निर्देशक : श्री नारायण सिंह

लेखक : सिद्धार्थ सिंह, गरिमा वहल

कलाकार : अक्षय कुमार, भूमि पेडनेकर, सुधीर पांडेय, दिव्येंदु शर्मा, अनुपम खेर, सना खान

रेटिंग : 2/ 5

इस फिल्म का प्रिमाइस जबरदस्त है. घर में पाखाना न होने की वजह से घर छोड़कर चली जाने वाली पत्नी और समाज की कुरीतियों के बीच फंसे होने के बावजूद उसे वापस लाने के लिए हरसंभव प्रयास करने वाले पति की कथा आखिर कौन नहीं देखना चाहेगा! कमर्शियल सिनेमा ऐसी देसी कथाओं के प्रति कम ही मेहरबान होता है और ऊपर से जब टाइटल दिलचस्प हो तो ऐसी फिल्म से एक मनोरंजक सोशल-ड्रामा होने की उम्मीद करना गैरवाजिब नहीं होता.

‘टॉयलेट - एक प्रेम कथा’ पहले तो अपने कच्चे निर्देशन और सुस्तम-सुस्त पटकथा की वजह से दुख देती है और बाद में विशुद्ध प्रोपेगेंडा फिल्मों की तरह खुलकर स्वच्छ भारत अभियान के लिए सरकार की जय-जयकार करने लगती है. मनोरंजन की तलाश में थियेटर पहुंचे दर्शकों को जनहित में सूचित भी नहीं किया जाता कि तकरीबन पौने तीन घंटे की यह फिल्म असल में दुनिया का सबसे लंबा सरकारी विज्ञापन है. ऐसा उबाऊ विज्ञापन जिसे समझदार लोगों ने नहीं बनाया है.

क्योंकि सामाजिक मुद्दों पर कायदे की मनोरंजक और सटल फिल्म अगर आप बना लें, तो फिर चीख-चीखकर जयकारा लगाने की जरूरत नहीं पड़ती. बिना कहे भी बहुत कुछ कह जाने के लिए ही सिनेमा बना है, और अगर सरकारी प्रेम से ओत-प्रोत निर्देशक/निर्माता/एक्टर इसी एक शाश्वत नियम को समझ लें तो वे धड़ल्ले से बन रहीं ऐसी फिल्मों को कम से कम दर्शनीय तो बना ही पाएंगे.

‘टॉयलेट - एक प्रेम कथा’ की शुरुआत बेहद निराशाजनक अंदाज में होती है. जब अक्षय और भूमि के किरदारों की शादी हो जाती है उसके बाद जरूर दोनों साथ-साथ अच्छे लगते हैं और कुछ दृश्यों में फबते हैं. लेकिन इससे पहले यह स्थापित करने के लिए कि हीरो और हीरोइन छोटे गांवों से हैं, अधेड़ नायक तब तक नायिका का पीछा करता है जब तक दबंग हीरोइन उसे कन्फ्रंट नहीं करती और जमकर खरी खोटी नहीं सुनाती. अब आपको लग रहा होगा कि चूंकि नायक असल जीवन में लड़कियों द्वारा आत्मरक्षा की ट्रेनिंग लेने का पक्षधर है इसलिए वो स्टॉकिंग के खिलाफ भी ऐसा कोई सीक्वेंस फिल्म में रखेगा, ताकि खुले में शौच के अलावा इस कृत्य पर भी कोई सबक दिया जा सके.

ऐसा नहीं होता. नायिका द्वारा खरी खोटी सुनाने के बाद हीरो अपना पूरा हीरोइज्म संवादों के माध्यम से भूमि के मुंह पर दे मारता है और नाराज होकर चला जाता है. भूमि मजनूं के इस टशन पर फिदा हो जाती है और नब्बे के दशक की फिल्मों की तरह तुरंत उसके प्यार में पड़ जाती है. फिल्म पहली बार फट से यहीं फिसलती है और दोनों जिस तरह प्यार में पड़ते हैं, वो हिस्सा रिग्रेसिव होने के साथ-साथ आने वाली कहानी के ट्रीटमेंट का स्तर भी बता देता है.

अक्षय कुमार अभी तक फिल्म में बिलकुल नहीं जंचते लेकिन अपनी शादी की बारात में पीला कोट और नोटों की माला लटकाए ऐसा जबर नाचते हैं कि दिल खुश कर देते हैं. पति बनते ही उनके अभिनय में निखार आता है और अंत तक वे अभिनय ईमानदार करते हैं. ‘एयरलिफ्ट’ के स्तर का तो नहीं, न ही कुछ अनूठा और उनके कंफर्ट जोन के बाहर का, पर इतना कि आपको उनसे कोई खास शिकायत नहीं होती. भूमि पेडनेकर भी अक्षय का अनुसरण कर कुछ अलहदा या भौचक्क कर देने वाला काम नहीं करतीं, मगर अपने किरदार में जंचती हैं और करियर की दूसरी फिल्म के हिसाब से यह बहुत होता है.

शादी के बाद भूमि के किरदार को पता चलता है कि ससुराल में शौचालय नहीं है और उसे हर रोज मुंह अंधेरे ‘लोटा पार्टी’ का हिस्सा बनकर खेतों में शौच करने जाना होगा. पिताजी (सुधीर पांडेय, एक बार फिर काम अच्छा करते हुए) घर में शौचालय बनवाने के घोर विरोधी होते हैं और इसलिए यहीं से कहानी थोड़ी रफ्तार पकड़ती है. इंटरवल से पहले वाले हिस्से में जो थोड़ा-बहुत मनोरंजन मिलता है वो नायक-नायिका द्वारा जुगाड़ से शौच करने की जगहें तलाशने की वजह से मिलता है. लेकिन फिल्म न अपने ह्यूमर को लेकर कंसिस्टेंट रहती है और न ही नैरेटिव फ्लो को साधे रहती है. लगता है जैसे जल्दबाजी में – क्यूंकि सुपरस्टार की डेट्स सीमित मिली हैं – निर्देशक बस पटकथा अनुसार सीन दर सीन स्क्रीन पर चस्पा करता जा रहा है - एकदम सपाट तरीके से.

अपने दूसरे हिस्से में – जब नायक नित नए तरीके अपनाकर शौचालय की व्यवस्था करने की कोशिशें करता है ताकि पत्नी घर वापस आ जाए – फिल्म एकदम घोंघा रफ्तार पकड़ लेती है. कभी न खत्म होने वाला ऐसा सोशल ड्रामा बन जाती है जिसमें न नयापन होता है, न हास्य (जो कि दिव्येंदु की टेक लेकर गाहे-बगाहे पैदा होता है) और न ही कोई दिलचस्प ड्रामा. नायक के यह समझ जाने के बावजूद कि ये शौच का नहीं सोच का मामला है, फिल्म में रोचकता का अभाव ऐसा रहता है जैसे प्यासे के लिए पानी. ‘गोरी तू लट्ठमार’ गीत में शानदार तरीके से फिल्माई गई लट्ठमार होली और अक्षय कुमार का एक सधा हुआ मोनोलॉग भी इस बेहद लंबे हिस्से में पसरी नीरसता को खत्म नहीं कर पाता और क्लाइमेक्स तो इतना हास्यास्पद रचा जाता है कि आपकी रुलाई भी फूट सकती है.

ऊपर से इसी हिस्से में फिल्म बेशर्मी से बताती है कि वो एक सरकारी विज्ञापन है. हर घर में शौचालय नहीं बन पाने का ठीकरा पिछली सरकार पर फोड़ती है और भले ही सरकारी महकमों में कईयों को भष्टाचार में लिप्त दिखाती है, लेकिन मथुरा आधारित अपनी कहानी में उत्तर प्रदेश के सीएम को संकटमोचक की तरह दर्शाती है! जब मीडिया पूछती है कि क्या सरकार इस बात की दोषी नहीं है कि आज भी लोग सड़क पर शौच करने को मजबूर हैं, तो अक्षय कुमार स्वयं उपस्थित होकर सरकारी प्रवक्ता की तरह कहते हैं, ‘आप लोगों का तो काम ही है कि हर बिल सरकार पे फाड़ दो.’

सटल तरीके से कहने की जगह फिल्म इसी तरह कई बार स्वच्छता अभियान का जयकारा लगाती है, और एक जगह अति इतनी भी होती है कि अक्षय कुमार ज्ञान देते हुए कहते हैं कि शौचालय बनाना हम सभी की जिम्मेदारी है, और इसके लिए हमें सरकार से पैसा नहीं लेना चाहिए!

जाहिर तौर पर यह सुपरस्टार उन बेहद गरीब गांववालों से अनभिज्ञ हैं जिनके पास शौचालय बनवाने के लिए 10-12 हजार बराबर बड़ी रकम नहीं होती. लेकिन फिर भी सरकारी महकमों के लोग इन्हें लगातार परेशान करते हैं, ताकि सरकारी आदेश की तामील जल्द से जल्द हो सके और स्वच्छ भारत नामक छवि पर कोई टाट का पैबंद न नजर आ पाए.

जैसे कि इस फिल्म में कई सारे नजर आते हैं.