अरविंद जी, आप कहते हैं कि नीति आयोग का उपाध्यक्ष बनना आपके लिएड्रीम जॉबजैसा था, फिर आपने इस पद से इस्तीफा क्यों दे दिया?

यह ड्रीम जॉब तो है, पर यह मुझे बुढ़ापे में बेरोजगार होने से तो नहीं बचा सकता न, अब्ब्ब...मेरा मतलब कि इस ड्रीम जॉब के चक्कर में मुझे कोलंबिया यूनिवर्सिटी की नौकरी छोड़नी पड़ेगी और फिर ढाई साल बाद मैं न घर का रहूंगा, न घाट का. भारत में कहा जाता है न कि नकल के लिए भी अकल चाहिए, वैसे ही लालच भी अकल से करने पर ही फायदा देता है. अक्सर ज्यादा लालच पूरा कारोबार चौपट करा देता है, ठीक वैसे ही जैसे लालू जी का हो गया है!

आप बेरोजगारी के बजाय अल्परोजगार (सीमित समय के लिए मिला रोजगार) को सबसे बड़ी आर्थिक चुनौती क्यों कहते हैं?

देखिए, बेरोजगारों को तो फिर भी कुछ सरकारें ‘बेरोजगारी भत्ता’ दे देती हैं, लेकिन अल्परोजगार वाले न इधर के हैं, न उधर के! वैसे बुजुर्ग बेरोजगारी भी एक बड़ी समस्या है, लेकिन इस पर भारत में बात ही शुरू नहीं हुई क्योंकि अभी तो युवाओं को ही काम नहीं मिल पा रहा तो फिर बुजुर्गों को कौन पूछेगा. बुजुर्ग बेरोजगारी को आप मेरे ही उदाहरण से समझ सकती हैं. इतने सालों बाद पहली बार भारत में मुझे अपनी योग्यता के मुताबिक काम मिला, लेकिन वह भी सिर्फ पांच साल के लिए. यह अल्परोजगार नहीं तो और क्या है. आखिर पांच साल बाद भी तो मैं और मेरी बीवी खाना खाएंगे, घर के खर्च होंगे ही...तब मेरा क्या होगा?

आपसे पहले रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन भी अपना कार्यकाल बढ़वाने के बजाय वापस यूनिवर्सिटी में पढ़ाने के लिए जा चुके हैं. आखिर आप लोगों अकादमिक क्षेत्र इतना लुभाता क्यों है?

देखिए, सबके मजे के अपने-अपने क्राइटेरिया होते हैं... इस देश में बहुत सारे लोगों को तो दूसरों को टोपी पहनाने में ही मजा आता है. मैंने और रघुराम ने अपने देश में टोपी पहनने के मजे ले लिए, अब्ब्ब...मेरा मतलब यहां काम करके खुशी ले ली. यहां सालों तक टोपी पहनने और पहनाते रहने से ज्यादा अच्छा है कि वापस मास्टरी... मेरा मतलब कि पढ़ा ही लें.

अच्छा यह बताइए कि योजना आयोग और नीति आयोग में आप क्या बुनियादी फर्क मानते हैं?

वही जो नरेगा और मनरेगा में है! अब्ब्ब...मेरा मतलब दोनों में बहुत फर्क है, योजना आयोग को उस पार्टी की सरकार ने बनाया था, जिसने न खुद कुछ किया और न उसके योजना आयोग ने. नीति आयोग की तो सबसे बड़ी सफलता ही यह है कि मेरे जैसा इंटरनेशनल इकॉनॉमिस्ट इसका पहला उपाध्यक्ष था और इसके चलते पहले दिन से ही यह अंतरराष्ट्रीय संस्थान बन गया.

लेकिन राष्ट्रीय स्यवंसेवक संघ से जुड़े स्वदेशी जागरण मंच का कहना है कि नीति आयोग पुरानी नीतियों को ही आगे बढ़ा रहा है. इस पर क्या कहेंगे?

जब स्वदेशी का नारा लगाने वाली मोदी सरकार तक यूपीए की नीतियों को ही नाम बदलकर आगे बढ़ा रही है, तो भला हमारी क्या बिसात कि हम कुछ अलग काम करें, अब्ब्ब...मेरा मतलब कि यह आरोप पूरी तरह बेबुनियाद है. योजना आयोग के प्रमुख राष्ट्रीय स्तर के थे, मैं तो अंतरराष्ट्रीय स्तर का हूं. आखिर दो अलग स्तरों के लोग एक ही जैसा काम कैसे कर सकते हैं!

इस संगठन का तो यह भी कहना है कि नीति आयोग अपनी सीमा से बाहर जाकर काम कर रहा था. इस आरोप में कितनी सच्चाई है?

जब हमने सीमा में रहकर ही कोई नया काम नहीं किया, तो भला सीमा से बाहर जाने की क्या जरूरत! अब्ब्ब...मेरा मतलब ये सब मनगढंत बातें हैं, हमें अपनी सीमाओं का बहुत अच्छे से पता है और हमने उनमें रहकर ही बहुत अच्छा काम किया है.

अपने कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या मानते हैं?

इतने साल अमेरिका जैसे देश में रहने और काम करने के बाद, ढाई सालों तक लगातार भारत में रहने और काम करने को! अब्ब्ब...मेरा मतलब कि यह लिस्ट बहुत लंबी है, इसके लिए आप फिर कभी आइएगा.

सुनने में आया था कि आपने जीन संवर्धित (जीएम) फसलों को पूरे देश में उगाने की सिफारिश की थी. किसान इनका भारी विरोध कर रहे हैं फिर आप क्यों इनके समर्थन में हैं?

मैंने सोचा कि इस देश के इंसानों की नस्ल में तो जींस सुधार नामुमकिन है, कम से कम फसलों का ही जीन संवर्धित कर दिया जाए!...पर इस देश का कुछ नहीं हो सकता, अब्ब्ब...मेरा मतलब जीएम फसलों से देश की उत्पादन क्षमता बढ़ेगी इसलिए मैंने इनकी सिफारिश की थी.

आपको प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केगुजरात विकास मॉडलका भी समर्थक माना जाता है. उसमें आपको सबसे खास क्या लगा?

मिस्टर मोदी का डेवलपमेंट स्लोगन ‘सबका साथ, कुछ का विकास’...ओह, मेरा मतलब ‘सबका विकास’ ही अपने आप में सबसे खास है...और वे इस स्लोगन का इतनी बार प्रयोग करते हैं कि विकास हो या न हो, उसका फील जरूर आने लगता है.

नीति आयोग के नए उपाध्यक्ष डॉ राजीव कुमार से आपकी क्या अपेक्षाएं हैं?

सबसे पहली तो यही कि वे अपना कार्यकाल बिना किसी विघ्न के पूरा कर सकें और मेरी तरह किसी बहाने से उन्हें समय से पहले ही यह पद न छोड़ना पड़े, अब्ब्ब...मेरा मतलब कि मैं उन्हें शुभकामनाएं देता हूं कि वे उन सभी योजनाओं को पूरा कर सकें, जिन्हें मैं अधूरा छोड़ कर जा रहा हूं.

राजीव कुमार का कहना है कि जल्दी ही नीति-निर्धारण विदेशी प्रभाव से मुक्त हो जाएगा. इस बारे में आपका क्या सोचना है?

देखिये, यह सब कहने की बातें हैं...जब तक नीतियां मोदी जी की देख-रेख में बनेंगी, तब तक वे विदेशी प्रभाव से मुक्त हो ही नहीं सकतीं.

पर आप ऐसा क्यों कह रहे हैं, मोदी जी तो खुद हर चीज में स्वेदशी पर जोर देते रहते हैं.

मेरा मनना तो यह है कि मोदी जी के कार्यकाल में बनने वाली ज्यादातर नीतियों पर सबसे ज्यादा विदेशी सभ्यता, संस्कृति और यहां तक कि विदेशी जलवायु का भी असर देखने को मिलेगा. ऐसा इसलिए, क्योंकि वे खुद ही स्वदेश में कम और विदेशों में ज्यादा रहते हैं! आप मोदी जी के ‘स्वच्छता अभियान’ से मेरी बात समझ सकती हैं. सफाई को लेकर आज मोदी जी का जो पैशन है, वह विदेशों में घूम-घूमकर और वहां की स्वच्छता की चकाचौंध से ही तो पैदा हुआ है.

अच्छा यह बताइये कि आपके और मोदी सरकार के बीच मतभेद को लेकर कितनी सच्चाई है?

जितनी नीति आयोग के योजना आयोग से अलग होने में!

अरविंद जी, आपके हिसाब से विकास के मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सबसे ज्यादा किस क्षेत्र में सजग है?

मोदी जी, जिस राज्य में, जैसे मौका मिले, वहां भाजपा की सरकार बनवाने में सबसे ज्यादा सजग हैं! अब्ब्ब...मेरा मतलब कि उनकी नजर बहुत संतुलित है, वे हर दिशा में काफी अच्छा काम कर रहे हैं.