नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेसवे से सटे इलाके में जब जेपी समूह ने रिहायशी परियोजनाओं पर काम शुरू किया तो बड़ी संख्या में लोगों ने यहां अपने लिए फ्लैट बुक कराएं. 2010-11 में इन्हें उस वक्त की सबसे भरोसेमंद परियोजना माना जा रहा था. इस वजह से नोएडा एक्सटेंशन आदि की परियोजनाओं के मुकाबले जेपी की परियोजनाओं की कीमतें अधिक थीं. लेकिन उस वक्त विश्वस्त मानी जा रही इन परियोजनाओं में अपनी गाढ़ी कमाई लगाने वालों को न तो वक्त पर उनका घर मिला और न ही हाल-फिलहाल इसकी कोई उम्मीद ही दिख रही है.

बीते गुरुवार को राष्ट्रीय कंपनी विधि ट्राइब्यूनल ने जेपी इन्फ्राटेक पर नए इन्सॉल्वेंसी और बैंकरप्ट्सी कानून के तहत कार्रवाई करने का आदेश जारी किया है. यह कानून किसी कंपनी के दिवालिया होने और उसके बाद की प्रक्रिया से संबंधित है. कानून में अंग्रेजी के जो दो शब्द हैं, तकनीकी तौर पर उनके मतलब अलग-अलग हैं लेकिन हिंदी में दोनों के लिए दिवालिया शब्द ही चल रहा है. बैंकरप्ट्सी का तात्पर्य यह है कि किसी व्यक्ति या कंपनी के बारे में कोई प्राधिकरण यह घोषित कर दे कि वह अपनी देनदारियां चुकाने में सक्षम नहीं है. इनसॉल्वेंसी का मतलब यह है कि कोई कंपनी या व्यक्ति अपनी देनदारियां चुकाने में सक्षम नहीं हो. दोनों शब्दों के अर्थ में तकनीकी तौर पर अंतर है. इसे इस तरह से समझें कि बैंकरप्ट्सी, इन्सॉल्वेंसी के बाद का चरण है. जेपी इन्फ्राटेक अभी पहले चरण में है.

यहीं उस नए कानून की भूमिका आ जाती है जिसे हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार ने पारित किया है. नए कानून के तहत अपनी देनदारियां चुकाने में खुद को सक्षम नहीं पा रहा व्यक्ति या कंपनी इन्सॉल्वेंसी के लिए आवेदन कर सकते हैं. ट्राइब्यूनल आवेदन की जांच के बाद इस बारे में निर्णय लेती है.

एनसीएलटी ने जांच के बाद जेपी इन्फ्रा को इन्सॉल्वेंट माना. अब इसके बाद एक व्यक्ति को कंपनी का मुख्य कार्याधिकारी नियुक्त करने का प्रावधान है. कानून में इसे इन्सॉल्वेंसी प्रोफेशनल कहा गया है. एक तरह से इसी व्यक्ति के हाथ में अब कंपनी की पूरी कमान आ गई और कंपनी का पुराना बोर्ड निलंबित हो गया. जेपी के मामले में केपीएमजी कंपनी के अनुज जैन को यह जिम्मेदारी दी गई है.

अब उनका काम है कि वह कंपनी के खातों की जांच करें. साथ ही जिनका भी कंपनी पर बकाया हो, उनसे बात करें. साथ ही जिन लोगों ने जेपी इन्फ्रा में फ्लैट खरीदे हैं, उनका पक्ष सुनें. कुल मिलाकर उन्हें कंपनी की कुल देनदारियों का सही अंदाज लगाना होगा और कंपनी को बचाने के लिए सबके साथ बैठकर प्रयास करने होंगे.

कानून में इस बात के हरसंभव प्रयास किए जाने का प्रावधान है कि कंपनी फिर से चलने लगे और जिनकी भी देनदारियां हैं, उन्हें नुकसान नहीं उठाना पड़े. यह प्रक्रिया छह महीने के अंदर पूरी करनी होगी. अगर जरूरत पड़ी तो तीन महीने का समय विस्तार देने का भी प्रावधान है.

इसका मतलब यह हुआ कि इन्सॉल्वेंसी प्रक्रिया में जाने से यह पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता है कि फ्लैट खरीदने वालों का अब सारी उम्मीदें छोड़ देनी चाहिए. संभव है कि कंपनी की कुछ दूसरी संपत्तियों को बेचकर परियोजनाओं को पूरा करवाया जाए. या बैंक जेपी को और कर्ज देने या पिछले कर्ज के लिए कुछ और मोहलत देने के लिए तैयार हो जाएं. लेकिन ये सिर्फ संभावनाएं है. इस प्रक्रिया में पक्के तौर पर क्या होगा, यह कहा नहीं जा सकता.

अगर अनुज जैन को अपनी पूरी ताकत लगाने के बाद भी यह लगता है कि कंपनी को फिर से नहीं चलाया जा सकता तब कंपनी दिवालिया यानी बैंकरप्ट घोषित की जाएगी. इसके बाद उसकी संपत्तियों को बेचा जाएगा. उससे जो पैसा आएगा, उसके बारे में कानूनी प्रावधान यह है कि पहले बैंकों के कर्ज चुकाए जाएंगे और कर्मचारियों की तनख्वाह आदि दी जाएगी. इसके बाद अगर पैसे बचे तो फिर ग्राहकों और ठेकेदारों को उनके पैसे मिलेंगे. और इसमें भी जिन लोगों ने रीसेल पर और बैंकों से कर्ज लेकर घर खरीदे थे उनका काफी नुकसान हो सकता है.

कुल मिलाकर देखें तो जेपी इन्फ्राटेक को कर्ज देने वाले बैंकों के मुकाबले इस परियोजना में अपनी गाढ़ी कमाई लगाने वालों के लिए कहीं अधिक जोखिम की स्थिति है. वे ग्राहक अब अवाक हैं जो ये सोचते थे कि जेपी नहीं तो कोई और सही, जल्दी नहीं तो देर से ही सही पर उन्हें अपना घर मिलेगा. उन्हें नहीं पता था कि एक नया कानून आएगा और कल तक उनके लग रहे घर पर उनका ही दावा सबसे कमजोर हो जाएगा.