इस आलेख को अपूर्वानंद जी द्वारा इसी विषय पर लिखे गए आलेख की अगली कड़ी के रूप में पढ़ा जाना चाहिए. उन्होंने अपने आलेख के अंत में लिखा है - ‘1942 को राजनीतिक भाषा के शानदार प्रयोग के लिए भी फिर से पढ़ा जाना चाहिए. खुद गांधी की भाषा इस समय अग्नि में पड़े कुंदन की तरह दमकने लगती है.’ इस तरह उनका आलेख पाठकों में एक जिज्ञासा पैदा करता है. वे जानना चाह सकते हैं कि इस दौरान गांधी की भाषा वास्तव में कैसी थी. इस आलेख में हमारी कोशिश है कि 1942 के गांधीजी के कुछ ऐसे उद्गार संक्षेप में रख सकें

1942 में गांधी ही सबकी अपेक्षाओं के केंद्र में थे और यही कारण था कि वे सबके निशाने पर भी थे. उन्हें बार-बार अपने ही लोगों को स्पष्टीकरण देने की स्थितियां पैदा हो रही थीं. इस दौरान वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, इसके अलग-अलग धड़े, हिन्दू महासभा, मुस्लिम लीग, कम्युनिस्ट, ब्रिटिश सरकार, ब्रिटिश और अमेरिकी अखबार, युद्धरत मित्र-राष्ट्र और यहां तक कि धुरी-राष्ट्र तक को संबोधित करने का प्रयास करते हैं.

एक तरफ जहां अन्य पक्षों की भाषा उत्तेजक और हिंसक हो, वहां उसका जवाब किस तरह एक अहिंसक और विनोदपूर्ण लेकिन सारगर्भित भाषा में दिया जा सकता है, वह गांधी जी की भाषा में देखने को मिलता है. लेकिन यह कोई भाषा की कारीगरी मात्र नहीं थी. यह उनके जीवन-दर्शन और लंबी साधना से उपजे राजनीतिक आत्मविश्वास और आध्यात्मिक करुणा का फल था.

अपने विरोधियों को धैर्यपूर्वक सुनना, उनके विरोध को मान्यता देना, उनके हृदय परिवर्तन के लिए मैत्रीपूर्ण संवाद को एकमात्र रास्ता मानना, निराशा को अपने ऊपर हावी न होने देना, आरोपों से घबराकर सत्यमार्ग से न डिगना, अहिंसा का दामन कभी न छोड़ना, इन सारी कसौटियों पर गांधी इस दौरान कसे जाते रहे और खरे उतरते रहे.

नीरो की तरह आग लगाकर सेवाग्राम में बैठकर तमाशा देखने का संदर्भ :

ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ एक बड़े आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार हो चुकी थी. हालांकि अलग-अलग पक्षों में खींचतान जारी थी. इसी बीच किसी पत्रलेखक ने गांधीजी को लिखा- ‘आपके और नीरो के बीच फर्क क्या है? जब रोम जल रहा था, वह सारंगी बजा रहा था. आप भी क्या देश में आग लगाकर — जो आपसे बुझेगी नहीं—सेवाग्राम में बैठे सारंगी बजाएंगे?’

12 जुलाई, 1942 को ‘हरिजन’ में गांधीजी ने इस पत्र को छापते हुए इसके जवाब में लिखा- ‘अगर मुझे दियासलाई लगानी ही पड़ी, और वह ‘सीलीतीली’ न साबित हुई, तो मेरे और नीरो के बीच का फर्क मालूम हो जाएगा. अगर मैं अपने हाथों जलाई ज्वालाओं पर काबू न रख सका, तो आप मुझे सेवाग्राम में सारंगी बजाते देखने के बदले उनमें जलते देखने की आशा रख सकते हैं. लेकिन मुझे आपसे एक शिकायत है. एक ऐसे कर्ज को चुकाने के लिए, जो बहुत पहले चुका दिया जाना चाहिए—और सो भी ऐसे वक्त में जब उसे चुकाकर ही मैं जिंदा रह सकता हूं— यदि मैं कोई कार्रवाई करूं तो उसके फलस्वरूप जो कुछ भी हो, उस सबका दोष आप मेरे मत्थे ही क्यों मढ़ते हैं?’

‘स्कूलों में हमारे शासक हमारे बच्चों से यह गवाते हैं: “अंग्रेज कभी गुलाम नहीं बनेंगे.” लेकिन उनके गुलाम किस उमंग से इस गीत को गाएं? आज अंग्रेज अपनी आजादी की हिफाजत के लिए पानी की तरह खून बहा रहे हैं और मिट्टी की तरह सोना लुटा रहे हैं. क्या उन्हें हिन्दुस्तान और अफ्रीका को गुलाम बनाने का अधिकार है. अपनी इन बेड़ियों को तोड़ने के लिए हिन्दुस्तान की जनता अंग्रेजों से कम कोशिश क्यों करे? जो आदमी जिंदा ही मर रहा है और अपने दिल की आग को बुझाने के लिए अपनी ही चिता सुलगाता है, उसके कार्य की तुलना नीरो के कार्य के साथ करना भाषा का दुरुपयोग है. ’

राजनीति में मुहावरों के सतही दुरुपयोग और भाषा की सारी मर्यादा त्यागे जाने के दौर में भाषा के प्रति गांधीजी की यह चेतावनी क्या हम आज फिर से सुनना-समझना चाहेंगे?

मुस्लिम लीग द्वारा पाकिस्तान की मांग के संदर्भ में

1942 के आंदोलन के शुरू होने से ठीक पहले मुस्लिम लीग के किसी कार्यकर्ता ने गांधीजी को पत्र लिखकर पूछा- ‘मुसलमानों के साथ समझौता करने से पहले आप आजादी के लिए देशव्यापी आंदोलन शुरू करने की बात सोच कैसे सकते हैं?’ 12 जुलाई, 1942 को हरिजन में ऐसे सवालों का जवाब देते हुए गांधी कहते हैं- ‘मेरे आलोचक कहते हैं: “पाकिस्तान दे दो.” मैं कहता हूं- “वह मेरे हाथ में नहीं है.” अगर मुझे इस मांग के औचित्य का विश्वास हो जाए तो मैं निश्चय ही लीग के साथ मिलकर उसके लिए मेहनत करूं. लेकिन वही तो हो नहीं रहा है. मैं चाहता हूं कि कोई मुझे विश्वास करा दे. अभी तक किसी ने मुझे उसके सभी फलितार्थ नहीं बताए हैं. पाकिस्तान-विरोधी पत्रों में जो बताए जाते हैं, उनकी तो कल्पना करते भी डर लगता है. लेकिन मैं पाकिस्तान की मांग को उसके विरोधियों की नजर से नहीं समझना चाहता. उसके हिमायती ही बता सकते हैं कि वे क्या चाहते हैं और उनका आशय क्या है. मैं चाहता हूं कि इस तरह का स्पष्टीकरण कोई करे.’

अपने इस लेख में उन्होंने यह भी कहा था कि ‘मुझे विश्वास है कि जिस हिन्दुस्तान को अंग्रेज तीन सौ वर्षों से मजे से लूटते चले आ रहे हैं, उसे छोड़ने की ब्रिटिश अनिच्छा के सिवा हिन्दुस्तान की आजादी के मार्ग में और कोई रुकावट नहीं है.’

गांधी की अहिंसा बनाम द्वितीय विश्वयुद्ध में भागीदारी का संदर्भ

यह एक बड़ा प्रश्न था कि यदि अंग्रेज 1942 में ही तत्क्षण भारत छोड़कर चले जाएं, तो जापान या धुरी-राष्ट्रों के साथ अवश्यंभावी युद्ध के प्रति भारत का रवैया क्या होगा? ब्रिटिश और अमेरिकी अखबारों ने इस बारे में गांधीजी की अहिंसावादी सिद्धांत और कांग्रेस के विरोधाभासी रवैये पर लगातार कटाक्ष करने शुरू कर दिए थे. ‘मैनचेस्टर गार्जियन’ अखबार द्वारा अपने संपादकीय में उठाए गए ऐसे ही प्रश्न पर अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए गांधी ने अपने उसी आत्मविश्वास, सुस्पष्टता और सधी हुई भाषा का परिचय दिया था.

2 अगस्त, 1942 को वह लिखते हैं- ‘कांग्रेस अहिंसा को धर्म के रूप में नहीं मानती. जैसा कि ‘मैंचेस्टर गार्जियन’ ने ठीक ही कहा है, इस मामले में मैं जिस चरम सीमा तक जाता हूं, उस तक बहुत थोड़े ही लोग जाते हैं. मौलाना आजाद और पंडित नेहरू सशस्त्र प्रतिरोध करने में विश्वास रखते हैं. और मैं इसमें यह और जोड़ दूं कि बहुतेरे कांग्रेसजन भी रखते हैं. इसलिए, समूचे देश में कहिए या कांग्रेस में कहिए, मेरे साथ तो बहुत ही थोड़े लोग होंगे. लेकिन, जहां तक मेरा संबंध है, मैं यदि सिर्फ अकेला रह जाऊं तो भी मेरा मार्ग तो स्पष्ट ही है...’

‘...यह मेरी अहिंसा की परीक्षा का समय है. मुझे आशा है कि मैं इस अग्नि-परीक्षा से अछूता बाहर आ सकूंगा. अहिंसा की प्रभावकारिता में मेरी श्रद्धा अटल है. अगर मैं हिन्दुस्तान, ब्रिटेन, अमेरिका और धुरी-राष्ट्रों सहित सारी दुनिया को अहिंसा की दिशा में मोड़ सकूं तो जरूर ही मोड़ना चाहूंगा. लेकिन अकेले मानवी पुरुषार्थ से यह चमत्कार हो नहीं सकता. यह तो भगवान के हाथ की बात है. मेरा काम तो ‘करना या मरना’ है. निश्चय ही ‘मैंचेस्टर गार्जियन’ इस सच्ची चीज से—शुद्ध अहिंसा से—नहीं डरता. इससे कोई भी नहीं डरता. न डरने की जरूरत है.’

सात और आठ अगस्त, 1942 को बम्बई में एआईसीसी की ऐतिहासिक बैठक में

सात अगस्त को जब भारत छोड़ो आंदोलन के प्रस्ताव पर विचार के लिए हुई अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी की बैठक में गांधीजी ने कहा - ‘स्वतंत्रता प्राप्त करके ही आपका काम खत्म नहीं हो जाएगा. हमारी कार्ययोजना में तानाशाहों के लिए कोई जगह नहीं है. हमारा ध्येय स्वतंत्रता प्राप्त करना है और उसके बाद जो भी शासन संभाल सके संभाल ले. संभव है आप सत्ता पारसियों को सौंपने का फैसला करें. आपको यह नहीं कहना चाहिए कि सत्ता पारसियों को क्यों सौंपी जाए. संभव है सत्ता उन्हें सौंपी जाए जिनके नाम कांग्रेस में कभी सुने न गए हों. यह फैसला करना लोगों का काम होगा. आपको यह नहीं सोचना चाहिए कि संघर्ष करनेवालों में अधिक संख्या हिन्दुओं की थी और मुसलमानों और पारसियों की संख्या कम थी. ...यदि आपके मन में लेशमात्र भी सांप्रदायिकता की छाप है तो आपको संघर्ष से दूर रहना चाहिए.’

‘...अगर आप सच्ची आजादी पाना चाहते हैं तो आपको मेल-जोल पैदा करना होगा. ऐसे मेल-जोल से ही सच्चा लोकतंत्र पैदा होगा— ऐसा लोकतंत्र जैसा कि पहले देखने में नहीं आया और न ही जिसके लिए पहले कभी कोशिश ही की गई. ...मेरे लोकतंत्र का मतलब है कि हर व्यक्ति अपना मालिक खुद हो. ...कुछ लोग शायद कहें कि मैं खयालों की दुनिया में रहता हूं. परंतु मैं आपसे कहता हूं कि मैं असली बनिया हूं और मेरा धन्धा स्वराज्य प्राप्त करना है. एक व्यवहार-कुशल बनिये के रूप में मेरा कहना है कि यदि आप (अहिंसात्मक आचरण की) पूरी कीमत चुकाने को तैयार हों. तो इस प्रस्ताव को पास कीजिए, अन्यथा इसे पास मत कीजिए.’

वहीं आठ अगस्त, 1942 को जब यह प्रस्ताव पास कर दिया गया, तो प्रस्ताव के विरुद्ध वोट देनेवाले 13 लोगों को बधाई देते हुए उन्होंने कहा- ‘आपने ऐसा कोई काम नहीं किया है जिसके लिए आपको शर्मिन्दा होने की जरूरत है. पिछले बीस वर्षों से हम यही सीखने की कोशिश करते आए हैं कि हमारे समर्थकों की संख्या बहुत कम हो और लोग हमारी हंसी उड़ाएं, तब भी हमें हिम्मत नहीं हारनी चाहिए. हमने अपने विश्वासों पर दृढ़ रहना सीखा है— यह मानते हुए कि हमारे विश्वास ठीक हैं. यह उचित ही है कि हम अपने विश्वासों के अनुसार काम करने का साहस पैदा करें, क्योंकि ऐसा करने से आदमी का चरित्र और उसका नैतिक स्तर ऊंचा होता है.’

इसी बैठक में एक स्थान पर उन्होंने यह भी कहा- ‘मैं जानता हूं कि कई ऐसे लोग हैं जो कहते हैं कि जो चीज मुझे जैसा दिखाई देता है मैं उस पर आसानी से विश्वास कर लेता हूं और मैं आसानी से धोखा खा जाने वाला आदमी हूं. मैं नहीं समझता कि मैं ऐसा बुद्धू हूं, और न मैं इतनी आसानी से धोखा खाने वाला हूं जैसा कि वे दोस्त समझते हैं. लेकिन उनकी आलोचना से मुझे दुख नहीं होता. मेरे खयाल में यह बेहतर है कि कोई मुझे धोखा देने वाला समझने के बजाए धोखा खाने वाला समझे.’ इसी बैठक के अगले दिन से भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ था और इसी की याद में हर साल नौ अगस्त को अगस्त क्रांति दिवस मनाया जाता है.

गांधीजी के उपरोक्त विचार हमारे मौजूदा राजनीतिक संदर्भों पर भी ज्यों के त्यों लागू होते दिखाई देते हैं. एक आदर्श राजनीतिक संस्कृति की एक अद्भुत तस्वीर वह हमारे सामने रखते हैं. उनकी भाषा सीधे हृदय से निकलकर हृदय तक पहुंचने वाली भाषा है. क्योंकि वह राजनीतिक होते हुए भी अपने मूल में मानवीय है, नैतिक है. राजनीति जब मानवीयता और नैतिकता की न्यूनतम शर्तों को लांघने लगती है, तो उसकी भाषा वैसी ही हो जाती है, जैसी शायद आज हमारी होती जा रही है.