कुछ साल पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद की बैठक व्यवस्था में बदलाव का एक सुझाव दिया था और जो मान लिया गया. सुझाव था कि प्रश्नकाल के दौरान सत्तापक्ष का जो भी नेता जवाब दे रहा होगा वह स्पीकर के दाईं ओर यानी ट्रेजरी बेंच पर बैठने के बजाय बीच में बैठेगा और जवाब देगा. हालांकि प्रधानमंत्री से जुड़ी इस पुरानी खबर का राजनीतिक स्पेक्ट्रम के लेफ्ट विंग - राइट विंग में बंटे होने से कोई सीधा संबंध नहीं है. बस इस बहाने हमें इतनी जानकारी मिल जाती है कि भारतीय संसद में सत्तापक्ष सदन अध्यक्ष के दाईं और विपक्ष बाईं ओर बैठता है. यह व्यवस्था बहुत हद तक आधुनिक लोकतंत्र की शुरूआत करने वाली उस घटना से प्रेरित है जिसे हम फ्रांसीसी क्रांति के नाम से जानते हैं.

1779 में फ्रांस की नेशनल असेंबली दो धड़ों में बंट गई थी, जिनमें से एक लोकतांत्रिक व्यवस्था की मांग कर रहा था और दूसरा राजशाही के समर्थन में था. यह मांग जब आंदोलन का रूप लेने लगी तो तत्कालीन सम्राट लुई-16 ने नेशनल असेंबली की एक बैठक बुलाई जिसमें समाज के हर तबके के प्रतिनिधि शामिल हुए. इस बैठक में सम्राट के समर्थकों को सम्राट के दाईं और क्रांति के समर्थकों को बाईं ओर बैठने को कहा गया था. राजनीति में विचारधारा के आधार पर पहले औपचारिक बंटवारे की शुरुआत इसी बैठक व्यवस्था से मानी जाती है. तब राजशाही समर्थकों को दक्षिणपंथी (राइटिस्ट या राइट विंग) और विरोधियों के वामपंथी (लेफ्टिस्ट या लेफ्ट विंग) कहा गया था.

फ्रेंच नेशनल असेंबली में दाईं तरफ बैठने वाले लोग कुलीन, कारोबारी और धार्मिक तबके से थे, जबकि बाईं तरफ बैठने वाले ज्यादातर लोग आम नागरिक थे. यहां सम्राट के दाईं ओर बैठे यानी दक्षिण पंथ के लोग राजशाही के साथ-साथ स्थापित सामाजिक-आर्थिक परंपराओं के हिमायती थे. कुल मिलाकर ये अपनी संपत्ति और रसूख को कायम रखना चाहते थे, वहीं सम्राट के बाईं तरफ जुटे लोग यानी वाम पंथी सामाजिक समानता और नागरिक अधिकारों की मांग कर रहे थे. यह भी एक वजह है कि दक्षिणपंथियों को पूंजीवादी और वामपंथियों को समाजवादी माना जाता है. दक्षिणपंथी चूंकि बदलावों के विरोधी थे सो आगे चलकर ये कंजर्वेटिव और बदलाव के समर्थक वामपंथी प्रगतिवादी कहलाए.

समय के साथ यह राजनीतिक धारणा फ्रांस से निकलकर दुनिया के और देशों में भी पहुंची, हालांकि हर देश में इसका स्वरूप अलग-अलग है. मोटे तौर पर यह वर्गीकरण इसी बात पर हुआ कि कोई संगठन या राजनैतिक दल पूंजीवादी व्यवस्था में बदलावों का समर्थन किस हद तक करता है. वहीं यूरोप में कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंजेल्स जैसे लेखकों ने वामपंथी विचारधारा के सिद्धांतों को और स्पष्ट किया. इन दोनों ने 1848 में कम्यूनिस्ट मैनिफेस्टो लिखा था, जिसमें पूंजीवाद की खामियां बताते हुए पूरी दुनिया के मजदूरों से उसके खिलाफ एकजुट होने का आह्वान किया गया था. इस तरह लेफ्टिस्ट फिर कम्यूनिस्ट भी कहलाने लगे.

आज लेफ्ट को उदारवाद, समूहवाद, धर्मनिरपेक्षता और राइट को अथॉरिटी, व्यक्तिवाद और धार्मिक कट्टरता से जोड़कर देखा जाता है. हालांकि आखिर में यह बहस सामाजिक बराबरी और गैर-बराबरी की ही है.