुंद जिले के सिरपुर में वन विभाग की 4.12 हेक्टेयर सरकारी ज़मीन ‘श्याम वाटिका’ के नाम से रिज़ॉर्ट विकसित कर रही हैं. इस प्रोजेक्ट में उनके पुत्र अभिषेक और दो कंपनियां- ‘आदित्य सृजन‘ और ‘पुरबासा वाणिज्य’ भी शामिल हैं. कंपनी रजिस्ट्रार के हिसाब से अभिषेक दाेनों कंपनियों के निदेशकों में शामिल हैं. जबकि ‘आदित्य सृजन’ में उनकी मां भी निदेशक हैं. द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक सरिता के नाम पर यह ज़मीन ग़लत तरीके से औने-पौने दाम पर ख़रीदी गई है.

गड़बड़ी का ख़ुलासा कब और कैसे?

रायपुर दक्षिण विधानसभा सीट से 1990 से विधायक अग्रवाल ने 2013 के चुनाव के वक़्त इस ज़मीन के बारे में जानकारी सार्वजनिक की थी. चुनाव आयोग को दिए शपथ पत्र में उन्होंने बताया कि इस ज़मीन की मालिक उनकी पत्नी हैं. इसके दो साल बाद यानी 2015 में किसान मज़दूर संघ के नेता ललित चंद्रनाहू ने यह मसला उठाया. उन्होंने महासमुंद के तत्कालीन कलेक्टर उमेश कुमार अग्रवाल और रायपुर के आयुक्त अशोक अग्रवाल को पत्र लिखकर सरिता के मालिकाना हक़ वाली ज़मीन की स्थिति पर संदेह ज़ताते हुए इसकी जांच की मांग की.

अब इस मसले से जुड़े तीनों क़िरदारों और उनकी भूमिकाओं को समझने की कोशिश करते हैं. इससे यह भी समझ में आता है कि दान की जमीन का मंत्री की पत्नी के कब्जे में जाना रमन सरकार की मुश्किल बढ़ाने वाला सिर्फ एक पहलू है.

1. किसान जिन्होंने जनहित के लिए अपनी ज़मीन सरकार को दान में दी थी

जिस ज़मीन को बृजमोहन अग्रवाल ने अपनी पत्नी की बताया और जिसकी स्थिति पर चंद्रनाहू ने सवाल उठाया उसके छल-बल में उलझने की कहानी मार्च 1994 से शुरू हुई. यह ज़मीन मूल रूप से सिरपुर के नज़दीकी झलकी गांव के किसान विष्णुराम साहू की थी. उन्होंने दो मार्च 1994 को पांच अन्य किसानों के साथ मिलकर अपनी ज़मीन जनहित में विकास कार्यों के लिए अविभाजित मध्य प्रदेश की सरकार को ‘दानपट्‌टे’ में दी थी. शुरू में इस ज़मीन का मालिकाना राज्य के जलसंसाधन विभाग को मिला लेकिन दो माह बाद ही यह वन विभाग को सौंप दी गई.

2. सरकारी तंत्र और उसकी ग़फलत

केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने मई 1994 में ज़मीन हस्तांतरण की प्राथमिक अनुमति दी थी. इस अनुमति के आधार पर ही वन विभाग ने इसे अपना मान लिया. 2003 में क़रीब 22.90 लाख रुपए खर्च कर उसने इस पर वनीकरण भी करा दिया जबकि सरकारी लापरवाही की वज़ह से राजस्व रिकॉर्ड में यह दर्ज़ ही नहीं हुआ कि यह ज़मीन वन विभाग को हस्तांतरित की जा चुकी है. यानी इतने साल बाद भी राजस्व रिकॉर्ड में यही दर्ज़ था कि ज़मीन के मालिक विष्णुराम साहू हैं जिन्होंने दानपट्‌टे पर ज़मीन सरकार के जलसंसाधन विभाग को दे रखी है.

3. मंत्री पर गंभीर सवाल

इस बीच साल 2000 में मध्य प्रदेश का विभाजन हो चुका था. इसके तीन साल बाद यानी 2003 में नए-नवेले छत्तीसगढ़ में रमन सिंह के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी थी. इस सरकार में बृजमोहन अग्रवाल गृह, जेल, संस्कृति और पर्यटन जैसे विभागों के मंत्री बने. अग्रवाल की अपनी वेबसाइट के मुताबिक उन्हें 2006 में वन विभाग का अतिरिक्त प्रभार दिया गया. यानी वह विभाग वास्तव में जिसका कब्ज़ा विष्णुराम साहू की ज़मीन पर था, और राजस्व रिकॉर्ड के हिसाब से नहीं भी था क्योंकि ज़मीन हस्तांरित किए जाने की जानकारी इसमें दर्ज़ नहीं थी.

2008 में चुनाव जीतकर रमन सिंह सरकार फिर सत्ता में लौटी. उसके एक साल बाद यानी 12 सितंबर 2009 को अग्रवाल की पत्नी ने यही ज़मीन सीधे विष्णुराम साहू से सिर्फ 5,30,600 रुपए में ख़रीद ली. इसी बीच पर्यटन मंत्रालय, जिसको शुरू से अब तक अग्रवाल ही संभाल रहे थे, ने इस ज़मीन के इर्द-ग़िर्द लगते पूरे इलाके को संभावित पर्यटन केंद्र के तौर पर चिन्हित कर दिया. इसके बाद सरिता अग्रवाल, उनके पुत्र अभिषेक और उनसे जुड़ी कंपनियों ने इस पर रिजॉर्ट विकसित करने की योजना पर काम शुरू कर दिया.

मामला यहीं ख़त्म नहीं होता. रमन सिंह सरकार 2013 में लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटी. अग्रवाल को अब जल संसाधन मंत्रालय का ज़िम्मा सौंपा गया. यानी वह विभाग जिसे विष्णुराम साहू की ज़मीन दानपट्‌टे में मिली थी. चंद्रनाहू के मामला सरकार के ध्यान में लाने पर जांच हुई. इसमें माना जाता है कि राजस्व रिकॉर्ड में यह दर्ज़ नहीं है कि ज़मीन जल संसाधन से वन विभाग को हस्तांरित हुई. लिहाज़ा वन विभाग दो बार पत्र लिखकर जलसंसाधन विभाग ने आग्रह करता है कि राजस्व रिकॉर्ड में ज़रूरी फेरबदल किया जाए. पर जल संसाधन विभाग कहता है कि चूंकि दानकर्ता ज़मीन बेच चुका है इसलिए अब कार्रवाई संभव नहीं है.

और अब कौन क्या कह रहा है?

कुछ दलाल आए थे, बाद में मुझे पता चला कि ज़मीन मंत्री ने ख़रीदी है

‘उन्होंने (1994 में अविभाजित मध्य प्रदेश की सरकार के अफसरों ने) मुझसे कहा था कि मेरी ज़मीन पर सरकारी योजना चलेगी. उन्होंने मुझे और मेरे बच्चों को ज़मीन के बदले सरकारी नौकरी देने का वादा किया था. मैं बच्चों को स्कूल भेजना चाहता था और वे भी गांव में रहकर खेती करने के बजाय सरकारी नौकरी करना चाहते थे. इसलिए मैं उनकी बातों में आ गया. हालांकि उन अफसरों ने मुझसे लिखित में कोई वादा नहीं किया. फिर भी मैंने कागजों पर दस्तखत कर दिए. लेकिन उन्होंने वादा पूरा नहीं किया. मेरी ज़मीन पर न तो कोई सरकारी योजना आई और न हमें नौकरी मिली. इस दौरान हर साल ज़मीन का लगान मैं ही भरता रहा. मैं इसे अपनी क्यूं न मानूं? फिर कई साल बाद (2009 में) कुछ दलाल आए थे. उन्होंने बताया कि वे मुझसे मेरी ज़मीन ख़रीदेंगे. चूंकि अब तक भी राजस्व रिकॉर्ड में बदलाव नहीं हुआ था इसलिए मैंने ज़मीन बेच दी. बाद में मुझे पता चला कि यह ज़मीन मंत्री जी (अग्रवाल) ने ख़रीदी है.’

विष्णुराम साहू 

मैंने कोई गलती नहीं की अगर कुछ ग़लत हुआ है तो बेचने वाले की तरफ से

‘हमने हर काम नियमों के मुताबिक किया. जिस ज़मीन की बात की जा रही है उसे मेरी पत्नी और बेटे ने ख़रीदा है. वह जिस किसान के नाम पर थी उसी से ख़रीदी गई है. मुझे नहीं लगता कि इसमें कोई ग़लती हुई है. और अगर कोई ग़लती है भी तो बेचने वाले की तरफ से है. अन्यथा कोई मसला ही नहीं है. मैं सिर्फ दो लाइन में अपनी बात कहना चाहता हूं कि सभी नियमों का पालन करते हुए जिस किसान के नाम पर ज़मीन थी उसी से इसे ख़रीदा गया. रजिस्ट्री कराई गई. उसे पूरा भुगतान किया गया. इस ज़मीन का ज़िक्र मैंने चुनाव घोषणा पत्र में भी किया है. मैं या मेरे परिवार का कोई सदस्य किसी तरह की अनियमितता में शामिल नहीं है. इसके बावज़ूद अगर किसी भी एजेंसी की जांच से इसमें अनियमितता का पता चलता है तो हम तुरंत संबंधित किसान को उसकी ज़मीन लौटा देंगे.’

बृजमोहन अग्रवाल

खबर लिखे जाने तक मामले में एक और नया पेंच आ गया है. मुख्यमंत्री रमन सिंह ने जिन अधिकारियों को इन मामले की जांच सौंपी थी उन्होंने पाया कि रिजॉर्ट के लिए 13.9 हेक्टेयर सरकारी जमीन पर भी कब्जा कर लिया गया है. महासमुंद जिले के राजस्व अधिकारियों को यह भी पता चला है कि इस अतिक्रमण के संबंध में भेजे गए कई नोटिसों के बावजूद आदित्य सृजन लिमिटेड इस बात पर अड़ी रही कि यह जमीन उनकी सीमा के भीतर पड़ती है. यही नहीं, कंपनी का यह भी कहना था कि अगर सरकार को जमीन चाहिए ही तो वह कोई दूसरी जमीन दे सकती है.