तमिलनाडु में पिछले साल दिसंबर में एआईएडीएमके (अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) महासचिव जयललिता के निधन के बाद से शह और मात का खेल चल रहा है. माना जा रहा है कि अब तक जो सामने दिखे वे महज़ मोहरे हैं जबकि पर्दे के पीछे से खेल रहे असल खिलाड़ी हैं केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार और जयललिता की पुरानी सहयोगी वीके शशिकला. हालांकि अब जैसे-जैसे खेल निर्णायक मुकाम पर पहुंच रहा है, यह पर्दा भी हटने लगा है.

ताज़ा मिसाल शुक्रवार को दिल्ली में नज़र आई. नवनिर्वाचित उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू के शपथ ग्रहण समारोह में राज्य के मुख्यमंत्री ईके पलानिसामी (ईपीएस) और उनके पूर्ववर्ती ओ पन्नीरसेल्वम (ओपीएस) दोनों मौज़ूद थे. इस समारोह के बाद दोनों नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी मुलाकात की. सूत्र बताते हैं कि मुलाकातों के दौरान ईपीएस और ओपीएस की अगुवाई वाले एआईएडीएमके के गुटों के विलय के बारे में भी चर्चा हुई है. इंडिया टुडे के मुताबिक ईपीएस ने प्रधानमंत्री को बताया है कि पार्टी के दोनों गुटों का विलय इस सप्ताह या माह के अंत तक हो सकता है.

विलय हुआ तो किसे क्या फायदा हो सकता है?

ख़बरों के मुताबिक ईपीएस और ओपीएस की अगुवाई वाले एआईएडीएके के गुटों का विलय होने की सूरत में पार्टी से लेकर नेताओं के स्तर तक अलग-अलग तरीके से अपने-अपने फायदे का आकलन किया जा रहा है. मसलन फिलहाल इसमें चार पक्ष माने जा सकते हैं. एक, भाजपा और मोदी सरकार जो इस विलय में अहम भूमिका निभा रही है. दूसरा, एआईएडीएमके जिस पर इस वक़्त अस्तित्व का संकट है. तीसरा पक्ष ईपीएस हैं जिन्हें मुख्यमंत्री पद और सरकार बचानी है. चौथे ओपीएस हैं जो राज्य की राजनीति में फिर अपने लिए प्रभावी भूमिका तलाश रहे हैं.

पांचवां पक्ष शशिकला और दिनाकरन का है लेकिन उसके ज़िक्र से पहले शुरुआती चार पक्षों को होने वाले फायदों पर बात करना बेहतर होगा.

1. भाजपा और मोदी सरकार : एआईएडीएमके का सहारा लेकर भाजपा को तमिलनाडु में प्रभाव बढ़ाने में मदद मिलेगी. मोदी सरकार को संसद के दोनों सदनों में एआईएडीएमके के 50 सांसदों के समर्थन का भरोसा रहेगा. वैसे इन सांसदों का समर्थन अब भी मिलता है. राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति चुनाव में ईपीएस और ओपीएस दोनों ही गुटों ने भाजपा उम्मीदवारों को समर्थन दिया जो इसकी बानगी है. लेकिन भाजपा के रणनीतिकारों को लगता है कि मज़बूत-अविभाजित एआईएडीएमके उनके लिए ज़्यादा फायदेमंद है. भाजपा नेताओं के हवाले से पिछले दिनों मीडिया में ख़बरें भी आई हैं. इनके मुताबिक मोदी सरकार एआईएडीएमके को केंद्र में साझीदार बनाना चाहती है लेकिन तभी जब वह एक हो जाए.

2. एआईएडीएमके : इस साल मार्च में गुटों में विभाजित होने के बाद निर्वाचन आयोग पार्टी का चुनाव चिन्ह ज़ब्त कर चुका है. यहां तक कि आयोग ने शशिकला को पार्टी महासचिव नियुक्त किए जाने को भी मान्यता नहीं दी है. इसी महीने सूचना के अधिकार के तहत सामने आई जानकारी से यह ख़ुलासा हुआ है. यानी चुनाव आयोग के रिकॉर्ड में जयललिता की ‘दो पत्ती’ चुनाव चिन्ह वाली एआईएडीएमके है ही नहीं. उसकी जगह दो पार्टियां हैं. एक- एआईएडीएमके (पुराची थलावी अम्मा) जिसके नेता ओपीएस हैं. दूसरी एआईएडीएमके (अम्मा) जिसके मुखिया पलानिसामी हैं. यानी एआईएडीएमके को अगर मूल स्वरूप वापस चाहिए तो वह दोनों धड़ों के विलय के बाद ही संभव होगा.

3. मुख्यमंत्री ईके पलानिसामी : आय से अधिक संपत्ति के मामले में जेल जाने से पहले शशिकला ने ईके पलानिसामी को अपने मोहरे के तौर पर मुख्यमंत्री पद सौंपा था. लेकिन गुजरते वक्त के साथ उन्होंने पार्टी संगठन और सरकार दोनों में ही अपनी पकड़ मज़बूत कर ली है. बल्कि कहा तो यहां तक जा रहा है कि पार्टी और सरकार में सिर्फ ईपीएस की बात ही अब मायने रखती है. यानी ईपीएस अब ख़ुदमुख़्तार हो चुके हैं. विलय के बाद भी वे अपनी इस मज़बूत स्थिति को यूं ही क़ायम रखना चाहते हैं. इसीलिए कहा जा रहा है कि वे ओपीएस गुट के साथ विलय के लिए सिर्फ इसी शर्त पर राज़ी हो रहे हैं कि राज्य सरकार की कमान उन्हीं के हाथ में रहेगी.

4. ओ पन्नीरसेल्वम (ओपीएस) : पहले शशिकला के लिए मुख्यमंत्री का पद छोड़ने और फिर उन्हीं से बगा़वत करने के बाद ओ पन्नीरसेल्वम को लगा था कि उनके पक्ष में सुहानुभूति लहर चल पड़ेगी. शुरू-शुरू में इसके कुछ संकेत भी मिले लेकिन बीतते वक़्त के साथ उनका जनसमर्थन कमज़ोर होता दिख रहा है. इसमें बड़ी भूमिका पलानिसामी की भी रही जिन्होंने बीते छह महीने में अच्छी तरह सरकार चलाकर हवा अपनी तरफ मोड़ ली है. लिहाज़ा अब ओपीएस को भी विलय में फायदा दिख रहा है. ख़बर है कि ईपीएस गुट ने ओपीएस को दो विकल्प दिए हैं. पहला- सात सदस्यीय समिति के मुखिया के तौर पर पार्टी चलाएं और दूसरा- उपमुख्यमंत्री के तौर पर सरकार में शामिल हो जाएं.

तो क्या अब विलय तय माना जा सकता है?

नफा-नुकसान का पूरा गणित बिठा लिए लाने के बाद इसी गुरुवार को चेन्नई मेें एक अहम बैठक हुई. इसकी अध्यक्षता ख़ुद मुख्यमंत्री पलानिसामी ने की. इसमें पारित प्रस्ताव के ज़रिए पार्टी उपमहासचिव के तौर पर टीटीवी दिनाकरन की नियुक्ति को ‘अवैधानिक’ बता दिया गया. साथ में यह भी कहा गया, ‘जयललिता के बाद शशिकला को पार्टी महासचिव बनाने का फैसला आपात परिस्थिति में हुआ था. उन्हें पार्टी संविधान के मुताबिक अगले महासचिव का चुनाव होने तक ही पद पद रहना था.’ इस संकल्प के पारित होने और फिर अगले दिन दिल्ली में प्रधानमंत्री मोदी से ईपीएस की मुलाकात के बाद हर समाचार माध्यम में ख़बरें चल पड़ीं कि एआईएडीएमके के दोनों धड़ों का विलय ज़ल्द होने वाला है.

लेकिन सच यह है कि विलय की प्रक्रिया इतनी आसान भी नहीं है. उसके तीन प्रमुख कारण हो सकते हैं.

1. अभी ओपीएस गुट को पूरा भरोसा नहीं : द टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक ओपीएस गुट की ओर से कहा गया है कि उसने दो महीने पहले विलय के लिए जो दो शर्तें रखी थीं उन पर समझौता नहीं होगा. इनमें से एक शर्त- शशिकला व उनके परिवार को पार्टी से बाहर करने और दूसरी- जयललिता की मौत की सीबीआई जांच कराने की है. ख़ास यह है कि ईपीएस गुट ने गुरुवार को जो संकल्प पारित किया है उसमें शशिकला और दिनाकरन के निष्कासन की बात कहीं नहीं है.

2. ईपीएस का सतर्कता भरा रुख : ईपीएस गुट की ओर से पारित संकल्प में दिनाकरन की नियुक्ति को ही ‘अवैधानिक और पार्टी संविधान के ख़िलाफ’ बताया गया है. शशिकला के बारे में ऐसे सख़्त शब्दों का प्रयोग नहीं किया गया है. साथ ही इस संकल्प पर शशिकला की ओर से पार्टी के प्रेसीडियम चेयरमैन और कोषाध्यक्ष बनाए गए केए सेंगोट्‌टैयन व डिंडीगुल श्रीनिवासन के दस्तख़त भी नहीं हैं. हालांकि ये दोनों गुरुवार की बैठक में मौज़ूद जरूर थे.

3. सरकार को ख़तरा : पलानिसामी की सरकार सिर्फ 122 विधायकाें के समर्थन से चल रही है. विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 118 है. इस वक़्त एआईएडीएमके के 10 से 12 विधायक ओपीएस गुट के साथ हैं. लेकिन इससे दोगुने से ज़्यादा यानी क़रीब 25-26 विधायक दिनाकरन के साथ बताए जा रहे हैं. बीती जून में जब ईपीएस-ओपीएस गुटों के विलय की बात चली थी. तब इन विधायकों ने खुलकर दिनाकरन का समर्थन किया था.

दिनाकरन के संकेत को समझें तो लड़ाई लंबी चलने वाली है

अब अंत में पांचवें पक्ष शशिकला-दिनाकरन की बात. ईपीएस गुट ने जैसे ही दिनाकरन की नियुक्ति को पार्टी संविधान के ख़िलाफ बताने वाला संकल्प पारित किया वैसे ही इस लड़ाई के लंबी चलने के संकेत भी मिलने लगे. दिनाकरन ने गुरुवार को ही साफ कहा, ‘पार्टी पर हमारा पूरा नियंत्रण है. कैडर (ज़मीनी कार्यकर्ता) हमारे साथ हैं. पार्टी को बचाने के लिए हम हर तरह के कदम उठाने को तैयार हैं. ज़रूरत पड़ी तो सर्जिकल कार्रवाई भी करेंगे.’

मुख्यमंत्री पलानिसामी का नाम लिए बग़ैर दिनाकरन ने कहा, ‘वे लोग जो यह भूल गए हैं कि उन्हें किसने नियुक्त किया है उनके ख़िलाफ भी कार्रवाई करने का हम में साहस है.’ उन्होंने इसके साथ ही 14 अगस्त से पूरे राज्य का दौरा करने का भी ऐलान किया है. ताकि पार्टी कैडर को अपने पक्ष में सक्रिय कर सकें. एनडीटीवी से बातचीत में उन्होंने 40 विधायकों के समर्थन का दावा किया और ज़रूरत पड़ने पर और भी विधायक आ जाएंगे.

तो निष्कर्ष में सामने आती तस्वीर कुछ यूं हो सकती है?

1. विलय होने पर...

ईपीएस-ओपीएस गुटों का विलय होते ही चुनाव आयोग उन्हें असल एआईएडीएमके के रूप में मान्यता दे सकता है. लेकिन ऐसे में दिनाकरन के समर्थक पलानिसामी सरकार गिरा सकते हैं और राज्य मध्यावधि चुनाव की तरफ जा सकता है.

2. विलय नहीं हुआ तो...

सरकार बचाने की गरज़ से पलानिसामी दिनाकरन से सुलह भी कर सकते हैं. क्योंकि इस वक़्त चुनाव में जाने के लिए कोई तैयार नहीं है. ऐसे में ओपीएस गुट चूंकि अलग ही रहेगा तो पार्टी की मान्यता ज़ब्त होने का ख़तरा भी बना रहेगा.

3. विलय हो जाए और दिनाकरन पीछे हट जाएं...

राजनीति में कुछ भी संभव है. इसलिए संभावना कम होने पर भी एक स्थिति यह भी हो सकती है कि दिनाकरन फिलहाल पीछे हट जाएं. ओपीएस-ईपीएस गुटों का विलय होने दें. पार्टी को मान्यता मिलने दें. फिर सही मौके पर चोट करें.