उत्तर प्रदेश की सियासत में कार भी सियासत और झगड़े का हथियार बन गई है. कार ने उत्तर प्रदेश में इस बार ऐसा काम किया है जिसकी चर्चा योगी आदित्यनाथ, अखिलेश यादव, मायावती से लेकर मुलायम सिंह यादव तक मिलने-जुलने वालों से कर रहे हैं. कार भी एक नहीं दो हैं, मर्सिडीज़ कंपनी की हैं और इनकी कीमत करीब डेढ़ करोड़ से ज्यादा है.

सुनी-सुनाई है कि योगी आदित्यनाथ जब मुख्यमंत्री बने तब उन्हें अधिकारियों ने बताया कि अखिलेश यादव ने चुनाव से ठीक पहले दो महंगी कारें खरीदी थीं. मुख्यमंत्री होने के नाते एक कार का इस्तेमाल वे खुद करते थे और दूसरी उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री के नाम पर अपने पिता मुलायम सिंह को दे दी थी. महंगी सरकारी कारें तो आज़म खान और शिवपाल सिंह यादव के पास भी थीं. लेकिन कुर्सी जाने के बाद इन लोगों ने उन्हें सरकार को वापस कर दिया. लेकिन मर्सिडीज़ कारें अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव के यहां से वापस नहीं आईं.

योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनते ही अफसरों के सामने सवाल था कि सीएम साहब किस गाड़ी से सफर करेंगे. कुछ अफसरों ने उन्हें सलाह दी कि यादव परिवार से मर्सिडीज़ कारें वापस ले लेनी चाहिए. योगी आदित्यनाथ के एक करीबी बताते हैं कि पहले इस बात पर मुख्यमंत्री चौंक गए फिर उन्होंने ऐसा करने से इंकार कर दिया. कहा जाता है कि उस वक्त योगी एक संन्यासी मुख्यमंत्री के तौर पर ही दिखना चाहते थे. वे नहीं चाहते थे कि सीएम बनते ही वे अखिलेश की तरह मर्सिडीज़ से लखनऊ की सड़कों पर घूमने लगे.

सुनी-सुनाई ही है कि इसके बाद नये मुख्यमंत्री को दूसरी सलाह ये मिली कि अखिलेश और मुलायम से दोनों कारें वापस लेकर राज्य में आने वाले विशेष मेहमानों की आवाजाही के लिए इस्तेमाल की जाएं. लेकिन सरकार बनते ही आदित्यनाथ किसी विवाद में नहीं फंसना चाहते थे इसलिए उन्होंने इस बात को टाल दिया. लेकिन दो महंगी कारें अखिलेश ने खरीदीं और अपने परिवार को दे दीं यह बात बतानी भी जरूरी थी. धीरे-धीरे अखिलेश यादव और परिवार का यह ‘कारनामा’ दिल्ली और लखनऊ के पत्रकारों को बताया गया.

इसकी खबर अखिलेश और मुलायम तक भी पहुंच गई, माहौल बनने लगा और देखते-देखते सरकार के सौ दिन भी पूरे हो गए. इसके बाद एक दिन आहिस्ता से अखिलेश के पास सरकारी आदेश आ गया. उनके पास जितनी महंगी सरकारी गाड़ियां थी सब वापस ले ली गईं. मुलायम सिंह यादव के पास भी मर्सिडीज़ के अलावा दो और महंगी सरकारी गाड़ियां थीं. योगी सरकार ने ये तीनों गाड़ियां भी सरकारी कब्जे में कर लीं.

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई. सियासी खेल में एक और ट्विस्ट आया. पूर्व मुख्यमंत्री होने के नाते मायावती के पास भी सरकारी गाड़ी थी. उनसे भी उनकी गाड़ी तो वापस ली गई लेकिन उसके एवज में अखिलेश यादव के यहां से आई महंगी कार उन्हें दे दी गई.

अब तक जिस लक्जरी कार पर अखिलेश चढ़ते थे, उस पर अब मायावती चलेंगी और मायावती के पास से आई पुराने अंबेस्डर कार पर अखिलेश चलेंगे. इस बात से अखिलेश यादव दुखी हैं. वे पत्रकारों और मित्रों को अपनी दुखभरी दास्तान सुना रहे हैं. वे सवाल उठा रहे हैं कि जब एक मर्सिडीज कार पूर्व मुख्यमंत्री को देनी ही थी तो उनसे लेकर मायावती को क्यों दी गई! और उसके बदले उन्हें तीन लाख किलोमीटर चली हुई खटारा अंबेस्डर कार क्यों दी गई.

पूछने पर सरकारी अधिकारी इस बारे में राजनाथ सिंह और कल्याण सिंह का उदाहरण देते हैं. जब ये दोनों पूर्व मुख्यमंत्री हुए तो इन्हें भी अंबेस्डर कार ही दी गई थी. लेकिन मायावती के पास लक्जरी कार क्यों पहुंची? इसका जवाब अधिकारियों के पास भी नहीं है. वे सिर्फ इतना कहते हैं कि मायावती के पास भी अंबेस्डर ही जानी थी, लेकिन ऊपर से आदेश आया कि एक लक्जरी कार ‘बहनजी’ को दे दी जाए.

ऐसा क्यों हुआ इसका कुछ अंदाजा अखिलेश यादव से ही मिल जाता है. सुनी-सुनाई है कि अखिलेश और मायावती के बीच गठबंधन के पूरे आसार बन चुके थे. अब भी इस बात की उम्मीद टूटी नहीं है. लेकिन गठबंधन के बनने से पहले ही उसे खत्म करने की कोशिशें शुरू हो चुकी हैं. जानने वाले मानते हैं कि कार का इस्तेमाल अखिलेश और मायावती को साथ आने से रोकने के लिए किया गया है. इसीलिए भाजपा मायावती की कुछ बातें मानने से झिझक नहीं रही है.