पाकिस्तान के राजनीतिक गलियारों में करीब दो दशक से एक बात लोग अक्सर कहते सुने जाते हैं कि मियां नवाज शरीफ होना आसान नहीं है. भारत जैसा पड़ोसी और पाकिस्तानी सेना जैसा ताकतवर संगठन होते हुए पाकिस्तान में किसी प्रधानमंत्री के लिए शासन चलाना काफी मुश्किल काम माना जाता है. यह काम कितना मुश्किल है इसका अंदाजा इस बात से ही लगता है कि वहां अभी तक कोई भी प्रधानमंत्री अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया है. लेकिन, ऐसे में भी नवाज शरीफ जिस तरह से पाकिस्तान में सबसे ज्यादा तीन बार प्रधानमंत्री बने और पिछले तीन दशकों में जिस तरह से बार-बार फर्श से उठकर अर्श तक पहुंचे वह अपने आप में बड़ी बात मानी जा सकती है.

पाकिस्तान में जितने लंबे समय तक नवाज शरीफ ने राजनीति की, उतने लंबे समय तक कोई और नेता राजनीति में नहीं टिक सका. शरीफ ने 80 के दशक में अपने गृहराज्य पंजाब से राजनीति में कदम रखा. 1977 में तत्कालीन प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो का तख़्ता पलटकर कर देश के राष्ट्रपति बने जनरल मुहम्मद ज़िया उल हक़ को उन्हें राजनीति में लाने का श्रेय दिया जाता है.

1980 में पंजाब में लेफ्टिनेंट-जनरल गुलाम जिलाानी खान की सैन्य सरकार में पहली बार शरीफ को कोई बड़ा ओहदा मिला था. वे इस सरकार में वित्त मंत्री नियुक्त किए गए. अपने इस कार्यकाल में उन्होंने पंजाब की सूरत ही बदल कर रख दी. शरीफ के वितमंत्री बनने के दो साल के अंदर ही पंजाब पाकिस्तान का सबसे धनी राज्य बन गया और केंद्र को पैसा देने के मामले में भी वह पहले पायदान पर आ गया. तानाशाह ज़िया उल हक़ ने उनसे प्रभावित होकर 1985 में उन्हें पंजाब के मुख्यमंत्री के तौर पर अपनी पार्टी का मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित कर दिया. सेना की मदद और चुनाव में मिली भारी जीत के बाद शरीफ पहली बार पंजाब के मुख्यमंत्री बने.

1988 में जिया उल हक की मौत के बाद उनकी पार्टी पाकिस्तानी मस्लिम लीग (पगारा गुट) दो धड़ों में बंट गयी. एक धड़े का नेतृत्व उस वक्त के प्रधानमंत्री मोहम्मद खान जुनेजो के हाथ में था तो जिया उल हक के समर्थक नवाज शरीफ के पीछे लामबंद हो गए. इसके बाद पाकिस्तान में 1990 के आम चुनाव में नवाज शरीफ ने शानदार जीत दर्ज की. वे देश के 12वें प्रधानमंत्री बने.

लेकिन, इस दौरान तेजी से बढे उनके कारोबार को लेकर सवाल उठने शुरू हो गए. विपक्षी पार्टियों ने उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के कई मामले उजागर किए, लिहाजा तीन साल बाद ही तत्कालीन राष्ट्रपति गुलाम इशाक खान ने शरीफ सरकार को बर्खास्त कर दिया. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने उनके निलंबन को असंवैधानिक माना, लेकिन सेना के दवाब के चलते नवाज शरीफ को पद छोड़ना पड़ा और फिर बेनजीर भुट्टो के नेतृत्व में सरकार बनी.

इसके बाद भी नवाज शरीफ ने हार नहीं मानी और अपनी पार्टी को मजबूत करने में लग गए. 1997 के आम चुनाव में उन्होंने जबर्दस्त वापसी की और पूर्ण बहुमत के साथ एक बार फिर देश की बागडो़र संभाली. यह नवाज शरीफ का वह दौर था जब विपक्ष के नाम पर पाकिस्तान की राजनीति में कुछ नहीं बचा था और वहां के सियासी परिदृश्य पर नवाज शरीफ ही छाये हुये थे. उनके इसी शासन के दौरान पाकिस्तान ने दुनिया को चौंकाते हुए पहली बार परमाणु परीक्षण किये थे. तब वह परमाणु शक्ति संपन्न पहला मुस्लिम देश भी बना था.

लेकिन, इसके बाद 1999 में नवाज शरीफ की किस्मत एक बार फिर उन्हें धोखा दे गई और उन्हें अपनी सियासी जिंदगी का सबसे बड़े तूफान झेलना पड़ा. तत्कालीन सेना प्रमुख परवेज मुशर्रफ ने उनका तख्तापलट कर उन्हें जेल में डाल दिया. भ्रष्टाचार के आरोप में उन्हें उम्रकैद की सजा सुनायी गयी. साथ ही उनके राजनीति में हिस्सा लेने पर भी आजीवन प्रतिबंध लगा दिया गया.

हालांकि, नवाज शरीफ ने इतना होने के बाद भी हार नहीं मानी. 2000 में सऊदी अरब के जरिए एक डील कर वे जेल से निकलने में कामयाब हो गए. लेकिन, नवाज शरीफ के राजनीतिक कद और उनकी महत्वाकांक्षा को अच्छे से समझने वाले मुशर्रफ भी उन्हें परिवार सहित देश से बाहर रखने पर ही राजी हुए. कई साल सऊदी अरब में बिताने के बाद साल 2007 में नवाज शरीफ की एक बार फिर पाकिस्तान की सरकार के साथ डील हुई और उनके पाकिस्तान लौटने का रास्ता साफ हो गया.

पाकिस्तान आकर नवाज शरीफ ने अपनी टूट चुकी पार्टी को फिर खड़ा किया और उसे 2008 में हुए चुनाव के लिए तैयार किया. लेकिन, इस चुनाव से पहले बेनजीर भुट्टो की हत्या के कारण बेनजीर की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को सहानुभूति लहर का फायदा मिला और वह सत्ता में आ गयी. हालांकि, पांच साल के इंतजार के बाद 2013 के आम चुनाव में नवाज शरीफ सब पर भारी पड़े. यहां तक कि देश में काफी लोकप्रिय माने जा रहे पूर्व क्रिकेटर इमरान खान भी उनकी राह में रोड़ा नहीं अटका सके.

लेकिन पिछले दो कार्यकालों की तरह ही इस बार भी नवाज शरीफ पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे और सुप्रीम कोर्ट द्वारा अयोग्य ठहराए जाने के बाद एक बार फिर उन्हें प्रधानमंत्री पद छोड़ना पड़ा है. उनकी पार्टी के नेताओं की मानें तो ‘शेर-ए-पंजाब’ कहे जाने वाले नवाज शरीफ इस बार भी जबर्दस्त वापसी करेंगे और अगले साल होने वाले चुनाव के बाद फिर प्रधानमंत्री बनेंगे.

लेकिन, पकिस्तान के कानूनी जानकार ऐसा नहीं मानते. उनके मुताबिक इस बार मामला बहुत अलग है. इस बार भ्रष्टाचार के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा उन्हें अयोग्य ठहराया गया है.

एक साक्षात्कार में पाकिस्तान की बार काउंसिल के उपाध्यक्ष अहसान भून कहते हैं, ‘शरीफ को सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 62 के तहत अयोग्य ठहराया और यह अयोग्यता स्थायी है क्योंकि इसमें अयोग्यता की अवधि को लेकर कुछ नहीं कहा गया है.’ वे 2013 के एक मामले का जिक्र करते हुए बताते हैं कि सांसद अब्दुल गफूर लेहरी को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार मुहम्मद चौधरी ने अयोग्य ठहराया था. लेकिन वह अनुच्छेद 63 के तहत था जिसमें अयोग्यता अस्थायी तौर पर होती है और जज के ऊपर निर्भर करता है कि वह संबंधित व्यक्ति को कितने समय के लिए अयोग्य ठहरा रहे हैं. अहसान पूर्व प्रधानमंत्री युसूफ रजा गिलानी का हवाला देते हैं जिन्हें कोर्ट की अवमानना के चलते अनुच्छेद 63 के तहत पांच साल के लिए अयोग्य ठहराया गया था.

पाकिस्तान के पूर्व अतिरिक्त अटॉर्नी जनरल तारिक खोखार भी अहसान भून की बात को सही ठहराते हैं. एक साक्षात्कार में वे कहते हैं कि नवाज शरीफ का राजनीतिक जीवन अब खत्म हो गया है क्योंकि अनुच्छेद 62 के तहत अब वह कभी भी विधानसभा या संसदीय चुनाव नहीं लड़ सकते हैं.

हालांकि, कुछ जानकार अनुच्छेद 62 में अयोग्यता की अवधि के बारे में न लिखे होने का फायदा नवाज शरीफ को मिलने की भी बात कहते हैं. लेकिन, इन लोगों का यह भी कहना है कि इसके लिए शरीफ को ‘अनुच्छेद 62’ को लेकर एक लंबी कानूनी लडाई लड़नी पड़ेगी और इसके बाद भी फैसला उनके पक्ष में आना चाहिए.

कानूनी मामलों से इतर अगर इस मामले को राजनीतिक नजरिये से देखें तो भी कई जानकार न सिर्फ नवाज शरीफ बल्कि उनके उत्तराधिकारियों की भी राजनीतिक जमीन खिसकने की बात कहते हैं. इनके मुताबिक इस मामले ने सबसे ज्यादा नवाज शरीफ और उनकी राजनीतिक उत्तराधिकारी मानी जाने वाली उनकी बेटी मरियम शरीफ की छवि को नुकसान पहुंचाया है. ये लोग कहते हैं कि अगर शरीफ परिवार चुपचाप अदालती कार्रवाई का सामना करता तो उन्हें जनता के बीच फायदा मिल सकता था. लेकिन, उन्होंने अपने बचाव में जो कहा या फिर जो दस्तावेज पेश किए वे सारे झूठे निकले, जिस वजह से उनकी और ज्यादा फजीहत हुई है.

नवाज शरीफ अपनी बेटी मरियम शरीफ और भाई शहबाज शरीफ के साथ (फाइल फोटो)
नवाज शरीफ अपनी बेटी मरियम शरीफ और भाई शहबाज शरीफ के साथ (फाइल फोटो)

ये लोग यह भी कहते हैं कि कोर्ट ने शरीफ, उनकी बेटी, दामाद और दोनों बेटों के खिलाफ यह मामला छह महीने में पूरा करने का आदेश दिया है. अब इस दौरान सारे सबूत सामने आएंगे, आए दिन शरीफ के परिवारियों और करीबियों के यहां छापे पड़ेंगे, हो सकता है गिरफ्तारियां भी हों. इनके मुताबिक अगले साल होने वाले आम चुनाव से कुछ महीने पहले होने वाली इस कारवाई का सीधा फायदा विपक्षी दलों को मिलेगा.

हालांकि, कई जानकार इस मामले में तेजी से हुई कारवाई के पीछे सेना का हाथ मानते हैं और इसलिए भी शरीफ की राजनीतिक पारी का अंत होने के बात कहते हैं. इन लोगों के मुताबिक पाकिस्तान में नेताओं के खिलाफ अदालती कार्रवाई के मामले सालों चलते हैं और उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती. ऐसे में यह मामला चौंकाने वाला है कि वर्तमान प्रधानमंत्री के खिलाफ तीन महीने में कोर्ट ने जांच कराकर फैसला भी सुना दिया.

यह भी कहा जा रहा है कि इस मामले में कोर्ट द्वारा बनाई गई जांच टीम की सबूत इकट्ठा करने में सबसे ज्यादा मदद सैन्य अधिकारियों और आईएसआई ने ही की है. इस जांच समिति में सेना के साथ-साथ आईएसआई का भी एक अधिकारी शामिल था. पाकिस्तानी जानकारों की मानें तो सेना नवाज शरीफ के रवैये से खुश नहीं है. भारत हो या अफगानिस्तान, दोनों ही मामलों पर शरीफ का रुख सेना के रुख से मेल नहीं खाता.

पाकिस्तान के पूर्व अतिरिक्त अटॉर्नी जनरल तारिक खोखार एक इंटरव्यू में कहते हैं कि यह संयोग ही है कि आज नवाज शरीफ को राजनीति में लाने वाले जिया उल हक़ ही उनकी राजनीति से विदाई का कारण बन गए हैं. खोखार के मुताबिक नवाज शरीफ को जिस अनुच्छेद 62-1(एफ) की वजह से अयोग्य ठहराया गया है उसे संविधान में बदलाव करके जिया उल हक़ ने ही शामिल करवाया था.