उसेन बोल्ट के लिए अलविदा कहने का इससे बेहतर मौका और क्या हो सकता था. विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप थी, उनके नाम की जय जयकार करते करीब 56 हजार दर्शक थे और सामने था 100 मीटर का वह ट्रैक जिसे सबसे कम वक्त में नापने के लिहाज से वे सबसे आगे थे.

लेकिन अपराजेयता के साथ मैदान को अलविदा कहने का इस महान एथलीट का सपना पूरा न हो सका. नंगी आंखों से तीन एथलीटों के बीच लगभग बराबरी पर छूटी दिखी इस दौड़ के नतीजे जब स्क्रीन पर फ्लैश हुए तो पता चला कि जीत अमेरिका के जस्टिन गैटलिन की हुई है. गैटलिन ने 9.92 सेकेंड में दौड़ पूरी की. बोल्ट 9.95 सेकेंड का वक्त निकालकर तीसरे स्थान पर रहे.

हजारों दर्शक हैरान थे. 100 मीटर के विश्व रिकॉर्डधारी बोल्ट को भी एकबारगी अपनी आंखों पर यकीन नहीं हुआ. लेकिन जल्द ही वे इस झटके से उबर आए. उन्होंने गैटलिन को बधाई दी, उन्हें गले लगाया. इसके बाद उन्होंने जो कहा कि उसका सार यह था कि बरसों से दर्शक गैटलिन के साथ अन्याय करते रहे हैं. अमेरिकी दिग्गज एथलीट माइकल जॉनसन की भी यही राय है.

बात गलत नहीं है. जस्टिन गैटलिन और दर्शकों की हूटिंग का जैसे चोली-दामन का साथ रहा है. बीते कुछ सालों के दौरान जब भी वे ट्रैक पर उतरे उनकी जोरदार हूटिंग हुई. लंदन भी अपवाद नहीं था. बोल्ट के स्टार्टिंग लाइन पर आने के बाद जैसे ही अनाउंसर ने उनका परिचय दिया दर्शकों से जोरदार हर्षध्वनि की. दूसरी तरफ गैटलिन के परिचय के बाद जयजयकार की जगह धिक्कार सुनाई दिया. यही वजह थी कि जीतने के बाद गैटलिन ने मुंह पर उंगली रख ली, मानो दर्शकों से कह रहे हों कि अब तो हूटिंग बंद करो. बाद में उनका कहना था कि कोई अच्छा या बुरा धावक नहीं होता, बस लोगों को अच्छाई और बुराई की जंग बनाने और उसे देखने में मजा आता है. उनके मुताबिक जनता गैटलिन को बैड और बोल्ट को गुड बॉय के रूप में देखना चाहती है.

उसैन बोल्ट और जस्टिन गैटलिन का एक साथ दौड़ना इस दौर में खेल दुनिया की सबसे दिलचस्प प्रतिद्वंदिताओं में से एक रहा है. इसमें बोल्ट हमेशा नायक माने गए और गैटलिन खलनायक. इसकी वजह भी रही. ओलंपिक में आठ और विश्व चैंपियनशिप में 11 स्वर्णपदक जीतने वाले बोल्ट का डोपिंग के मामले में रिकॉर्ड बिल्कुल साफ रहा है. दूसरी तरफ गैटलिन के करियर पर प्रतिबंधों के दो बड़े दाग रहे हैं.

2004 में हुए एथेंस ओलंपिक में गैटलिन ने 100 मीटर की दौड़ जीती थी. अगले ही साल हेलसिंकी में हुई विश्व चैंपियनशिप में उन्होंने 100 और 200 मीटर, दोनों स्पर्धाओं में स्वर्ण पदक जीता. एक ही विश्व चैंपियनशिप में दोनों स्पर्धाएं जीतने वाले इतिहास के वे दूसरे धावक बन गए थे. उनकी तूती बोलने लगी थी. माना जाने लगा था कि अब अगले कुछ साल वे एथलेटिक्स की दुनिया पर राज करेंगे. 2006 में दोहा में हुए एक आयोजन के दौरान जब उन्होंने 100 मीटर की दौड़ में 9.77 सेंकेड का समय निकालकर विश्व रिकॉर्ड की बराबरी कर ली तो यह धारणा और मजबूत हो गई.

लेकिन इसके कुछ ही समय बाद उनके डोपिंग टेस्ट में नाकाम रहने की खबर आई. एक प्रतिबंधित स्टेरॉयड लेने की पुष्टि होने के बाद गैटलिन से यह रिकॉर्ड छीन लिया गया और उन पर आठ साल का प्रतिबंध लगा दिया. इससे पहले 2001 में भी उन पर दो साल का प्रतिबंध लगाया गया था. तब उन्हें एंफीटामाइन्स नामक एक दवा लेने का दोषी पाया गया था. तब गैटलिन का कहना था कि अटेंशन डेफिसिट सिंड्रोम यानी एकाग्रता की कमी के चलते यह दवा उन्हें डॉक्टर के कहने पर बचपन दी जा रही है. उनकी अपील के बाद यह प्रतिबंध एक साल में ही खत्म कर दिया गया. दूसरे प्रतिबंध के बाद भी गैटलिन ने खेल पंचाट के सामने अपील की. उनका कहना था कि उन्होंने कभी जानबूझकर कोई दवा नहीं ली. वे इस मामले की जांच में हरसंभव सहयोग के लिए भी तैयार थे. उनकी सजा आठ से घटाकर चार साल कर दी गई.

2010 में गैटलिन की वापसी हुई. शानदार शुरुआत करते हुए उन्होंने जर्मनी के रकफेयर में 100 मीटर की दौड़ जीती. 2012 में दोहा में हुई डायमंड लीग में वे इसी स्पर्धा में 9.87 सेकेंड का समय निकालते हुए पहले स्थान पर रहे. इसके बाद उन्हें उसी साल लंदन ओलंपिक में 100 मीटर में स्वर्ण पदक के दावेदारों में गिना जाने लगा था. लेकिन बोल्ट और योहान ब्लेक से पीछे रहते हुए वे तीसरे नंबर पर आए. हालांकि 9.79 सेंकेड का समय न सिर्फ उनका अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन था बल्कि 30 साल से ज्यादा की उम्र में इतने कम समय में 100 मीटर की दौड़ पूरी करने वाले वे दुनिया के पहले खिलाड़ी बन गए थे.

अगले ही साल यानी 2013 में रोम में हुई गोल्डन गाला मीट में गैटलिन ने बोल्ट को मात दी और 100 मीटर स्पर्धा का स्वर्ण पदक जीत लिया. फिर 2014 में ब्रसेल्स में हुई डायमंड लीग में उन्होंने अपना समय और कम किया और इसे 9.77 सेकेंड तक ले आए. इसी आयोजन में उन्होंने 19.71 सेकेंड का समय निकालते हुए 200 मीटर की दौड़ भी जीत ली. उनके इस प्रदर्शन को देखते हुए इसी साल उन्हें एथलीट ऑफ द ईयर के लिए भी नामांकित किया गया. कई दूसरे एथलीटों ने इसका विरोध किया था. उन्हें शक था कि गैटलिन अब भी ड्रग्स ले रहे हैं.

लेकिन जस्टिन गैटलिन इन हमलों से जैसे अप्रभावित रहे. 2015 में कतर में हुई एथलेटिक सुपर ग्रां पी में 100 मीटर की स्पर्धा उन्होंने 9.74 सेकेंड का समय निकालकर जीती. यह उनका अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था. इसके बाद बीजिंग में उनसे उम्मीदें बढ़ गई थीं. 100 और 200 मीटर के सेमीफाइनल में भी उन्होंने बोल्ट को पछाड़ भी दिया था, लेकिन फाइनल में दोनों बार बोल्ट उन पर भारी पड़े. अब बोल्ट को उनकी आखिरी रेस में हराकर उन्होंने हिसाब काफी हद तक बराबर कर लिया है.

लेकिन यह सिर्फ हिसाब बराबर करने वाली बात नहीं है. 2010 में प्रतिबंध खत्म होने के बाद से गैटलिन का सफर देखा जाए तो यह जीत उन्हें एक मायने में बोल्ट से भी ज्यादा महान बनाती है. 35 साल की उम्र और दर्शकों की गालियों का मेल किसी एथलीट के लिए ऐसा ही होता है जैसे कोई पीठ में दो भारी पत्थर बांधकर तैरे. उनकी यह उपलब्धि कितनी बड़ी है, इसका अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि मैराथन को छोड़ दें तो 35 साल की उम्र में कोई भी एथलीट दौड़ की इस स्तर की प्रतियोगिता में जीतने का कारनामा नहीं कर सका है. लंदन में गैटलिन ने 22 साल के उन क्रिश्चियन कोल को भी दूसरे स्थान पर धकेल दिया जिन्हें बोल्ट का उत्तराधिकारी कहा जा रहा है और जिनके नाम इस साल के सबसे तेज धावक का रिकॉर्ड है.

काफी समय से यह बहस गर्म थी कि क्या जस्टिन गैटलिन अब कभी उसेन बोल्ट को हरा सकेंगे. उनकी उम्र 35 साल हो चली थी और कहा जा रहा था कि भले ही बीते कुछ समय के दौरान उनका प्रदर्शन चमत्कार सरीखा हो, लेकिन यह बस कुछ ही वक्त की बात है.

लेकिन गैटलिन ने साबित कर दिया है कि चमत्कार की कोई उम्र नहीं होती.