कोलकाता में दुनिया दूसरी तरह से चलती है. नवरात्रि में बाकी देश उपवास करता है. कोलकाता में लोगों के लिए दुर्गा पूजा का मतलब होता है भव्य भोजन. पूरे देश में दशहरा उल्लास के साथ मनाया जाता है. कोलकाता में बिजया को लोगों की आंखें नम होती हैं. दीवाली के दिन बाकी भारत में लक्ष्मी पूजा होती है तो कोलकाता में काली पूजा. इसलिए यह हैरानी की बात नहीं कि रक्षा बंधन के मामले में भी यहां का एक अलग किस्सा है.

यह किस्सा 1905 में शुरू हुआ था. उन दिनों ब्रिटिश भारत के वायसराय और गवर्नर जनरल लार्ज कर्जन ने बंगाल के विभाजन का ऐलान किया. तब के बंगाल में आज का पश्चिम बंगाल, बिहार, उड़ीसा, असम और वह इलाका भी शामिल था जिसे हम बांग्लादेश कहते हैं. क्षेत्रफल में यह फ्रांस जितना बड़ा था लेकिन इसकी आबादी कई गुना ज्यादा थी. इतने बड़े सूबे खासकर इसके पूर्वी हिस्से का प्रशासन संभालना ब्रिटिश सरकार के लिए मुश्किल साबित हो रहा था इसलिए सरकार ने इसके दो टुकड़े करने का ऐलान कर दिया. योजना के तहत असम के साथ ढाका, त्रिपुरा, नोआखाली, चटगांव और मालदा जैसे इलाकों को मिलाकर पूर्वी बंगाल और असम नाम का एक नया राज्य बनना था.

ब्रिटिश सरकार ने कहा कि ऐसा उसे मजबूरी में करना पड़ रहा है और इससे प्रशासनिक कामकाम बेहतर होगा. लेकिन बंगाली समुदाय को इसमें छिपी साजिश की गंध आ गई. बंगाल का पूर्वी हिस्सा मुस्लिम बहुल था जबकि पश्चिमी हिस्से में हिंदू समुदाय की आबादी ज्यादा थी. जल्द ही लोगों में चर्चा होने लगी कि यह अंग्रेजों की बांटो और राज करो वाली पुरानी चाल है.

संयुक्त बंगाल का नक्शा, फोटो :  ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस
संयुक्त बंगाल का नक्शा, फोटो : ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस

बंगाल के बंटवारे का पूरे देश में भारी विरोध होने लगा. कांग्रेस ने इसके विरोध में स्वदेशी अभियान की घोषणा की. इसके तहत सारे विदेशी सामानों का बहिष्कार किया जाना था. यानी ब्रिटिश सरकार पर वहां चोट करने की तैयारी हुई जहां इसे सबसे ज्यादा दर्द हो. पूरे देश में विदेशी कपड़ों की होली जलाना आम बात हो गई.

लेकिन बाकी मामलों की तरह बंगाल में इस विरोध ने एक अलग और अनोखा रास्ता अख्तियार किया. इस रास्ते के प्रणेता थे रबींद्रनाथ टैगोर. टैगोर ने ऐलान किया कि बंटवारे के दिन यानी 16 अक्टूबर को राष्ट्रीय शोक दिवस होगा- बंगालियों के घर में उस दिन खाना नहीं बनेगा. बंगाल के हिंदुओं और मुसलमानों के आपसी भाईचारे का संदेश देने के लिए टैगोर ने राखी का उपयोग किया. रबींद्रनाथ टैगोर चाहते थे कि हिंदू और मुसलमान एक दूसरे को राखी बांधें और शपथ लें कि वे जीवनभर एक-दूसरे की सुरक्षा का एक ऐसा रिश्ता बनाए रखेंगे जिसे कोई तोड़ न सके.

16 अक्टूबर को टैगोर ने गंगा में डुबकी के साथ अपना दिन शुरू किया. गंगा किनारे से उनकी अगुवाई में एक जुलूस शुरू हुआ. टैगोर कोलकाता की सड़कों पर चलते जा रहे थे और जो भी मिल रहा था उसे राखी बांध रहे थे. यह उत्साही कवि अपने साथ राखियों का अंबार लेकर निकला था. हालांकि जब उन्होंने अपने घर के पास बनी एक मस्जिद में जाकर अंदर मौजूद मौलवियों को राखी बांधने की बात कही तो लोगों को लगा कि वे उत्साह के अतिरेक में चीजों को बहुत आगे ले जा रहे हैं. लेकिन टैगोर पीछे हटने वाले नहीं थे. मौलवियों को भी इस पर कोई ऐतराज नहीं था. इस तरह जुलूस आगे बढ़ता गया.

टैगोर जहां-जहां से गुजरे, सड़क के दोनों तरफ लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा. उनके साथ चल रहे लोग खासकर इस मौके के लिए लिखा गया उनका गीत गा रहे थे. इस गीत में ईश्वर से बंगाल को सुरक्षित और एकजुट रखने की प्रार्थना की गई थी. छतों पर खड़ी महिलाएं जुलूस पर चावल फेंक रही थीं और शंख बजा रही थीं.

इस विरोध अभियान का असर हुआ. कुछ समय के लिए बंगाल विभाजित होने से बच गया. हालांकि अंग्रेजों के लिए बंगाल को संभालना मुश्किल हो रहा था इसलिए 1912 में बिहार, असम और उड़ीसा को इससे अलग कर दिया गया. इस बार यह बंटवारा भाषाई आधार पर हुआ था. इसके 35 साल बाद सीधी कार्रवाई के तहत जो खूनखराबा हुआ उसने एकजुट बंगाल के सपने का आखिरकार अंत कर दिया.