लंबे समय से सुर्खियों में रहे गुजरात के राज्य सभा सीटों के चुनावी नतीजे आ चुके हैं. यहां तीन में से दो सीटें भारतीय जनता पार्टी के पाले में गयी हैं. इन पर पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी को आसान जीत मिली है. लेकिन जिस तीसरी सीट को लेकर राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा थी, उस पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार और पार्टी के वरिष्ठ नेता अहमद पटेल ने बाजी मार ली है.

दरअसल इस पूरे चुनाव को लेकर शुरू से ही राजनीति गरमाई हुई थी. मंगलवार को इसका ताप अपने चरम पर पहुंच गया जब कांग्रेस ने अपने दो बागी विधायकों राघव जी पटेल और भोला पटेल द्वारा भाजपा नेताओं को अपनी मतपर्ची दिखाए जाने के बाद हो-हल्ला शुरू कर दिया. दोनों विधायकों के वोट रद्द करने की मांग पर अड़ी कांग्रेस का कहना था कि व्हिप जारी होने के बाद मतपर्ची नहीं दिखाई जा सकती. चुनाव आयोग के सामने अपने पक्ष में दलील देते हुए कांग्रेस ने पिछले साल हुए हरियाणा में हुए चुनावों का हवाला दिया, जहां इसी वजह से पार्टी के एक विधायक का वोट रद्द कर दिया गया था.

पूरे मामले को लेकर भाजपा भी तुरंत एक्शन में आ गई और केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने तुरंत दो अन्य मंत्रियों रविशंकर प्रसाद और पीयूष गोयल के साथ चुनाव आयोग में जाकर अधिकारियों मुलाकात की. आयोग के सामने उन्होंने कांग्रेस के आरोपों को निराधार बताते हुए जल्द ही मतगणना शुरू करने की मांग रखी.

हालांकि वोटिंग से जुड़ा वीडियो देखने के बाद चुनाव आयोग ने कांग्रेस के पक्ष में जाते हुए दोनों विधायकों के वोट रद्द करने का फैसला लिया. जानकारों के मुताबिक राज्य सभा चुनावों को लेकर सियासत में इतनी हलचल आमतौर पर नहीं देखी जाती. लेकिन यहां एक-एक वोट की लड़ाई थी जो अहमद पटेल समेत गुजरात में कांग्रेस के भविष्य से भी जुड़ी थी.

दरअसल 182 सदस्यों वाली गुजरात विधानसभा में भाजपा के 120 विधायक हैं. इनकी मदद से वह आसानी से तीन में से दो सीट जीत सकती थी. उसके बावजूद भाजपा ने तीसरी सीट पर हाल ही में कांग्रेस छोड़कर आए बलवंत सिंह के रूप में अपने प्रत्याशी को अहमद पटेल के सामने खड़ा कर दिया. इस तरह बीस साल में पहली बार गुजरात में राज्य सभा चुनाव के दौरान मतदान की नौबत आ गई.

प्रदेश के एक वरिष्ठ पत्रकार के मुताबिक पटेल से निजी नाराजगी के चलते खुद अमित शाह ने उन्हें हराने के अभियान की पूरी कमान अपने हाथ में ले रखी थी. पिछले महीने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शंकर सिंह वाघेला और उनके छह समर्थक विधायकों का कांग्रेस पार्टी छोड़ना शाह की कूटनीति का ही हिस्सा बताया जाता है.

ऐन मौके पर वाघेला के चले जाने से निश्चित तौर पर कांग्रेस को बड़ा झटका लगा था. लेकिन पार्टी ने तुरंत संभलते हुए बाकी बचे 51 विधायकों में से 44 को बेंगलुरु स्थित एक रिजॉर्ट में शिफ्ट कर दिया. पार्टी को भाजपा की सेंधमारी से बचाने की इस मुहिम में कांग्रेस काफी हद तक सफल भी रही, जिसका नतीजा पटेल की जीत के तौर पर सामने आया है. इनमें से 43 विधायकों ने पटेल के पक्ष में वोट दिया था. इनके अलावा पटेल को एनसीपी और जदयू के एक-एक विधायक का भी समर्थन मिला.

गुजरात की राजनीति पर नजर रखने वाले जानकारों का कहना है कि निश्चित तौर पर यह जीत कांग्रेस कार्यकर्ताओं में नई जान फूंकने का काम करेगी. दरअसल कांग्रेस में अहमद पटेल की वही स्थिति है जो भाजपा में अमित शाह की है. राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक अगर पटेल यह चुनाव हार जाते तो गुजरात में कांग्रेस कार्यकर्ताओं की स्थिति बिल्कुल वही होती जो किसी सेनापति के अपने ही गढ़ में हारने के बाद उसकी सेना की होती है.

द टेलीग्राफ में काम कर चुके बसंत रावत इस पूरे घटनाक्रम पर चर्चा करते हुए कहते हैं कि अगर पटेल चुनाव नहीं जीत पाते तो इसका सीधा असर अगले विधान सभा चुनाव पर दिखता. उनके मुताबिक तब भाजपा अपने दावे के मुताबिक 150 तो क्या उससे भी ज्यादा सीटें जीतने में सफल रहती. लेकिन पटेल की जीत से आम कार्यकर्ता एक बार फिर आत्मविश्वास से लबरेज है. रावत के मुताबिक वाघेला के जाने के बाद पार्टी में जो निराशा का माहौल बना था, यह जीत उस माहौल को भी बदलेगी.

कांग्रेस कार्यकर्ता पटेल की इस कामयाबी को अपनी जीत से ज्यादा भाजपा की हार के तौर पर देख रहे हैं. गुजरात में शिक्षा मंत्री रह चुके कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हंसमुख पटेल ने सत्याग्रह से बातचीत के दौरान कहा कि भाजपा का पूरा ध्यान अपनी सीटें जीतने के बजाय अहमद पटेल को हराने पर था, लेकिन वह असफल रही. उनके मुताबिक, ‘आज अहमद भाई ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अध्यक्ष अमित शाह और मुख्यमंत्री विजय रुपाणी समेत पूरी भाजपा को एक साथ हरा दिया है.’