दहेज विरोधी कानून पर सुप्रीम कोर्ट का ताजा दिशा-निर्देश निराशा जगाने वाला है. बुनियादी तौर पर यह इस बात को भूलता दिखता है कि महिलाएं पीड़ित पक्ष होती हैं. हो सकता है कुछ मामलों में इस कानून का दुरुपयोग होता होता हो, लेकिन फिर ऐसा कोई कानून नहीं जिसका कोई दुरुपयोग न करता हो.

राष्ट्रीय स्तर के आंकड़े बताते हैं कि दहेज के ज्यादातर मामलों में महिलाएं वास्तव में पीड़ित होती हैं. अब उनके साथ अलग बर्ताव करना और उन पर विशेष पुलिस अधिकारियों और जिला कल्याण समितियों के सामने अपना मामला साबित करने का बोझ डालना महिलाओं की सुरक्षा की बुनियादी अवधारणा को बदलने जैसा है. अदालत चाहती है कि ऐसे मामलों में जल्दी से फैसला हो जाए. लेकिन इसके लिए वह यह आदेश भी दे सकती थी कि ये समितियां शिकायत के एक महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंप दें.

इस आदेश के बाद पीड़ित महिलाओं की मुश्किल के बारे में सोचिए. उनमें से ज्यादातर आर्थिक रूप से अपने पैरों पर खड़े होने में सक्षम नहीं होंगी. यही सबसे बड़ी वजह भी है जो दहेज उत्पीड़न की शिकायत के लिए हिम्मत जुटाने से पहले वे खामोशी से कितना सब सहती रहती हैं. अब वे जिला कल्याण समितियों के सामने जाने और वहां अपने मामले में जिरह करने का फैसला करने से पहले दो बार सोचेंगी.

पति-पत्नी के विवाद इस देश के पारिवारिक मूल्यों में हुए क्षरण के सबसे बड़े उदाहरण हैं. अक्सर इनका कारण दहेज की मांग के चलते हुआ उत्पीड़न होता है. दूसरों पर आश्रित महिला पीड़ितों को न्यायोचित विकल्प देना आसान नहीं है. शायद सुप्रीम कोर्ट ने यह समझने में भूल की है कि कानून के दुरुपयोग की समस्या इतनी बड़ी नहीं है कि इसके लिए कानून को ही बदल दिया जाए. (स्रोत)