ओशो हिंदुस्तानियों की चरित्र की परिभाषा पर टिप्पणी करते हुए दूध वाले का उदाहरण देते हैं. उनका कहना है कि दूध वाले को चरित्रवान होने के लिए सिर्फ अपनी पत्नी के प्रति वफादार होना जरूरी है. इसके बाद चाहे वह दूध में कितना ही पानी मिलाता हो, हिसाब में गड़बड़ करता हो, साफ झूठ बोलता हो, उसे कोई चरित्रहीन नहीं कहेगा.

ओशो चरित्र को लेकर रचे इस सामाजिक पाखंड पर हमेशा हमला करते रहे हैं. उनके इस विचार से मिलती-जुलती आवाजें आजकल फेमिनिज्म के गलियारों में भी जब-तब सुनाई दे जाती है. हालांकि कई बार इसकी व्याख्या करने वाले ईमानदारी-सच्चाई पर अपनी सुविधा को तरजीह देते नजर आते हैं यानी बाकी बातों को छोड़कर चरित्र को सिर्फ सेक्सुअल एक्टिविटी से जोड़कर न देखने की बात कहते हैं. ‘सिमरन’ के ट्रेलर में शामिल एक संवाद भी ऐसा ही कुछ कहता नजर आ रहा है.

सिमरन, इसी नाम की एक 30 साल की तलाकशुदा-एनआरआई-सिरफिरी लड़की की कहानी है. सिमरन का असली नाम प्रफुल्ल पटेल है. उसे लड़कों वाला नाम इसलिए मिला क्योंकि उसके जन्म के समय पिता को बेटा होने की उम्मीद थी और बेटे का नाम प्रफुल्ल रखा जाना पहले से तय था. ऐसे परिवार में परवरिश पाने वाली सिमरन स्वभाव से विद्रोही हो चुकी है. इसके अलावा उसकी समस्या यह है कि उसे चोरी करने और जुआ खेलने की बुरी आदत है. ट्रेलर देखते हुए सबसे पहले यह बात खटकती है कि आजाद ख्याल लड़की को उसकी बुरी आदतों और मनमानी करने से ही जोड़कर क्यों दिखाया जाता है. ट्रेलर के कुछ दृश्यों से लगता है कि सिमरन क्लैप्टोमैनिया (चोरी करने की बीमारी या लत) की शिकार है. इसलिए अगर इस बीमारी के लिए उससे सहानुभूति रखी जाए तो भी उसे शराब पीता, चीखता-चिल्लाता देखकर अपनी शिकायत बरकरार रखी जा सकती है.

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कंगना रनोट को ट्रेलर में देखकर लगता है कि क्वीन में जहां पर वो रुक गई थीं, वहीं से आगे बढ़ गई हैं. उनका अभिनय हमेशा की तरह लाजवाब करने वाला है. ट्रेलर में वे कल्पनाएं करतीं, भावुक होतीं और चीखती चिल्लातीं भी नजर आती हैं, ठीक वैसे ही जैसे क्वीन या तनु वेड्स मनु सीरीज की फिल्मों में नजर आई थीं. इस बार खास यह है कि वे मस्ती से भरी किसी छोटी बच्ची की तरह फुदकती भी नजर आ रही हैं. कुल मिलाकर सिमरन की इस भूमिका में बतौर अदाकारा कंगना अपने सारे रंग-ढंग दिखाने वाली हैं. अतिरिक्त जानकारी के लिए बता दें कि फिल्म में कंगना की कलम से निकले कुछ संवादों को भी जगह दी गई है.

कंगना जिस तरह की फिल्में चुन रहीं है, उनसे लगता है कि उन्होंने फेमिनिज्म की सबसे आसान और सुविधाजनक परिभाषा बेहद अच्छी तरह से अपने दिमाग में बिठा ली है. यह उन्हें सफल और चर्चित बनाए रखने में बहुत काम भी आ रही है. निर्देशक हंसल मेहता की यह फिल्म भी कुछ इसी मिजाज की लग रही है. इसका हर संवाद एक सवाल उठाता नजर आता है, लेकिन इस सवाल की भाषा वही है जो सोशल मीडिया में बीते कुछ समय से इस्तेमाल की जाने लगी है. फिलहाल यह बेहद सुंदर फिल्मांकन और अभिनय के बावजूद फेमिनिज्म की लोकप्रिय परिभाषा पर गढ़ी एक फिल्म लग रही है. हंसल मेहता का असल कमाल तो फिल्म देखने पर ही पता चलेगा इसलिए 15 सितंबर के शुक्रवार का इंतजार किया जाना चाहिए, बेसब्री से.