अंग्रेज़ी भाषा और साहित्य में एक ज़बरदस्त ख़ूबी है. वह यह कि किसी व्यक्ति द्वारा चलाई गई या प्रचलित की गई विधा को उसके नाम पर रख दिया जाता है. मसलन, व्यंगकार जॉर्ज ऑरवेल से ‘ऑर्वेलियन’ शब्द और प्रथा का जन्म हुआ. फ्रांज़ काफ़्का के नाम से ‘काफ्केस्क’ शब्द बनाया गया. अगर हिंदी में भी इस बात की छूट होती और किशोर कुमार के टैलेंट और जीवन को एक साहित्य की तरह पढ़ा जाता तो यकीनन सनकीपन को ‘किशोरपन’ कहा जाता.

बात 1985 की है जब मध्य प्रदेश सरकार ने किशोर कुमार को लता मंगेशकर सम्मान देने की घोषणा की. तयशुदा दिन जब सम्मान दिया जाना था तो उनका किशोरपन जाग उठा. बस, उन्होंने आयोजकों तक बात कहलवा दी कि वे बैलगाड़ी में बैठ कर समारोह स्थल पर आयेंगे. जब इसकी वजह पूछी गई तो उनका कहना था, ‘जैसे हॉर्स पॉवर कार होती है, वैसे ही बुलक (बैल) पॉवर गाड़ी होती है!’ सबकी सांस फूल गयी. बड़ी मुश्किल से उन्हें मनाया गया कि अगर ऐसा किया गया तो जनता उनकी एक झलक देखने के लिए सड़क पर टूट पड़ेगी. बड़ी अफरा-तफरी मच जायेगी.

न जाने ऐसे कितने ही किस्से उनके किशोरपन से जुड़े हुए हैं. डॉन फिल्म में ‘खईके पान बनारस वाला’ गाने के लिए उन्होंने शर्त रख दी कि पहले पान बनारस से आएगा फिर गाना गाया जाएगा. हवाई जहाज से बनारसी पान मंगाया गया था!

किशोरपन का एक और किस्सा. साहब एक दिन स्टूडियो पहुंचे तो लोगों ने देखा कि वे इस तरह चले आ रहे थे मानो कोई बच्चा उनके हाथ की उंगली पकड़े साथ आ रहा हो. सबके सामने वे बोले, ‘बेटा, कुर्सी पर बैठ जा.’ लोगों ने जब पूछा तो उन्होंने कहा ‘ये बच्चा मेरे साथ स्टूडियो आता है.’ लोगों ने फिर कहा, ‘बच्चा है कहां?’ किशोर दा खाली पड़ी कुर्सी की तरह इशारा करके बोले ‘इस पर बैठा तो है.’ बताते हैं उन्होंने ऐसा कई दिनों तक किया और लोगों को यकीन हो गया कि कोई अदृश्य बच्चा है जो उनके साथ आता है.

अब मुद्दे पर आते हैं. यह सोचकर ताज्जुब होता है कि कोई कैसे इतना प्रतिभाशाली हो सकता है और वह भी तब जब उस क्षेत्र की कोई ख़ास शिक्षा न हासिल की गयी हो. किशोर का जीवन फिर यह बहस उठा देता है कि क्या प्रतिभा जन्मजात होती है या हासिल की जाती है.

50- 60 के दशक में मोहम्मद रफ़ी, मन्ना डे, तलत महमूद, मुकेश का बोलबाला था. मुकेश के अलावा इन सभी ने संगीत की शिक्षा हासिल की थी. इसके बावजूद किशोर कुमार सबकी पसंद बने रहे. खुद भी संगीत दिया, गाने भी लिखे, फिल्में बनाईं और एक्टिंग तो फिर शानदार थी.

बड़े भाई अशोक कुमार ने किसी इंटरव्यू में बताया था कि बचपन में एक बार किशोर के शरीर के किसी हिस्से में दर्द उठा. वो कई दिनों तक बस रोते ही रहते थे. इसी से उनकी आवाज़ बदल गयी. दादामुनि अशोक कुमार बड़े स्टार थे. जब वे बंद कमरे में टेक्स मोर्टन और जिमी रोजर्स के कुछ गायकों को सुनते थे तो किशोर बाहर दरवाजे के बगल में लेटकर उन गानों को सुनते. ‘योडलिंग’ इन्ही गायकों की ही देन थी.

दादा मुनि उन्हें एक्टर बनाना चाहते थे और किशोर कुंदन लाल सहगल को अपना आदर्श मानते. 1948 में राजस्थान के संगीतकार खेमचंद प्रकाश ने उन्हें पहला ब्रेक दिया था. फिल्म थी ‘जिद्दी’ और गाना था ‘मरने की दुआएं क्यूं मांगू, जीने की तमन्ना कौन करे.’ यह गाना उन्होंने हुबहू सहगल साहब की आवाज़ में गया. बाद में सचिन देव बर्मन ने इस पर जोर दिया कि उन्हें अपना स्टाइल विकसित करना चाहिए.

‘खोया-खोया चांद’ के लिए सचिन देव बर्मन ने किशोर कुमार को चुना था. कुछ दिन बाद उन्होंने बर्मन साहब से जाकर कहा कि वे यह गाना मोहम्मद रफ़ी से बेहतर नहीं गा सकते. बर्मन साहब ने इस गाने को रफ़ी से ही गवाया  

किशोर और रफ़ी में बेहतर कौन, इस बहस पर फैसला काफी हद तक किशोर कुमार के हक में जाता है. किशोर पर एक गाना रफ़ी साहब ने गाया भी है. 1960 में नवकेतन प्रोडक्शन की एक फिल्म ‘काला बाज़ार’ के एक प्रसिद्ध गाने ‘खोया-खोया चांद’ के लिए सचिन देव बर्मन ने किशोर कुमार को चुना था. कुछ दिन बाद उन्होंने बर्मन साहब से जाकर कहा कि वे यह गाना मोहम्मद रफ़ी से बेहतर नहीं गा सकते. बर्मन साहब ने इस गाने को रफ़ी से ही गवाया.

हालांकि, 1969 में आई फिल्म ‘प्यार का मौसम’ के गाने ‘तुम बिन जाऊं कहां...’ को किशोर और रफ़ी दोनों ही ने अपने अंदाज़ में गाया है. किशोर वाला गाना ज़्यादा हिट हुआ था. बाद में दोनों ने मिलकर कई यादगार गाने दिए और फिर ऐसा वक़्त भी आया कि किशोर दा की आंधी ने रफ़ी साहब को बिलकुल बेरोज़गार ही कर दिया था.

कुछ इसी प्रकार किशोर कुमार और मन्ना डे के बीच प्रतिस्पर्धा रही. मन्ना दा ज़बरदस्त क्लासिकल गायक थे और पक्के सुर गाने में उस्ताद. उधर किशोर ने कामचलाऊ शिक्षा ही ली थी और मन्ना दा से ज़्यादा पसंद किये जाने वाले गायक थे.

इनसे जुड़ा एक किस्सा है. फिल्म पड़ोसन में किशोर और मन्ना डे के बीच में एक गाना है जिसमें मन्ना डे महमूद की आवाज़ हैं और किशोर कुमार अपने लिए गाते हैं. गाने के अंत में किशोर महमूद यानी मन्ना डे को हरा देते हैं. जब महमूद मन्ना दा के पास गाने और इसकी सिचुएशन को लेकर गए तो वे बिफ़र गए. उन्होंने यह कहकर गाने से मना कर दिया कि वे किशोर से बेहतर गायक हैं, वे कैसे हार सकते हैं?

कहते हैं कि बात बिगड़ती देख महमूद मन्ना डे पैर पड़ गए और समझाया कि किशोर कुमार उनके आगे पासंग भी नहीं हैं, पर फिल्म में सीन ही कुछ इस तरह का है कि उन्हें हारना होगा.

बाद में मन्ना डे इस किस्से को याद करके बताते थे कि जब उन्होंने किशोर की मस्ती इस गाने में देखी तो उन्हें समझ आ गया कि उस गाने के भाव को किशोर उनसे बेहतर पकड़ पाए थे.

कुछ ऐसा ही तब हुआ जब गुलज़ार ने कमलेश्वर की कहानी पर बनी ‘आंधी’ निर्देशित की थी. ‘तेरे बिना जिंदगी से शिकवा तो नहीं’ गाने के लिए गुलज़ार की पसंद हेमंत कुमार थे. लाख कहने के बाद भी जब गुलजार नहीं माने तो पंचम ने किशोर की आवाज में इस गाने के कुछ मुखड़े रिकॉर्ड करके गुलज़ार को सुनाए. गुलज़ार भौचक्के रह गए. यह अलग बात है कि गुलज़ार और पंचम की जोड़ी का पहला गाना ‘मुसाफिर हूं यारों, न घर है न ठिकाना’ किशोर कुमार ही ने गाया था.

हाल ही में लता मंगेशकर ने यह कहकर कि उन्हें गाने में सबसे ज़्यादा आनंद किशोर कुमार के साथ आता था, इस बहस को मानो विराम दे दिया है कि कौन बेहतर था.

किशोर कुमार पर अनेक बातें हैं और किशोरपन पर अनेकों किस्से हैं. किशोर अपने अंतिम दिनों में कहने लग गए थे कि वे सब शोहरत-दौलत छोड़कर अपने पैतृक निवास खंडवा चले जायेंगे. वे ऐसा नहीं कर पाए. खंडवा के बॉम्बे बाज़ार के बीचों बीच आज भी उनकी हवेली है जो अब वीरान पड़ी है.

मध्य प्रदेश सरकार ने एक बार ऐलान किया था कि हवेली को किशोर कुमार की याद में संरक्षित किया जाएगा. पिछले दिनों खबर आई है कि संरक्षण तो छोड़िए, सरकार ने उसे गिराकर बाज़ार के लिए रास्ता बड़ा करने का फ़ैसला कर लिया है.

इमरजेंसी के दिनों में किशोर कुमार कुछ उन हस्तियों में से एक थे जिन्होंने संजय गांधी तक की बात मानने से इनकार कर दिया था. इसके चलते तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री विद्या चरण शुक्ल ने आल इंडिया रेडियो और टीवी पर उनके गानों का प्रसारण रुकवा दिया था. विडंबना देखिये, शुक्ल साहब भी एक समय पर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं.

कोई जाकर मौजूदा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को यह बता दे तो हो सकता है कि इसी बात पर किशोर कुमार की हवेली गिरने से बच जाए.