चंडीगढ़ की एक जिला अदालत का हालिया फैसला इन दिनों देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर में चर्चा का विषय बन गया है. बीती 18 जुलाई को आए इस फैसले में अदालत ने 10 साल की एक बच्ची को गर्भपात की अनुमति देने से इनकार कर दिया था. इस फैसले के बाद यह चर्चा तेजी से होने लगी है कि क्या देश में गर्भपात संबंधी कानूनों पर पुनर्विचार करना जरूरी हो गया है. इस हालिया मामले से शुरू हुई चर्चा की तकनीकियों को समझने से पहले उस मामले को ही जानते हैं जिसके चलते चंडीगढ़ की अदालत ने यह फैसला सुनाया था.

चंडीगढ़ में रहने वाली गुड़िया (बदला हुआ नाम) की उम्र महज़ 10 साल है. उसके पिता एक सरकारी विभाग में चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी हैं और उसकी मां मेड का काम करती हैं. हाल ही में उन्हें मालूम चला कि उनकी 10 साल की बेटी गर्भवती है. पूछताछ करने पर गुड़िया ने उन्हें बताया कि उनके ही रिश्तेदार ने बीती कुछ समय में कई बार उसके साथ बलात्कार किया है. गुड़िया के गर्भवती होने का पता चलते ही उसके माता-पिता ने आरोपित के खिलाफ बलात्कार का मामला दर्ज करवाया और गुड़िया को गर्भपात के लिए अस्पताल ले गए.

मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी एक्ट के तहत 20 हफ़्तों के गर्भ के बाद गर्भपात सिर्फ तभी किया जा सकता है जब मां या बच्चे की जान बचाने के लिए ऐसा करना जरूरी हो

गुड़िया के साथ बलात्कार करने के आरोपित को तो पुलिस ने तुरंत गिरफ्तार कर लिया लेकिन अस्पताल ने गुड़िया का गर्भपात करने से इनकार कर दिया. दरअसल मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी एक्ट के तहत 20 हफ़्तों के गर्भ के बाद गर्भपात सिर्फ तभी किया जा सकता है जब मां या बच्चे की जान बचाने के लिए ऐसा करना जरूरी हो. चूंकि गुड़िया के मामले में 20 हफ़्तों का यह समय बीत चुका था लिहाज़ा अस्पताल ने उसका गर्भपात करने से इनकार कर दिया. गर्भपात की अनुमति के लिए जब गुड़िया के माता-पिता न्यायालय पहुंचे तो न्यायालय ने भी 20 हफ़्तों का समय बीत जाने के चलते उसे गर्भपात की अनुमति देने से इनकार दिया.

चंडीगढ़ की अदालत ने यह फैसला स्थानीय डॉक्टरों की सलाह के बाद लिया. स्थानीय डॉक्टरों का मानना है कि गुड़िया की उम्र बहुत कम है और उसकी गर्भावस्था इस हद तक बढ़ गई है कि अब गर्भपात करने से उसकी जान को खतरा हो सकता है. लेकिन देश भर के कई विशेषज्ञ चंडीगढ़ के डॉक्टरों से अलग राय भी रखते हैं. इन लोगों का मानना है कि गुड़िया को गर्भपात की अनुमति देना जोखिम भरा हो सकता है लेकिन उसे यह अनुमति नहीं देना और भी ज्यादा जोखिम भरा है. इन विशेषज्ञों के अनुसार 10 साल की बच्ची का शरीर इतना सक्षम नहीं होता कि वह एक बच्चे को जन्म दे सके लिहाज़ा गर्भपात ही गुड़िया के लिए बेहतर विकल्प है.

18 जुलाई को आए चंडीगढ़ के अतिरिक्त सत्र न्यायालय के इस फैसले के तुरंत बाद ही इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका भी दाखिल की गई. अधिवक्ता एए श्रीवास्तव की इस याचिका में प्रार्थना की गई थी कि गुड़िया की चिकित्सकीय जांच विशेषज्ञों की एक टीम से करवाई जाए और यदि संभव हो तो उसे गर्भपात की अनुमति दी जाए. इस याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने एक मेडिकल टीम गठित करने और 28 जुलाई तक न्यायालय को गुड़िया की रिपोर्ट्स सौंपने के आदेश दे दिए हैं.

याचिकाकर्ता एए श्रीवास्तव बताते हैं, ‘10 साल की इस बच्ची का मामला बेहद संवेदनशील है. इस अवस्था में उसके लिए गर्भपात भी खतरे से खाली नहीं है और बच्चे को जन्म देना तो और भी ज्यादा जोखिम भरा है. लेकिन यह मामला अब सर्वोच्च न्यायालय के संज्ञान में है और देश के सबसे बेहतरीन डॉक्टर अब इस पर नज़र बनाए हुए हैं इसलिए उम्मीद है कि उस बच्ची को बचाया जा सकेगा. लेकिन हर मामले में ऐसा नहीं हो सकता. इसीलिए मैंने अपनी जनहित याचिका में यह भी मांग की है कि देश में गर्भपात संबंधी कानूनों पर पुनर्विचार करने की जरूरत है.’

भारत में गर्भपात से सम्बंधित कानूनों में बदलाव की बात पहले से भी उठती रही है. दरअसल हमारे देश में गर्भपात ‘मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी एक्ट, 1971’ के अनुसार ही किया जा सकता है. कई जानकार मानते हैं कि 1971 के इस कानून में बदलावों की सख्त जरूरत है क्योंकि बीते 40-50 सालों में मेडिकल साइंस ने बेहद तेजी से तरक्की की है और तब के मुकाबले आज हम मानव शरीर को कहीं ज्यादा बेहतर तरीके से समझते हैं. लिहाजा इस कानून को भी आज की समझ के अनुसार बदलना जरूरी हो गया है.

‘गुड़िया को अगर बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर किया जाता है तो उस पर इसके शारीरिक ही नहीं बल्कि गंभीर मानसिक प्रभाव भी होंगे...आने वाला समय उसके लिए बेहद खतरनाक हो सकता है.’  

‘मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी एक्ट, 1971’ के कई प्रावधानों पर पुनर्विचार की मांग होती रही है जिनमें से इस अधिनियम की धारा तीन प्रमुख है. यही वह प्रावधान है जो 20 हफ़्तों के बाद गर्भपात को कानूनन अपराध बनाता है और अपवादों को छोड़ इसे पूरी तरफ से प्रतिबंधित करता है. ऊपरी तौर पर देखने से तो इस प्रावधान में कोई कमी नज़र नहीं आती लेकिन यह प्रावधान गुड़िया जैसे कई बच्चों और महिलाओं के लिए अभिशाप बन जाता है.

कुछ समय पहले ही इस प्रावधान के चलते न्यायालय ने एक 17 साल की लड़की को गर्भपात की अनुमति देने से इनकार कर दिया था. उस लड़की के माता-पिता का आरोप था कि उनकी बेटी का अपहरण हो गया था जिसकी उन्होंने पुलिस में रिपोर्ट भी दर्ज कराई थी. बहुत खोजबीन के बाद भी उन्हें अपनी बेटी को ढूंढने में सात महीने लग गए. जब वे अपनी बेटी से मिले तो उन्हें मालूम हुआ कि उसे इतने समय बंधक बनाकर रखा गया था और उसके साथ कई बार बलात्कार किया गया है. वह 25 हफ़्तों से गर्भवती थी और अपने माता-पिता से मिलने के बाद गर्भपात करवाना चाहती थी. लेकिन ‘मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी एक्ट’ की धारा तीन के चलते न्यायालय ने उसे इसकी अनुमति नहीं दी.

कई जानकार मानते हैं कि ‘मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी एक्ट’ के प्रावधान उन महिलाओं या बच्चियों के लिए सबसे बड़ी मुसीबत बन जाते हैं जो बलात्कार के कारण गर्भवती हो जाती हैं. गुड़िया की तरह देश भर में हर साल हजारों बच्चियां यौन शोषण का शिकार होती हैं. बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में औसतन हर 13 घंटे में एक 10 साल से कम उम्र का बच्चा बलात्कार का शिकार होता है. सिर्फ 2015 में ही हमारे देश में 10 हजार से ज्यादा बच्चे बलात्कार का शिकार हुआ थे. ऐसे में कई बार गुड़िया जैसे मामले भी सामने आते हैं जहां पीड़ित की उम्र और समझ इतनी कम होती है कि उसे अपने गर्भवती होने की बहुत लंबे समय तक जानकारी ही नहीं होती.

गुड़िया के मामले को नजदीक से देख रही डॉक्टर पई एक साक्षात्कार में बताती हैं, ‘गुड़िया को अगर बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर किया जाता है तो उस पर इसके शारीरिक ही नहीं बल्कि गंभीर मानसिक प्रभाव भी होंगे. पहला तो उसका शरीर ही बच्चे को जन्म देने के लिए तैयार नहीं है. उसकी हड्डियां भी इतनी मजबूत नहीं हैं कि बच्चे को जन्म दे सकें. बल्कि आने वाला समय उसके लिए बेहद खतरनाक हो सकता है क्योंकि 10 साल की बच्ची का शरीर पूरे नौ महीनों तक गर्भ को संभालने लायक भी विकसित नहीं होता है.’ वे आगे कहती हैं, ‘गुड़िया मानसिक तौर से ठीक है क्योंकि अब तक उसे शायद इसकी जानकारी ही नहीं थी कि वह गर्भवती है. लेकिन अब क्योंकि वह इस बात को जानती है लिहाज़ा वह मानसिक तौर से भी प्रभावित होगी.’

एए श्रीवास्तव बताते हैं, ‘मैंने अपनी याचिका में न्यायालय से यह भी मांग की है कि हर जिले में एक स्थायी मेडिकल बोर्ड का गठन किया जाए जिसे यह जिम्मेदारी दी जाए कि नाबालिग बच्चियों के यौन शोषण के मामलों में जल्द-से-जल्द उनकी जांच हो सके और गुड़िया जैसे मामलों में बोर्ड समय रहते गर्भपात पर निर्णय ले सके.’ गुड़िया के मामले में उसके माता-पिता को कोर्ट के चक्कर काटते हुए ही तीन हफ्ते से ज्यादा का समय निकल चुका है जबकि गुड़िया की जिंदगी पर एक-एक दिन की देरी भी बहुत भारी पड़ सकती है. एए श्रीवास्तव कहते हैं, ‘50 साल पुराने इस कानून में अगर जल्द ही सुधार नहीं होते तो आने वाले समय में गुड़िया जैसी कई बच्चियों को इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है.’