भारतीय ऑटोमोबाइल बाजार दुनिया के सबसे तेज बढ़ते बाजारों में शुमार है. यहां टिके रहने के लिए किसी भी प्रोडक्ट का लुक्स, फीचर्स और परफॉर्मेंस जैसे हर मामले में सबसे बेहतरीन होना पहली शर्त है. भारत में ग्राहक सुविधाओं के साथ बजट का भी खासा ख्याल रखते हैं. वाहन निर्माता ग्राहकों को लुभाने के लिए अपनी पुरानी गाड़ियों में बदलाव के साथ समय-समय पर नई गाड़ियां बाजार में उतारते रहते हैं. जाहिर है इन कारों से इनकी कंपनियों को खासी उम्मीद भी रहती है. लेकिन कई बार ये गाड़ियां तमाम प्रचार के बावजूद ग्राहकों को आकर्षित करने में असफल रहती हैं और एक तरह से फ्लॉप या फेल की श्रेणी में आ खड़ी होती हैं. यहां हम ऐसी ही पांच गाड़ियों की बात करेंगे जिनके लिए ग्राहकों ने इंतजार तो खूब किया लेकिन अलग-अलग कमियों के चलते इन्हें स्वीकार नहीं कर सके.

टाटा बोल्ट

जब टाटा मोटर्स ने बोल्ट को बाजार में उतारा था तो इसे कंपनी की ही लोकप्रिय हैचबैक इंडिका विस्टा के नए अवतार के तौर पर देखा गया. वजह थी इसकी बेहतर क्वालिटी, ज्यादा वेरिएंट और सेगमेंट की बाकी गाड़ियों की तुलना में शानदार फीचर्स. कंपनी को उम्मीद थी कि मारुति स्विफ्ट के वर्चस्व वाले इस सेगमेंट में बोल्ट कमाल करेगी. लेकिन लॉन्च होने के कुछ ही महीनों के भीतर इससे जुड़ी शिकायतें सामने आने लगीं. हालात ये हो गए कि इस कार की बिक्री बढ़ाने के लिए टाटा मोटर्स को लॉन्चिंग के दूसरे महीने से ही इसकी कीमतों में रियायत देनी पड़ी. हालांकि बोल्ट शुरुआती झटके से उबर नहीं सकी और बुरी तरह पिट गयी.

कारण

जानकार बोल्ट की कीमतों को इसके बाजार में न चल पाने की प्रमुख वजह मानते हैं. इसके अलावा ग्राहकों को यह गाड़ी दिखने में काफी हद तक इंडिका विस्टा जैसी लगती थी जो उस समय अपने ढलान पर थी. दूसरी तरफ बाजार में स्विफ्ट जैसी कार थी जो आफ्टर सेल्स के मामले में ग्राहकों को मन की शांति देती थी. यह बात टाटा के साथ नहीं थी. इसके अलावा इसी सेगमेंट में ग्रांड आई 10 थी जो लुक्स के मामले में ग्राहकों को ज्यादा अपील करती थी. नतीजन बोल्ट ग्राहकों को अपनी तरफ आकर्षित करने में नाकामयाब रही.

टाटा नैनो

आम आदमी की कार कही जाने वाली नैनो को टाटा मोटर्स एक नए युग की शुरुआत की तरह देख रही थी. मगर ऐसा हुआ नहीं. यूं तो नैनो कम बजट में संतोषजनक फीचर्स और लुक से लैस थी. लेकिन अपनी शुरुआत के कुछ महीनों को छोड़ यह कार ऐसा कोई चमत्कार नहीं कर पाई जिस तरह की उम्मीद इससे की गई थी. हालांकि छोटे टर्निंग रेडियस और इंजन पीछे होने से रियर व्हील ड्राइव के चलते कुछ पहाड़ी इलाकों में इसे ठीक-ठाक प्रतिक्रिया जरूर मिली, लेकिन देश के ज्यादातर इलाकों में इस कार को नकार दिया गया. बुरे सेल्स फिगर के चलते पिछले महीने टाटा ने नैनो का प्रोडक्शन बंद करने की घोषणा कर दी है.

टाटा नेनो
टाटा नेनो

कारण

इसके पीछे जानकार टाटा की रणनीतियों को जिम्मेदार ठहराते हैं. भारत जैसे देश में जहां कार को सुविधा से ज्यादा शान का पर्याय समझा जाता है वहां टाटा मोटर्स ने इस कार को लखटकिया कार की तरह पेश किया. जाहिर है कोई भी अपने साथ कम बजट की कार को नहीं जोड़ना चाहता. खुद रतन टाटा ने इस बात को मीडिया के सामने स्वीकार किया था. टाटा की इस रणनीतिक चूक का खामियाजा नैनो को उठाना पड़ा और यह कार उस मुकाम तक नहीं पहुंच पायी जहां इसे होना चाहिए था.

डैटसन गो+

जापानी ऑटोमोबाइल कंपनी निसान की ही ब्रांड डैटसन ने बड़ी उम्मीदों के साथ अपनी कार गो+ को देश के बाजार में उतारा था. दरअसल पिछले कुछ सालों में कम बजट की शुरुआती कारों को बाजार से मिलने वाले रेसपॉन्स में जबरदस्त बढ़ोतरी दर्ज हुई है. लिहाजा निसान ने भी गो+ के साथ इस सेगमेंट में हाथ आजमाना चाहा. विशेषज्ञों ने इस कार के फीचर्स, सीटिंग क्षमता और लुक को इसके बजट से ऊपर का बताया. लेकिन यह कार भारतीय बाजार में कोई खास कमाल नहीं दिखा पायी. लिहाजा कंपनी को यह गाड़ी रिप्लेस कर 2016 में रेडी-गो पेश करनी पड़ी.

डैटसन गो+
डैटसन गो+

कारण

इस कार के फ्लॉप होने के पीछे जानकार इसकी ब्रांड इमेज को मानते हैं. दरअसल ग्राहकों के जिस वर्ग के लिए डैटसन की कारें तैयार की जा रही हैं उसका बड़ा हिस्सा अभी भी इस नाम से अनजान है. देश में डैटसन के सीमित शोरूम और सर्विस सेंटर होना इसका बड़ा कारण है. इसके अलावा इस रेंज में बाजार में मारुति और ह्युंडई जैसे पुराने दिग्गज मौजूद हैं जिन्हें हिलाना इतना आसान नहीं है. हां, रेनो क्विड को अपवाद के तौर पर देखा जा सकता है.

होंडा मोबिलियो

जापानी कंपनी होंडा की मल्टीयूटिलिटी व्हीकल (एमपीवी) मोबिलियो देश की उन कारों में से है जो साबित करती हैं कि गलाकाट प्रतिस्पर्धा के दौर में सिर्फ बड़ा नाम ग्राहकों को खींचने के लिए काफी नहीं होता. मोबिलियो की शुरुआत में उम्मीदें जताई गयीं कि यह कार सेडान सिटी और अमेज़ की तरह होंडा के लिए सफलता के नए आयाम गढ़ सकती है. लेकिन इस कार को बाजार ने पूरी तरह नकार दिया. नतीजन घाटे में चल रही इस कार का निर्माण रोकना होंडा ने ज्यादा मुनासिब समझा.

होंडा मोबिलियो
होंडा मोबिलियो

कारण

जब सामने मारुति अर्टिगा जैसी कार की टक्कर में कोई गाड़ी उतारी जाए तो ग्राहकों की उम्मीदें कई गुना बढ़ जाती हैं. मोबिलियो इन पर खरी नहीं उतर सकी. ग्राहकों ने शिकायत की कि होंडा नाम होने के बावजूद इस कार की ‘बिल्ड क्वालिटी’ बहुत अच्छी नहीं है. इसके अलावा, कीमत ज्यादा होने के बावजूद इसके इंटीरियर्स हूबहू कंपनी की हैचबैक ब्रियो जैसे ही थे जो 10 साल पुराने लगते थे. लोगों की शिकायत इसके बाहरी लुक से भी थी. उनके मुताबिक मोबिलियों को देखकर ऐसा लगता था जैसे ब्रियो को ही खींचकर बड़ा कर दिया गया हो.

फोर्ड फिएस्टा फेसलिफ्ट

लंबे समय से इकोस्पोर्ट के अलावा फोर्ड की अधिकतर गाड़ियों को बाजार में अपेक्षित प्रतिक्रिया नहीं मिल रही है. फोर्ड फिएस्टा फेसलिफ्ट भी उन्हीं गाड़ियों में शुमार है. इसकी लॉन्चिंग के समय फोर्ड ने पहले की तुलना में इसकी कीमतों में खासी कटौती की थी. लेकिन यह गाड़ी कुछ खास कमाल नहीं दिखा पायी.

फोर्ड फिएस्टा
फोर्ड फिएस्टा

कारण

माना जाता है कि फोर्ड की मजबूती और ज्यादा फीचर्स होने के बावजूद इस कार को इसके पुराने वेरिएंट की ज्यादा कीमतों का खामियाजा भुगतना पड़ा. लॉन्च के वक्त यह अपने सेगमेंट से सबसे महंगी कार थी. ग्राहकों ने इसकी तुलना में मारुति सियाज, होंडा सिटी और ह्यूंडई वर्ना को तरजीह दी. जब तक फोर्ड ने कीमतें घटाईं तब तक काफी देर हो चुकी थी. भारतीय कार बाजार में एक बार मोर्चा ढह जाए तो इससे उबरना असंभव सा हो जाता है. फिएस्टा के साथ भी ऐसा ही हुआ.