बीते रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में 34वीं बार देश को संबोधित किया. इस दौरान उन्होंने कई राज्यों में बाढ़ की गंभीर स्थिति और जीएसटी जैसे अहम मुद्दों पर बात की. साथ ही महिला विश्वकप क्रिकेट में भारत की बेटियों के शानदार प्रदर्शन की भी तारीफ की. उन्होंने कहा, ‘हम लोग लगातार देख रहे हैं कि शिक्षा का क्षेत्र हो, आर्थिक क्षेत्र हो, सामाजिक क्षेत्र हो, खेलकूद हो – हमारी बेटियां देश का नाम रोशन कर रही हैं, नई-नई ऊंचाइयां प्राप्त कर रही हैं. हम देशवासियों को हमारी बेटियों पर गर्व हो रहा है, नाज हो रहा है.’ उन्होंने महिला क्रिकेट टीम के साथ मुलाकात की चर्चा करते हुए आगे कहा, ‘सचमुच में हमारे देश की युवा पीढ़ी, खासकर कि हमारी बेटियां देश का नाम रोशन करने के लिए बहुत-कुछ कर रही हैं.’

लेकिन बीते दिनों ही देश का नाम रोशन करने वाली एक बेटी का चेहरा इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी की नजरों से ओझल रहा. महाराष्ट्र के नागपुर की रहने वाली कंचनमाला पांडे पैरा तैराक हैं. 26 साल की कंचनमाला ने पिछले महीने जर्मनी के बर्लिन में आयोजित पैरा स्विमिंग चैंपियनशिप की एस-11 कैटेगरी में देश के लिए सिल्वर मेडल जीता है. साथ ही उन्होंने मैक्सिको में आयोजित होने वाली वर्ल्ड चैंपियनशिप के लिए क्वालीफाई भी किया. इस साल ऐसा करने वाली वे अकेली भारतीय महिला एथलीट हैं. इतनी बड़ी कामयाबी पर हमें गर्व होना चाहिए. लेकिन इसके पीछे की कहानी एक देश के रूप में हमें शर्मिंदा भी कर सकती है.

जुलाई की शुरुआत में पैरा स्विमिंग चैंपियनशिप में हिस्सा लेने के लिए कंचनमाला (दृष्टिहीन) सहित छह पैरा तैराकों को बर्लिन भेजा गया था. खबरों के मुताबिक ये सभी खेल में हिस्सा लेने के लिए तो पहुंच गए लेकिन, इनके लिए सरकार द्वारा जारी किए गए पैसे नहीं पहुंच पाए. इसके बाद धारा की उल्टी दिशा में तैरने में माहिर कंचनमाला को उन स्थितियों का सामना करना जिन्हें उनके शब्दों में डरावना कहा जा सकता है. पैसे न मिलने की वजह से उन्हें बर्लिन में रहने और खाने के लिए लोगों से भीख मांगनी पड़ी.

हालत यह थी कि इवेंट के वक्त पार्टिसिपेशन फीस चुकाने के लिए भी उनके पास पैसे नहीं थे. इस खास जरूरत के मौके पर तैराकों के लिए नियुक्त किए गए अधिकारियों सहित कोच गायब मिले. कंचनमाला की परेशानी यहीं खत्म नहीं हुई. पैरालंपिक कमेटी ऑफ इंडिया (पीसीआई) ने उनका नाम 100 मीटर बैकस्ट्रोक की जगह 50 मीटर बैकस्ट्रोक इवेंट में डाल दिया था जिसमें उन्होंने कभी हिस्सा ही नहीं लिया था.

इसके बाद कंचनमाला अंतरराष्ट्रीय पैरालंपिक कमिटी के पास पहुंची, जहां उन्हें जरूरी मदद हासिल हुई. पीसीआई ने इसके लिए भारतीय खेल प्राधिकरण (एसएआई-साई) को जिम्मेदार ठहराया. 2008 के बीजिंग ओलंपिक में स्वर्ण पदक विजेता निशानेबाज अभिनव बिंद्रा द्वारा इस ओर ध्यान दिलाने के बाद केंद्रीय खेल मंत्री विजय गोयल ने मामले की जांच की बात कही है.

फोटो क्रेडिट : मेल टुडे
फोटो क्रेडिट : मेल टुडे

बाद में कंचनमाला ने एक अखबार मेल टुडे को बताया, ‘मैंने कभी नहीं सोचा था कि मुझे इन मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा. इस चैंपियनशिप में हिस्सा लेने के लिए मुझे पांच लाख रुपये कर्ज लेने पड़े थे.’ उन्होंने आगे कहा, ‘मैंने वर्ल्ड चैंपियनशिप के लिए क्वालीफाई किया है. लेकिन मुझे पता नहीं पीसीआई को इसकी अहमियत समझ में क्यों नहीं आ रही है.’ कंचनमाला का आगे कहना था कि रहने-खाने पर खर्च किए करीब 1.10 लाख रु आगे मिलेंगे या नहीं, इस बारे में उन्हें कोई आधिकारिक जानकारी नहीं मिली है.

कंचनमाला का मामला दो वजहों से अहम है - पहली वे दिव्यांग हैं और दूसरी वे देश की बेटी भी हैं. दिव्यांगों के लिए ‘सुगम्य भारत अभियान’ और बेटियों को आगे बढ़ाने के लिए ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ अभियान को मोदी सरकार बड़े जोर-शोर से प्रचारित कर रही है. 2015 में शुरू की गए सुगम्य भारत अभियान का मकसद दिव्यांग व्यक्तियों के विकास के लिए समान अवसर और सुगम्यता की सुविधा देना है. प्रधानमंत्री मोदी भी इन कार्यक्रमों का जिक्र लगातार करते रहते हैं.

लेकिन बीते रविवार प्रधानमंत्री ने एक ओर जहां महिला क्रिकेट टीम की दिल खोलकर तारीफ की, वहीं मुश्किलों के बावजूद कंचनमाला की बड़ी उपलब्धि का उन्होंने जिक्र तक नहीं किया. जानकारों के एक वर्ग के मुताबिक प्रधानमंत्री मोदी उपलब्धियों के बावजूद उन मुद्दों पर बचने की कोशिश करते हैं, जिनपर सरकार को असहजता या आलोचना का सामना करना पड़ सकता है. विश्वकप के फाइनल में पहुंचने से पहले ही महिला क्रिकेट टीम ने मीडिया सहित एक बड़े तबके का ध्यान अपनी ओर खींच लिया था. जानकारों के मुताबिक प्रधानमंत्री जब इन महिला क्रिकेटरों की तारीफ कर रहे थे तो वे एक बड़े तबके को भी संबोधित कर रहे थे. कंचनमाला के मामले में ऐसा कुछ नहीं था. माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री मोदी अपने ‘मन की बात’ में कंचनमाला को जगह देते तो इससे कई तरह के फायदे हो सकते थे. इससे उनके द्वारा विकलांग को दिव्यांग कहे जाने की अपील की तुलना में ज्यादा असर पैदा हो सकता था. साथ ही कंचनमाला के लिए भी इस डरावनी घटना का एक सुखद अंत हो सकता था. और आगे और किसी के साथ ऐसा न हो शायद यह भी सुनिश्चित किया जा सकता था. लेकिन ऐसा नहीं हो पाया.

27 दिसंबर, 2015 को प्रसारित मन की बात में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से विकलांग की जगह दिव्यांग शब्द इस्तेमाल करने की अपील की थी. उनका कहना था, ‘कभी-कभी समाज में हमें ऐसे व्यक्ति (दिव्यांग) से मिलने का अवसर आता है तो हमारे मन में ढेर सारे विचार आते हैं. हम सोच के अनुसार उसे देखने का नजरिया भी व्यक्त करते हैं. कभी-कभी उनके परिचय में आते हैं तो पता चलता है कि हमें आंखों से उनकी कमी दिखती है लेकिन, ईश्वर ने उनको कोई अतिरिक्त शक्ति दी होती है. इसे हम अपनी आंखों से नहीं देख पाते लेकिन, जब उसे काम करते हुए देखते हैं तो ध्यान जाता है ..अरे वाह! ये कैसे किया.’

लेकिन कंचनमाला की उपलब्धियों को शायद देखने के बावजूद प्रधानमंत्री अरे वाह कहना भूल गए.