राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन (एफआरबीएम) पर एनके सिंह समिति द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट पर वित्त मंत्रालय ने कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) के सामने अपनी प्रस्तुति दी है. सरकार अब इस रिपोर्ट के विभिन्न सुझावों पर विचार-विमर्श करेगी. सूत्रों की मानें तो उसके रवैय्ये को देखते हुए संभावना है कि वह एनके सिंह समिति की ज्यादातर सिफारिशों को मान लेगी. अगले महीने तक इस रिपोर्ट पर फैसला हो जाने की उम्मीद है.

इस फैसले के बाद मौजूदा एफआरबीएम कानून को संशोधित किया जाएगा. अब तक मिली जानकारी के अनुसार सरकार नया कर्ज और राजकोषीय उत्तरदायित्व (डीएफआर) कानून बनाने की सोच रही है. इससे संबंधित विधेयक नवंबर में संसद के शीतकालीन सत्र में पेश होने की संभावना है. इसके प्रावधान चूंकि केंद्र और राज्य के खर्च से जुड़े हुए हैं, इसलिए यह कानून अगले कई सालों तक देश के बजट की दशा-दिशा को प्रभावित करेगा. अत: इसे काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

राजकोषीय और राजकोषीय नीति

राजकोष का मतलब देश का सरकारी खजाना होता है. वहीं राजकोषीय व्यय इस खजाने से होने वाले खर्च को कहा जाता है. इस खर्च को तय करने वाली सरकारी नीति राजकोषीय नीति कहलाती है. चूंकि सरकारी खर्च के लिए बजट का निर्माण किया जाता है इसलिए यह नीति बजट की दशा-दिशा को भी तय करती है.

अस्सी के दशक के मध्य तक देश की सरकारें राजकोष के प्रबंधन को लेकर ज्यादा संजीदा नहीं थीं. इसका परिणाम यह हुआ कि उस समय देश की वित्तीय सेहत काफी खराब हो गई. उस दौरान सरकारी खर्च के मुख्य निर्धारक राजनीति और चुनाव ही बने रहे. लेकिन 1985 के बाद इस दिशा में प्रयास शुरू हुए जो 1991 में उदारीकरण की शुरुआत के बाद तेज हो गए. अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने तो 2003 में सरकारी खर्चे पर अंकुश लगाने के लिए एफआरबीएम कानून, 2003 बना दिया. जुलाई 2004 से प्रभावी यह कानून केंद्र और राज्य दोनों स्तर की सरकारों के खर्च पर बाध्यकारी अंकुश लगाता है.

पिछले 13 सालों के अनुभव और बदले हालात के मद्देनजर नरेंद्र मोदी सरकार को लगा कि राजकोषीय प्रबंधन की नीति में बदलाव की जरूरत है. इस पर विचार करने के लिए उसने 2016 में एनके सिंह समिति का गठन किया. समिति को बदली जरूरतों के अनुरूप नया राजकोषीय प्रबंधन कानून बनाने का जिम्मा दिया गया. इसने इसी साल जनवरी में केंद्रीय वित्त मंत्रालय को चार खंडों में अपनी रिपोर्ट सौंपी है. समिति ने इस रिपोर्ट में सरकार से राजकोषीय नीति के मध्यावधि लक्ष्यों को बदलने की सिफारिश की है.

एनके सिंह समिति की प्रमुख सिफारिशें

1. समिति की सबसे महत्वपूर्ण सिफारिश यह है कि सरकार मार्च 2023 तक देश का कुल कर्ज (सरकार के अब तक के राजकोषीय घाटे और देनदारी का योग) जीडीपी के 60 प्रतिशत तक ले आए जिसमें केंद्र का हिस्सा 39 प्रतिशत और राज्य का 21 प्रतिशत तक हो. वित्त वर्ष 2016-17 में देश का कुल कर्ज 68 प्रतिशत था. इसमें केंद्र का हिस्सा 49.4 और राज्य सरकारों का करीब 19 फीसदी रहा. यानी यह सिफारिश मानी गई तो केंद्र सरकार को अगले छह सालों में अपने कर्ज में 10 से ज्यादा फीसदी की कमी लानी होगी.

समिति के अध्यक्ष एनके सिंह ने इस सिफारिश को मौजूदा राजकोषीय नीति में ‘पैराडाइम शिफ्ट’ कहा है. उनके अनुसार देश अब दूसरे चरण के ‘राजकोषीय प्रबंधन’ युग में प्रवेश करने जा रहा है. इसलिए अब केवल राजकोषीय घाटा कम करने से काम नहीं चलेगा. उन्होंने कहा कि अर्थव्यवस्था के विकास में निजी और विदेशी निवेश की बड़ी भूमिका है और इसे पाने के लिए देश को अपनी क्रेडिट रेटिंग सुधारनी ही होगी. उन्होंने आगे बताया कि क्रेडिट रेटिंग तय करने में कुल कर्ज का काफी योगदान होता है, इसलिए अब राजकोषीय नीति का फोकस राजकोषीय घाटे के बजाय देश के कुल कर्ज पर होना चाहिए. उन्होंने अध्ययन का हवाला देते हुए रिपोर्ट में लिखा है कि कर्ज का सबसे सही अनुपात जीडीपी का 60 प्रतिशत होना चाहिए. इतने कर्ज से विकास के साथ-साथ क्रेडिट रेटिंग भी सही बनी रहती है. यदि यह सिफारिश मान ली गई तो देश के इतिहास में यह पहली बार होगा जब कुल कर्ज की सीमा पर भी कानूनी बाध्यता होगी.

हालांकि समिति के सदस्य और देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने इस सिफारिश पर आपत्ति जताई है क्योंकि इसे मानने पर केंद्र सरकार को अगले पांच सालों में अपने कर्ज में जीडीपी के 10 फीसदी के बराबर कमी करनी होगी. आज की स्थिति के लिहाज से यह राशि 17.5 लाख करोड़ रुपये ठहरती है. सुब्रमण्यम का मानना है कि इस प्रावधान से केंद्र सरकार पर खर्च कम करने का दबाव काफी बढ़ जाएगा. हालांकि एनके सिंह इसे बहुत बड़ी चुनौती नहीं मानते. उनके मुताबिक देश अगले पांच सालों में आठ फीसदी से भी ज्यादा गति से विकास करेगा जिससे 2022-23 तक अर्थव्यवस्था का आकार काफी बढ़ जाएगा. ऐसे में सरकार थोड़ी कोशिश करके कर्ज को लक्षित दायरे में ला सकती है.

2. समिति की एक अन्य महत्वपूर्ण सिफारिश राजकोषीय प्रबंधन को संस्थागत रूप देने की है. इसके लिए उसने एक तीन सदस्यीय ‘राजकोषीय परिषद’ बनाने की सिफारिश की है. यह परिषद सरकार को इस संबंध में न केवल आंकड़े और अनुमान मुहैया कराएगी बल्कि सरकार के प्रयासों की समीक्षा भी करेगी. साथ ही विशेष परिस्थिति में राजकोषीय लक्ष्यों में छूट लेने के सुझाव भी देगी.

इस रिपोर्ट के अनुसार अब तक देश की राजकोषीय नीति का काम पूरी तरह से सरकार के जिम्मे है जिससे इस मोर्चे पर राजनीति से परे हटकर फैसले लेना अक्सर मुश्किल होता है. समिति के मुताबिक इसलिए इसके लिए सरकार के ही नियंत्रण में एक विशेषज्ञ संस्था बनाई जानी चाहिए. उसका तर्क है कि कई देशों में राजकोषीय प्रबंधन के लिए ऐसी संस्थाएं हैं. समिति ने लिखा है कि दूसरी पीढ़ी के राजकोषीय प्रबंधन में ये काम केवल वित्त मंत्रालय के भरोसे नहीं छोड़े जा सकते. उसने राजकोषीय नीति के प्रबंधन में होने वाले इस बदलाव की तुलना ‘मौद्रिक नीति प्रबंधन’ में पिछले साल हुए बदलाव से की है. पिछले साल तक ब्याज दरें तय करने में केवल भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर की भूमिका होती थी. पर अब यह काम छह सदस्यीय ‘मौद्रिक नीति समिति’ करती है. सरकार और आलोचक भी इस सुझाव को प्र​गतिशील मान रहे हैं.

3. एके सिंह समिति की तीसरी सिफारिश यह है कि सरकार वित्त वर्ष 2022-2023 तक राजकोषीय घाटे (बजट घाटा यदि शून्य हो तो उस वित्त वर्ष के लिए उधार ली गई राशि और देनदारी) को घटाकर 2.5 प्रतिशत तक ले आए. वित्त वर्ष 2017-18 में इसके 3.2 प्रतिशत रहने का अनुमान है. यानी अगले पांच साल में इसमें 0.7 फीसदी की कमी करने की सिफारिश की गई है.

सीईए अरविंद सुब्रमण्यम ने इस सिफारिश पर भी आपत्ति जताई है. उन्होंने अपने ‘असहमति नोट’ में लिखा है कि सरकार का मुख्य फोकस राजकोषीय घाटे के बजाय प्राथमिक घाटे (राजकोषीय घाटे में से ब्याज अदायगी पर खर्च हुई राशि हटाने पर प्राप्त राशि) को कम करने पर होना चाहिए. उनका तर्क है कि मौजूदा हालात में कर्ज अर्थव्यवस्था के विकास लिए जरूरी है, लिहाजा इसके लिए चुकाए जा रहे ब्याज भी जरूरी हैं. उन्होंने लिखा है कि राजकोषीय घाटा और कम करने पर सरकार की खर्च शक्ति घटेगी जिससे देश का विकास प्रभावित होगा.

4. समिति ने अगले पांच साल में राजस्व घाटे (सरकार की राजस्व आय और खर्च का अंतर) को वित्त वर्ष 2017-18 के 1.9 प्रतिशत से घटाकर 0.8 प्रतिशत तक ले जाने का सुझाव दिया है. इसके लिए इसमें हर साल 0.25 फीसदी की कमी का लक्ष्य रखा गया है.

आलोचकों के अनुसार, राजस्व घाटा कम या शून्य करना किसी भी स्थिर अर्थव्यवस्था के लिए बहुत जरूरी होता है. इसके अभाव में सरकार की गाढ़ी कमाई गैर-उत्पादक क्षेत्रों में ‘बर्बाद’ हो जाती है. जानकार यह भी मानते हैं कि थोड़ी कोशिश करने पर इसे हासिल किया जा सकता है क्योंकि अगले कुछ सालों में देश की अर्थव्यवस्था का आकार काफी बढ़ने की संभावना है.

5. समिति ने मौजूदा लीक से हटते हुए विशेष परिस्थितियों के लिए एक खास सुझाव दिया है. इसके अनुसार, युद्ध, आपदा, व्यापक ढांचागत सुधार और विकास दर में तीन फीसदी से ज्यादा कमी होने पर राजकोषीय घाटे में 0.5 फीसदी की वृद्धि की जा सकती है. इसे ‘एस्केप क्लॉज’ नाम दिया गया है. वहीं विकास दर में तीन प्रतिशत से ज्यादा वृद्धि होने पर इसमें 0.5 प्रतिशत की कमी भी सुझाव दिया गया है. इसे ‘बॉयेन्सी क्लॉज’ कहा गया है.

हालांकि समिति के एक अन्य सदस्य और आरबीआई के गवर्नर उर्जित पटेल ने लचीलेपन की इस सीमा को 0.3 फीसदी तक ही रखने की वकालत की है. मौजूदा एफआरबीएम कानून में ऐसा लचीलापन नहीं है. आलोचकों के अनुसार समिति का यह कहना कि इस कटौती की भरपाई ठीक अगले वित्त वर्ष में कर दी जाए, थोड़ा अव्यावहारिक है. जानकारों का मानना है कि माहौल बेहतर होने पर भी महज एक साल में ऐसा करना बहुत मुश्किल होगा.

सिफारिशों का महत्व

उदारीकरण के पिछले 26 सालों में देश ने काफी तरक्की की है, लेकिन देश को अभी काफी आगे जाना है. इसके लिए केवल सरकारी खर्च के भरोसे नहीं रहा जा सकता. देश का विकास तब तक तेज गति से नहीं हो सकता जब तक घरेलू और विदेशी पूंजी की ​बड़ी मात्रा अर्थव्यवस्था में न लगे. लेकिन यह तभी होगा जब अर्थव्यवस्था के सारे संकेतक संतुलित हों और देश की क्रेडिट रेटिंग बेहतर हो. सरकारी खर्च संतुलित और सही दिशा में रहने पर महंगाई पर भी लगाम रहती है और जानकारों की मानतें तो इस दिशा में समिति की कई सिफारिशें बेहतर मालूम पड़ती हैं.