रोबोटों के अपनी ही भाषा में बात शुरू कर देने के चलते फेसबुक द्वारा एक प्रयोग बीच में ही छोड़ देने के बाद आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) बनाम इंसानी बुद्धिमता के मुद्दे पर बहस फिर तेज हो गयी है. शोधकर्ता यह देखना चाहते थे कि ये रोबोट एक दूसरे से कितनी अच्छी तरह संवाद कर सकते हैं. लेकिन प्रयोग शुरू होने के थोड़ी ही देर बाद इन रोबोटों ने सामान्य अंग्रेजी छोड़कर अपनी ही एक भाषा बना ली और उसमें बात करना शुरू कर दिया. ये भाषा वे तो समझ रहे थे लेकिन बाकी नहीं, इसलिए हड़बड़ाए शोधकर्ताओं ने तुरंत प्रयोग बंद कर दिया.

हाल में अलीबाबा समूह के संस्थापक जैक मा ने आगाह किया था कि आने वाले 30 सालों में मशीनों की बुद्धिमत्ता यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इंसानी बुद्धिमता को पछाड़ देगी जिससे दुनिया भर में नौकरियों में कमी आ सकती है. उन्होंने कहा है कि स्वचालन (ऑटोमेशन) के प्रभाव की वजह से संभव है कि लोगों को दिन में चार घंटे या हफ्ते में चार दिन ही काम करना पड़ेगा. जैक मा का तो यहां तक मानना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तीसरे विश्व युद्ध का कारण भी बन सकती है. उन्होंने कहा है कि जब-जब तकनीकी क्रांति हुई है, विश्व युद्ध हुए हैं. उनके मुताबिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तीसरी तकनीकी क्रांति है.

अलग-अलग लोग, अलग-अलग राय

कुछ महीने पहले महान वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग ने भी कुछ ऐसे ही विचार साझा किये थे. उनके मुताबिक़ फैक्ट्रियों में ऑटोमेशन लोगों को बेरोजगार कर रहा है और एआई की वजह से बेरोज़गारी कई गुना बढ़ सकती है जिसका मध्यम वर्ग पर सबसे ज़्यादा असर पड़ेगा. उन्होंने इसे ‘विध्वंसक’ तक कहा है. उनके मुताबिक़ सिर्फ भावनात्मक, रचनात्मक और पर्यवेक्षण (सुपर विज़न) वाली ही नौकरियां इंसान करेंगे, बाकी सब काम एआई के ज़रिये ही कर लिए जायेंगे. कुछ दिन पहले हॉकिंग ने यह भी कहा था कि आने वाले कुछ सौ साल में ये धरती इंसानों के रहने लायक नहीं रह जायेगी. इसका मुख्य कारण इंसानी भौतिक तरक्की होगा.

वहीं, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के सबसे बड़े विरोधी और टेस्ला, स्पेस एक्स जैसी कंपनी के चेयरमैन एलन मस्क का कहना है कि अगर इंसानों को बदलते समय के साथ प्रासंगिक रहना है तो इंसानी दिमागों को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के साथ मिलाना ही होगा. दूसरे शब्दों में कहें तो इंसान को अब साईबोर्ग (जैविक और मशीनी योग से बना जीवन) बनना होगा. मस्क मानते हैं कि कंप्यूटर एक सेकंड में एक लाख करोड़ बिट की गणना कर सकता है जबकि इंसानी दिमाग प्रति सेकंड 10 बिट की. बकौल मस्क ‘आने वाले वक़्त में जब एआई का प्रभाव बढ़ जाएगा तब इंसानी क्षमताओं का मशीन के साथ योग ही उसे प्रासंगिक बनाये रखेगा.

मस्क की कंपनी टेस्ला ड्राइवरलैस कार बनाने के प्रयास में काफी हद तक सफल हो चुकी है. गूगल भी ऐसी कारों का परीक्षण कर रहा है. मस्क भी मानते हैं आनेवाले 20 सालों के भीतर विश्वभर में 15 से 20 प्रतिशत गाड़ियां ड्राइवर रहित हो जायेंगी लिहाज़ा उतने ही लोग बेरोजगार हो जाएंगे.

देखें तो गाड़ियां ही नहीं आने वाले समय में लड़ाकू जहाज़ भी मानव रहित होंगे. ड्रोन उस कड़ी में पहला कदम है. फिर इसके बाद युद्ध भी रोबोट ही लड़ेंगे. मस्क ने एक हालिया इंटरव्यू में कहा भी था कि रोबोट इन्सानों का काम छीन लेंगे और सरकारें घर बैठे बरोजगारों को वेतन देंगीं. ज़ाहिर सी बात है मस्क यह बात मज़ाक के तौर पर नहीं कह रहे थे. मस्क तो यह भी मानते हैं कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से दुनिया को सबसे बड़ा ख़तरा उठ खड़ा हुआ है. इससे बचने के लिए वे इंसान को मंगल ग्रह पर बसाने की परिकल्पना कर रहे हैं.

एआई मंगल ग्रह पर जाकर भी इंसान को पकड़ सकती है

दूसरी तरफ़ विलक्षण प्रतिभा वाले और डीपमाइंड कंपनी से सह-संस्थापक 41 वर्षीय डेमिस हस्साबिस एआई को बढ़ाने की दिशा में अपना सब कुछ दांव पर लगा रहे हैं. डेमिस मानते हैं कि एआई मंगल ग्रह पर जाकर भी इंसान को पकड़ सकती है. गूगल द्वारा डीपमाइंड का अधिग्रहण करने से पहले एलन मस्क इसमें सबसे बड़े निवेशक थे. एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि एआई पर होने वाली तरक्की पर नज़र रखने के लिए ही उन्होंने इस कंपनी में निवेश किया था.

मस्क और डेमिस एक दुसरे को हराने में लग गए हैं. उधर गूगल, फेसबुक, माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियां एआई का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करने लगी हैं. फेसबुक जैसी सोशल मीडिया कंपनियां ‘बोट्स’ (एक तरह का कंप्यूटर जनित प्रोगाम जो एआई ही है) के ज़रिये एक टारगेट ऑडियंस तक पंहुच रही हैं.

इन कंपनियों पर इल्ज़ाम लगाये जा रहे हैं कि ये ‘बोट्स’ के ज़रिये भ्रामक प्रचार और ग़लत रायशुमारी करवा रही हैं. कुछ दिन पहले फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग और एलन मस्क में एआई को लेकर काफी नोंक-झोंक भी हुई थी. मास्क ने एक प्रोग्राम में कहा था कि वो एआई से होने वाले खतरों से दुनिया को वाकिफ करते रहेंगे पर जब लोग तब तक नहीं समझेंगे जब तक कि रोबोट गलियों और सडकों पर कत्लेआम न मचा दें.

जुकरबर्ग ने इसके तुरंत बाद बयान जारी किया था कि एलन मास्क नाहक ही दुनिया को डरा रहे हैं. उन्होंने मस्क को घोर निराशावादी तक कह डाला. इस पर पलटवार करते हुए मस्क ने कहा कि जुकरबर्ग एआई पर कम समझ रखते हैं.
डीपमाइंड के सह-संस्थापक शेन लेग ने हाल ही में क़ुबूल किया है कि टेक्नोलॉजी इंसान को विलुप्त करने में सबसे बड़ा कारण होगी.

वहीं दूसरी तरफ जानकार मान रहे हैं कि मस्क और जुकरबर्ग के बीच में इस लड़ाई का असली मुद्दा है अपनी- अपनी कंपनियों के हितों और अपनी छवि की रक्षा. उनके मुताबिक एआई तो मुद्दा है ही नहीं.

यकीन से तो नहीं कहा जा सकता कि तीसरा विश्व युद्ध होगा की नहीं पर यह भी भयावह है कि ये धरती कुछ सौ सालों में रहने लायक नहीं बचेगी. एक साक्षात्कार में स्टीफन हॉकिंग कहते हैं, ‘संभव है आने वाले कुछ सालों में हम कहीं तारों के बीच कोई नया दुनिया बसा लें, पर अभी तो हमारे पास सिर्फ एक ही ज़मीन है और इसे सब को मिलकर बचाना होगा. और इसके लिए हमें समाजों और देशों के बीच से दीवारें हटानी होंगी. हमें संसाधनों को कुछ हाथों से निकालकर सबके बीच ले जाकर बांटना होगा.’

हॉकिंग न तो किसी कंपनी के मालिक हैं और न ही उन्हें अब कोई अपनी नयी छवि गढ़नी है. थ्योरिटिकल फिजिक्स के सबसे बड़े दिग्गजों में से एक इस शख्स का नज़रिया घोर यथार्वादी और आशावादी है और यह ही सही है. जैक मा भी मानते हैं कि अंततः इंसान और मशीन की लड़ाई में इंसान मशीन को पछाड़ देगा. वे जब कहते हैं कि ‘इंसान जीत जाएंगे’ तो यकीन करने को जी हो उठता है.

चलते-चलते

आज तक किसी भी वैज्ञानिक को थ्योरिटिकल फिजिक्स के लिए नोबेल पुरस्कार नहीं मिला है. आइंस्टीन का सापेक्षता का सिद्धांत (थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी) भी थ्योरिटिकल फिजिक्स की श्रेणी में आता है. सदी के महानतम सिद्धांतों में से एक होने के बावजूद उन्हें अपने दूसरे अविष्कार ‘फोटो इलेक्ट्रिक इफ़ेक्ट’ के लिए नोबेल से सम्मानित किया गया था. जानते हैं क्यों? अल्फ्रेड नोबेल यानी नोबेल पुरस्कार के संस्थापक की पत्नी की एक थ्योरिटिकल फिजिसिस्ट के साथ अंतरंगता थी. ब्रह्माण्ड में ब्लैक होल्स की मौजूदगी स्टीफन हॉकिंग का एक मौलिक कार्य है पर अगर उन्हें नोबेल जीतना है तो थ्योरिटिकल फिजिक्स छोड़कर कुछ और पढ़ना होगा!