किशोर कुमार ने कुछ फिल्मों का निर्देशन भी किया था. इन 12 फिल्मों में से कुछ कभी पूरी नहीं हुईं और कुछ गुमनामी के अंधेरे में खो गई. ‘बढ़ती का नाम दाढ़ी’ जैसी फिल्में - जिसे किशोर कुमार ने ‘ख्यालों की भेलपूरी’ कहा था – हास्य को पागलपन में सराबोर करने की वजह से कल्ट क्लासिक हुईं. तीन फिल्में ऐसी भी रहीं जो उन्होंने ट्रायलॉजी की तरह बनाईं, और इनमें से एक ऐसी जिसे देखकर न सिर्फ उस दौर के समीक्षक हैरान हुए बल्कि सत्यजीत रे ने भी कहा कि मुझे उम्मीद नहीं थी कि किशोर ऐसी फिल्म भी बना सकता है.

वे बात ‘दूर गगन की छांव में’ (1964) नामक फिल्म की कर रहे थे, जो एक संजीदा फिल्म थी और परदे पर उछल-कूद करते हुए नजर आने वाले एक मसखरे हीरो के मिजाज के एकदम विलोम भी. युद्ध से वापस लौटे एक पिता द्वारा आवाज खो चुके अपने बेटे के इलाज के लिए दर-दर भटकने की इस दास्तान में किशोर कुमार ने गुरु दत्त और दिलीप कुमार जैसे अभिनेताओं की तरह ‘सीरियस’ अभिनय किया था.

उस वक्त उनका एक्टिंग करियर बुरे दौर से गुजर रहा था और उनके करीबी चाहते थे कि वे कोई मसाला या नाच-गाने वाली कॉमेडी फिल्म बनाकर अपने करियर को पटरी पर लाएं. लेकिन किशोर ने अपनी पहली निर्देशित फिल्म ही एक सीरियस फिल्म चुनी और तमाम विषमताओं से लोहा लेते हुए उसे इस कदर उम्दा बनाया कि ‘दूर गगन की छांव में’ 23 हफ्तों तक लगातार थियेटरों में चली.

कहते हैं कि शूटिंग के पहले दिन ही रोशनी पैदा करने वाले उपकरणों की कमी की वजह से दृश्यों को कार की हैडलाइट चालू कर शूट किया गया था. फिल्म को बनने में तीन साल लगे थे और रिलीज होने के एक हफ्ते तक थियेटर कम भरे रहते थे. लेकिन फिर समीक्षकों की सराहना और फिल्म देखकर प्रसन्नचित्त होकर लौटे दर्शकों द्वारा दूसरे लोगों को भी फिल्म देखने के लिए प्रेरित करने का सिलसिला ऐसा चल पड़ा कि फिल्म हाउसफुल रहने लगी. इसी दौरान, कहते हैं कि मुंबई के थियेटरों के बाहर किशोर कुमार कार में बैठकर पान खाते थे, और हाउसफुल का बोर्ड लग जाने के बाद ही घर जाते थे!

‘आ चल के तुझे मैं लेके चलूं’ नामक अमर गीत भी किशोर कुमार की इसी फिल्म की देन है. एक ऐसा नगमा, कि जब कभी पिता की उंगली थामे कोई छोटा बालक सड़क पर चलता हुआ नजर आता है, यही ख्याल आता है कि प्रकृति को पार्श्व में हमेशा यही गीत बजाना चाहिए.

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