दुनिया में कुछ निर्देशक हुए हैं जिन्होंने कभी कोई खराब फिल्म नहीं बनाई. हमारे समय के क्रिस्टोफर नोलन ऐसे ही एक निर्देशक हैं. कई जमाने पहले एक लंबे अरसे तक अनेकों फिल्में बनाने वाले अकीरा कुरोसावा ऐसे दूसरे निर्देशक हुए. स्टेनली क्यूब्रिक की तो ज्यादातर फिल्में मास्टरपीस कहलाती हैं और अगर फिल्मों के दीवानों से पूछो तो मार्टिन स्कॉरसेजी ने भी आज तक कोई खराब फिल्म नहीं बनाई है.

लेकिन हर श्रेष्ठ निर्देशक ऐसा कर नहीं पाता. दुनियाभर के कई दूसरे नाम उठाकर देखिए तो पता चलता है कि कई महान फिल्मकारों ने औसत से लेकर खराब तक के स्तर तक की फिल्में बनाई हैं. फ्रांसिस फोर्ड कोपला ने ‘द गॉडफादर’, ‘द गॉडफादर पार्ट टू’ और ‘अपोकलिप्स नाऊ’ जैसे मास्टरपीस लगातार बनाने के बाद कई औसत फिल्में बनाईं और एक बेहद खराब फिल्म ‘जैक’ भी निर्देशित की. ओलिवर स्टोन ने ‘जेएफके’, ‘नैचुरल बॉर्न किलर्स’ के बाद ‘अलेक्जेंडर’ जैसी हास्यास्पद फिल्म की रचना की और ‘द पियानिस्ट’ जैसी कृति बनाने वाले रोमन पोलैंस्की ने एक जमाने में ‘पाइरेट्स’ जैसी घोर असहनीय फिल्म बनाई.

कहने का मतलब है कि कुछ अपवादों को छोड़कर दुनियाभर के ज्यादातर महान और कामयाब निर्देशकों ने कभी न कभी खराब फिल्म बनाई ही हैं. इसलिए अगर इम्तियाज अली अपने करियर की सातवीं फिल्म अच्छी नहीं बना पाए – जिसपर विस्तार से आप यहां भी पढ़ सकते हैं. तो इसका मतलब यह कतई नहीं है कि उनको और शाहरुख खान को नफरत के सैलाब में डुबो दिया जाए. आलोचना और बद्तमीजी के बीच के फर्क को भुला दिया जाए और दस साल में हमें लगातार छह बढ़िया फिल्में देने वाले एक समझदार और सम्मानित फिल्मकार को पूर्ण रूप से खारिज कर दिया जाने लगे.

जैसे कि वे इम्तियाज अली नहीं, कोई साजिद खान हों.

इम्तियाज के अलावा ‘जब हैरी मेट सेजल’ के नायक शाहरुख खान के प्रति बरती जाने वाली अति की बेरुखी भी जायज नहीं है. फिल्म में उनका काम किसी भी कसौटी पर दर्शनीय उतरता है और अपनी पुरानी लवर बॉय वाली छवि का एक्सटेंशन होने के बावजूद जिस परिपक्वता और सहजता से वे एक प्रौढ़ प्रेमी की भूमिका निभाते हैं, वह काबिले-तारीफ है. उनकी पिछली किसी भी मशहूर फील-गुड फिल्म का लवर औरतबाज नहीं रहा और इस फिल्म में एक वुमनाइजर की भूमिका अदा कर वे अपने फिसलते करियर में एक ऐसा रिस्क लेते हैं जो हमेशा पाक-पवित्र लवर बनने वाले बाकी के दो खान कभी नहीं लेते.

कुछ तो कारण होगा ही कि शाहरुख नाम के रोमांटिक हीरो पर नब्बे के दशक से जान छिड़कने वाले कुछ दीवाने (जो अब जाहिर तौर पर बेहद कम बचे हैं) अगर ‘जब हैरी मेट सेजल’ को सख्त नापसंद कर रहे हैं तो दूसरी तरफ शाहरुख खान उन्हें सालों बाद फिर से सबसे ज्यादा पसंद आ रहे हैं. रोमांस से लदा-फदा उनका राज, कई बरस बाद उनके दिल के करीब पहुंचा है.

वैसे सीमित प्रतिभा के धनी शाहरुख को लेकर वैसे तो कई तरह के क्रिटिसिज्म आज भी जायज हैं. वे और सलमान हमेशा से ऐसे सुपरस्टारों का प्रतिनिधित्व करते आए हैं जो कहानी की जहीनता को ठेंगा दिखाकर सिर्फ अपनी स्टार पावर के दम पर टिकी फिल्में करना चाहते रहे हैं. एक लंबा दौर गवाह रहा है कि इन ‘आलसी’ सुपरस्टारों की वजह से हमारी सबसे बड़ी फिल्में स्तरीय होने के लिए छटपटाती रही हैं और यह बहुत पुरानी बात भी नहीं है. ‘दबंग’ से पहले के सलमान और ‘फैन’ से पहले के शाहरुख ऐसी ही फिल्मों में लिप्त और तृप्त रहा करते थे.

लेकिन 50 नामक अंक के भय ने न सिर्फ सलमान को बदला बल्कि शाहरुख को भी अपना कम्फर्ट जोन छोड़ने के लिए मजबूर किया. शाहरुख ने दूसरी बार (पहली बार ‘स्वदेश’, ‘चक दे इंडिया’ और ‘पहेली’ के वक्त) खुद को इतना बदला है कि न सिर्फ अब वे अलग-अलग मिजाज की ‘कम बड़ी और कम कमर्शियल’ फिल्में बनाने के लिए प्रसिद्ध निर्देशकों के साथ सहर्ष काम कर रहे हैं, बल्कि सबसे बड़ी बात, ‘फैन’ के वक्त से ही मुख्तलिफ किरदारों को ईमानदारी से निभाने की लगातार कोशिशें कर रहे हैं.

पिछले कुछ सालों से जरूरत से ज्यादा हो रही शाहरुख की आलोचना इसीलिए पूरी तरह न्यायसंगत नहीं लगती.

सभी मानेंगे कि गौरव बनकर साल 2016 में आई ‘फैन’ में शाहरुख ने हैरान कर देने वाला काम किया था. वे ‘डर’ व ‘अंजाम’ वाले एंटी-हीरो को एक अनदेखी ऊंचाई पर ले गए थे और अगर लचर पटकथा और मनीष शर्मा के दिग्भ्रमित निर्देशन ने फिल्म की कमर नहीं तोड़ी होती तो आज वह फिल्म शाहरुख की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में से एक कहलाती. उसी साल आई औसत से थोड़ी ही बेहतर ‘डियर जिंदगी’ में अपने सुप्रसिद्ध चार्म को शाहरुख ने संयमित अभिनय से साधा था और किसी गिमिक्री से दूर रहकर सहजता ओढ़कर एक और बढ़िया परफार्मेंस दी थी.

2017 के शुरुआत में वे उन गैंगस्टर और थ्रिलर जॉनर की तरफ एक बार फिर चल दिए थे, जिनकी फिल्में उन्हें निजी तौर पर बेहद पसंद हैं. इस बार भी उनके अभिनय में खोट नहीं था और ‘रईस’ की नाकामयाबी की वजह केवल राहुल ढोलकिया का खराब निर्देशन और कच्ची पटकथा थी. ‘जब हैरी मेट सेजल’ को भी अगर आप गिन लें तो केवल दो सालों में शाहरुख ने चार अलग-अलग मिजाज और कैरेक्टर आर्क वाली भूमिकाएं निभाई हैं और सभी न सिर्फ उम्दा तरीके से, बल्कि परिपक्वता से निभाई हैं. अपनी आने वाली आनंद एल राय की फिल्म में वे बौना तक बन रहे हैं और वैसे तो हमेशा से सारी दुनिया को शाहरुख से यह शिकायत रहा करती है कि वे नए प्रयोग नहीं करते, लेकिन अब जब वे आखिरकार ऐसा कर रहे हैं तो उन्हें कड़वाहट में डूबे आलोचनाओं के तीर मारना क्या गलत नहीं है?

निम्नस्तरीय पटकथाओं और कम सयाने निर्देशन के लिए क्या कोई अभिनेता पूरी तरह जिम्मेदार हो सकता है?

मुख्तलिफ समझ वाले नए निर्देशकों के साथ पिछले कुछ सालों से शाहरुख का लगातार काम करना इस बात की भी तस्दीक है कि वे अब अपने लिए अगला आदित्य चोपड़ा ढूंढ़ रहे हैं. कोई ऐसा यंग निर्देशक जो उन्हें वैसे ही पुन: स्थापित कर सके जैसे एक जमाने में ‘डीडीएलजे’ बनाकर आदित्य चोपड़ा ने किया था, और बॉक्स-ऑफिस सफलता के साथ-साथ उन्हें गुणवत्ता वाली फिल्में देकर उचित सम्मान भी दिला सके. जैसा कबीर खान ने सलमान के करियर के लिए किया है और कुछ हद तक राजकुमार हिरानी ने आमिर खान के लिए. शाहरुख भी अपने लिए ऐसे ही सिपहसालार की तलाश में हैं और हो सकता है कि ऐसे निर्देशक उन्हें जल्द मिलें भी, जो उनके करियर की दिशा और दशा दोनों बदल दें. क्योंकि भले ही लग कितना भी रहा हो, सच्चाई यही है कि इस समय शाहरुख खान की केवल फिल्में चूक रही हैं, वे नहीं.

पूरी तरह तो कतई नहीं.