गर्मी के मौसम में पानी की कमी से परेशान पहाड़ी इलाकों के किसानों के लिए ‘रूफ वाटर हार्वेस्टिंग’ ने एक नई उम्मीद जगा दी है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक ताजा अध्‍ययन से पता चला है कि छत के जरिये जल संरक्षण यानी वाटर हार्वेस्टिंग करना पानी की किल्‍लत से निजात दिलाने के साथ-साथ आर्थिक रूप से भी फायदेमंद हो सकता है.

यह शोध मेघालय के रि-भोई जिले के उमियम में किया गया था. इस अध्ययन से जुड़े वैज्ञानिकों के अनुसार छत पर वाटर हार्वेस्टिंग के जरिये इकट्ठा किए गए पानी का उपयोग किसानों ने जब खेती और पशुपालन में किया तो उनकी आमदनी वर्ष के उन महीनों में कई गुना बढ़ गई, जब पानी की कमी के कारण वे बेरोजगार हो जाते थे.

उमियम के 11 किसानों को इस शोध में शामिल किया गया था. इन्होंने इकट्ठा किए गए इस पानी का इस्‍तेमाल घरेलू उपयोग के अलावा ब्रॉकली, राई, शिमला मिर्च, मक्‍का, टमाटर और फ्रेंचबीन जैसी फसलों की खेती के साथ-साथ पॉल्‍ट्री एवं पशुपालन में भी किया. इससे उन्हें आर्थिक रूप से काफी फायदा हुआ.

शोधकर्ताओं के अनुसार सूअर पालन के साथ खेती करने वाले जो किसान वाटर हार्वेस्टिंग मॉडल से जुड़े थे, उन्‍हें औसतन 14,910 रुपये की शुद्ध आमदनी हुई. इसी तरह पोल्‍ट्री के साथ खेती करने वाले किसानों को 11,410 रुपये की औसत आय प्राप्‍त हुई, जो अन्‍य किसानों की आमदनी से क्रमश: 261 प्रतिशत एवं 176 प्रतिशत अधिक थी. इसके अलावा इस विधि से पानी की किल्‍लत दूर होने के साथ-साथ रोजगार में भी 221 प्रतिशत बढ़ोतरी दर्ज की गई.

अध्ययन में शामिल पूर्वोत्‍तर पर्वतीय क्षेत्र अुनसंधान परिसर के वैज्ञानिक डॉ अनूप दास ने इंडिया साइंस वायर को बताया, ‘इस प्रयोग के जरिये हम बताना चाहते हैं कि पर्वतीय इलाकों में रूफ वाटर हार्वेस्टिंग बरसात के पानी को इकट्ठा करने का उपयुक्त जरिया बन सकती है. इसकी मदद से वर्ष के सूखे महीनों में भी लघु स्‍तरीय कृषि से किसान मुनाफा कमा सकते हैं.’

उमियम के रहने वाले जिन 11 किसान परिवारों को इस अध्ययन में शामिल किया गया था उनके घर के आसपास पॉलीफिल्‍म युक्त जलकुंड (वाटर टैंक) बनाए गए. घर की छतों को कैचमेंट एरिया के तौर पर उपयोग करते हुए पानी को पाइपों के जरिये पॉलीथीन युक्‍त वाटर टैंक से जोड़ दिया गया. इस प्रयोग के लिए प्रत्‍येक किसान के घर के आसपास औसतन 500 वर्गमीटर क्षेत्र को शामिल किया गया था.

वाटर टैंकों में सिल्‍ट और गंदगी के जमाव को रोकने के लिए जस्‍ते, कंक्रीट या फिर एस्‍बेस्‍टस की छतों का उपयोग कैचमेंट एरिया के रूप में किया गया और फूस की छत पर पॉलीथीन की परत चढ़ा दी गई. शोधकर्ताओं के मुताबिक इस तरह एकत्रित किए गए पानी की गुणवत्‍ता बेहतर होती है और उसे पीने के लिए भी उपयोग कर सकते हैं. बताते हैं कि प्रत्‍येक वाटर टैंक में औसतन 53 घन मीटर पानी जमा हुआ, जिसमें अन्य मौसम में होने वाली बरसात के कारण इकट्ठा किया गया 16 घन मीटर पानी भी शामिल था.

डॉ. अनूप दास के मुताबिक पहाड़ी इलाकों में घाटियों के जलस्रोतों में तो पानी जमा हो जाता है, पर ऊंचे क्षेत्रों में मौजूद जलस्रोतों से पानी का रिसाव एक समस्‍या है. इससे निपटने के लिए जलकुंड बनाकर उसकी सतह में पॉलीथीन की परत लगाने से पानी का रिसाव नहीं हो पाता और शुष्‍क महीनों में लोग पानी की किल्‍लत से बच जाते हैं. अभी इस मॉडल में और भी सुधार किए जा सकते हैं. लेकिन इतना तो तय है कि यह मॉडल पहाड़ों के लिए उपयोगी होने के साथ-साथ कम वर्षा वाले मैदानी इलाकों में भी पानी की कमी से निपटने में कारगर साबित हो सकता है.’

मेघालय के उमियम में स्थित आईसीएआर के पूर्वोत्‍तर पर्वतीय क्षेत्र अुनसंधान परिसर, बारामती स्थित राष्‍ट्रीय अजैविक स्‍ट्रैस प्रबंधन संस्‍थान, झांसी स्थित भारतीय चरागाह और चारा प्रबंधन संस्‍थान के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया यह अध्‍ययन शोध पत्रिका करंट साइंस के ताजा अंक में प्रकाशित किया गया है. अध्‍ययनकर्ताओं की टीम में डॉ अनूप दास के अलावा आरके सिंह, जीआई रामकृष्‍ण, जयंत लयेक, एके त्रिपाठी, एसवी न्गाचान, बीयू चौधरी, डीपी पटेल, डीजे राजखोवा, देबासीश चक्रबर्ती और पीके घोष शामिल थे.