ज़्यादा नहीं 10 साल पुरानी ही बात है. मार्च 2007 की नौ तारीख़ को तत्कालीन सैन्य शासक परवेज़ मुशर्रफ ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश इफ्तिख़ार मोहम्मद चौधरी को निलंबित कर दिया था क्योंकि उन्होंने मुशर्रफ के आदेश के बावज़ूद इस्तीफा देने से मना कर दिया था. पाकिस्तान के 60 साल के इतिहास में पहली बार सुप्रीम कोर्ट के किसी जज़ को सरकार ने निलंबित किया था.
उसके बाद जो हुआ वह भी शायद पहली मर्तबा ही था. चौधरी के निलंबन और सैन्य तानाशाह के ख़िलाफ देश की जनता सड़कों पर आ गई. जस्टिस चौधरी ने मौके को ताड़ते हुए चार मई को सड़क के रास्ते इस्लामाद से लाहौर जाने का मंसूबा बांधा. चार घंटे का रास्ता, 250 किलोमीटर की दूरी, लेकिन चौधरी के लिए जनसैलाब ऐसा उमड़ा कि उन्हें लाहौर पहुंचने में 24 घंटे लग गए. दिनों-दिन उनका समर्थन और सरकार के ख़िलाफ गुस्सा बढ़ता देख मुशर्रफ ने मज़बूरन 20 जुलाई 2007 को इफ्तिख़ार को बहाल कर दिया.
यह 10 साल पहले का वाकया पाकिस्तान में इन दिनों फिर दोहराया जा रहा है. लेकिन उलटबांसी के साथ. मतलब 2007 में तो सरकार के ख़िलाफ ‘अदालत’ (जस्टिस चौधरी, उनके समर्थक जज, वकील आदि) सड़कों पर थी. लेकिन बीते चार दिन से अदालत के ख़िलाफ ‘सरकार’ (पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ और उनके समर्थक) सड़क पर है. विदेश में काला धन जमा करने के आरोपों के चलते पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने शरीफ को प्रधानमंत्री की कुर्सी से हटाया है. इस फैसले के ख़िलाफ जनता को लामबंद करते हुए अब शरीफ सड़क के रास्ते इस्लामाबाद से लाहौर जा रहे हैं. जियो न्यूज़ के मुताबिक शनिवार को चौथे दिन उनका कारवां दोपहर को गुजरांवाला से लाहौर के लिए रवाना हुआ है.
शरीफ रास्ते-रास्ते रैलियां करते जा रहे हैं और क़रीब-क़रीब हर रैली में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल उठा रहे हैं. दलील दे रहे हैं कि उन्हें ‘अयोग्य ठहराने का फैसला पूर्व नियोजित था.’ फिर सीधे जनता से सवाल पूछते हैं, ‘क्या आपको अदालत का यह फैसला मंज़ूर है?’ और सामने हज़ारों की तादाद में मौज़ूद जनता के बीच से उठे हाथों के साथ, ‘नहीं, नहीं’ का शोर सुनाई देने लगता है. यह तीसरे दिन गुजरांवाला से कुछ पहले गुजरात में हुई नवाज़ की सभा का दृश्य है.
इसी तरह रैली के दूसरे दिन यानी गुरुवार की शाम उन्होंने झेलम में भी बड़ी जनसभा की थी. इसमें उन्हाेंने कहा, ‘मैं सत्ता का भूखा नहीं हूं. मैं तो सिर्फ पाकिस्तान में उसकी बेहतरी के लिए बदलाव की चाहत रखता हूं.’ फिर सीधे शीर्ष अदालत के ख़िलाफ मोर्चा खोलते हुए उन्होंने कहा, ‘लोकतांत्रिक रूप से चुने गए प्रधानमंत्री को पांच सम्मानित जजों ने चंद मिनट में ही क़लम के एक झटके से हटा दिया. जबकि यहां किसी ने (ख़ुद को मिलाकर अपने परिवार की तरफ इशारा) कुछ ग़लत नहीं किया था. कोई भ्रष्टाचार नहीं हुआ था. मैं पूछता हूं कि क्या इसी तरह कभी अदालत ने संविधान की धज्जियां उड़ाने वाले किसी तानाशाह (देश में नवंबर 2007 में आपातकाल लगाने वाले मुशर्रफ) को सज़ा दी है?’
नवाज शरीफ फिर जनता को यह याद दिलाना भी नहीं भूले कि लोकतांत्रिक रूप से चुने गए प्रधानमंत्रियों को पाकिस्तान में किस तरह की मुश्किलें हो रही हैं. उनका कहना था, ‘पाकिस्तान में अब तक जितने भी प्रधानमंत्री हुए हैं उन सबका कार्यकाल औसतन डेढ़ साल का ही रहा है. जबकि तानाशाहों ने मुल्क पर 10-10 साल राज़ किया है. मैं जानना चाहता हूं कि देश में प्रधानमंत्री को कार्यकाल पूरा करने की इजाज़त क्यों नहीं दी जा सकती.’ और अंत में यह भी कि ‘मैं अब अपनी अपील आपकी (जनता की) अदालत में लेकर आया हूं. फैसला अब आपके हाथ में है.’
नवाज़ ने यह रैली बुधवार को इस्लामाबाद से शुरू की थी और ख़बरों के मुताबिक वे शनिवार रात तक लाहौर पहुंचने वाले हैं. लेकिन इस तमाम कोशिश के बलबूते वे प्रधानमंत्री की कुर्सी तक फिर पहुंच पाएंगे या नहीं यह तो आने वाला वक़्त ही बता पाएगा.
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