खष्टी मर्तोलिया शिक्षिका हैं और बागेश्वर (उत्तराखंड) में रहती हैं.


सभी का बचपन खुशियों का खजाना होता है. यहां बहुत सारी खट्टी-मीठी यादें होती हैं जो ताउम्र गुदगुदाने वाली फुहारें छोड़ती रहती हैं. मेरा बचपन एक ठेठ पहाड़ी गांव में बीता मगर उतना खुशनुमा नहीं रहा. फिर भी गांव से मुझे अलग ही किस्म का जुड़ाव महसूस होता है. आच्चे-बुबुओं (दादी-दादा) की इस जमीन की सबसे बड़ी खासियत मुझे यही लगती है कि वे सब पुरखे भी यहां की मिट्टी में पैदा हुए और इसी में मिल गए. यह चीज मुझे इस बात का एहसास कराती है कि वे अब भी मेरे साथ रचे-बसे हैं.

अम्मा बताती हैं कि सन 1962 के भारत-चीन युद्ध तक बुबु लोग तिब्बत व्यापार करने जाते थे और आच्चे मौसम के गर्म रहने तक आस-पास के गांवों में घूमती थीं. सर्दियों में सभी भेड़-बकरियों सहित शीत-कालीन प्रवास करने बागेश्वर स्थित अपने गांव थाला आ जाते थे. युद्ध के बाद कुछ वक्त बदल गया और कुछ बाजार, सो सरहद पार के व्यापार बंद हो गए. थोड़े समय बाद बुबु जी ऊनी कारोबार करने लगे और दन, थुलमा, कंबल वगैरह बेचकर जीवन काटा जाने लगा. इसमें बहुत फायदा तो नहीं था, लेकिन घर चल जाता था.

पिताजी भी बुबु के इस काम में उनकी मदद करते थे. बचे हुए वक्त में वो पढ़ना पसंद करते थे और नॉवेल के बहुत बड़े शौकीन थे. जैसा मुझे थोड़ा-बहुत याद है और बाद में कुछ मैंने घर पर पड़ी किताबों से अंदाजा लगाया कि पिताजी जेम्स हेडली और वेदप्रकाश शर्मा के साहित्य (लुगदी) के फैन थे. मैंने तो उन्हें भयंकर बीमारी के दिनों में भी नॉवेल पढ़ते देखा है. नॉवेल शौकीन होने के अलावा पिताजी कैसे थे, यह कम ही याद है क्योंकि जब उनकी मृत्यु हुई तो मैं पांचवीं में पढ़ रही थी.

जब तक पिताजी जिंदा थे उनके लिए मैं अभागन ही रही. उनका मानना था कि जब से मैं मां के पेट में आई उनका बुरा वक्त शुरू हो गया. मेरी पैदाइश से ठीक पहले उन्हें दिल्ली की लिमिटेड कंपनी की नौकरी छोड़कर मजबूरन गांव आना पड़ा. मां बताती हैं कि पहले हमारा परिवार दिल्ली में रहता था. मुझसे बड़े चार भाई-बहन दिल्ली में ही पैदा हुए थे. बस मेरा आना ही बड़े भयंकर समय हुआ. 31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या हुई और जनवरी 1985 की किसी तारीख को मेरी पैदाइश. प्रधानमंत्री की हत्या के बाद दंगे के हालात बनने से पिताजी को सपरिवार गांव लौटना पड़ गया. इस तरह ये दोनों घटनाएं एक-दूसरे से जुड़ गईं.

ईमानदारी से कहूं तो अपनी बिगड़ी परिस्थितियों का दोष भले ही पिता मेरी किस्मत पर डालते रहे हों लेकिन इसके लिए उनकी आदतें भी कम जिम्मेदार न थीं. गांव आने के बाद यह स्थिति और खराब इसलिए हो गई क्योंकि तब तक वे शराब और नशे के आदी भी हो चुके थे. हालांकि उस समय किसी का भी बुरी आदतों में पड़ जाना बहुत आसान था क्योंकि शराब घर-घर में बनाई जाती थी. सो पिताजी भी इसकी चपेट में आ गए और जाहिर है कि इसका बुरा असर हम पर भी जब-तब पड़ता रहा.

एक बार स्कूल में विभागीय निरीक्षण की टीम आई. उन लोगों ने बच्चों से बातें कीं और कई सवाल भी किए. मैंने हर सवाल का सही-सही जवाब दिया. तब अधिकारी ने मुझसे पूछा था कि बेटा आपके पिता क्या करते हैं. इस सवाल का जवाब मेरी एक सहपाठी ने - मुझे नीचा दिखाने के लिए - दिया कि गुंजा के पिता दारू पीते हैं, मतलब कि करते-धरते कुछ नहीं, बस शराबी हैं. फिर भी अधिकारियों ने उसकी बात पर ध्यान न देते हुए पंत मास्साब से कहा कि यह लड़की होनहार है, इसका ध्यान रखना. इसके बावजूद मैं मास्साब के लिए कभी अच्छी नहीं बन सकी.

मेरे बाद एक बहन, एक भाई और पैदा हो गए. इसके कुछ तीन-चार साल बाद ही पिता चल बसे थे. तब मेरी विधवा मां ने ननिहाल के सहारे हमें पाला. इसके बाद तो घर की आर्थिक स्थिति बहुत ही खराब रही. इस सबने मुझे और जवाबदार बना दिया था. मैं उस जरा सी उम्र में घर का चौका-चूल्हा करने लगी थी. बाज-दुदीले के पेड़ पर चढ़कर पत्ते-डालियां तोड़ हरे चारे का इंतजाम करने लगी थी. जब घर के सारे बच्चे, यहां तक कि मुझसे ठीक बड़ी दीदी भी जब टीवी पर ‘शक्तिमान’ या ‘युग’ देखने भाग जाया करते थे, तब मैं घर के काम निपटाकर पढ़ाई कर रही होती थी.

मैं पढ़ने-लिखने में तेज तो थी लेकिन मेरे मार्गदर्शन के लिए कोई नहीं था. उन दिनों कोई पुरानी किताब, यहां तक कि अखबार की कतरनें भी मिलतीं तो मैं उठाकर पढ़ने लगती. खूब मन लगता था. फिर एक बार पंत मास्साब ने नंदन में से एक कविता छब्बीस जनवरी में यादकर सुनाने के लिए दी. तब पता चला कि बच्चों की पत्रिका भी आती है. मैंने कविता सुनाई और ईनाम में मुझे एक पेंसिल मिली. इसके बाद मैं उनसे अक्सर नंदन लेकर पढ़ने लगी.

ऐसे ही एक बार पंत मास्साब ने मुझे नंदन दी थी जो मैंने पढ़कर लौटा दी. बाद में उन्होंने ही ऑफिस में वह कहीं गुम कर दी और इसका इल्जाम मुझ पर लगाया कि मैंने गुमा दी है. फिर खुद उन्हें वो ऑफिस में मिल गई इसके बावजूद उन्होंने मुझसे सांत्वना के दो शब्द भी न कहे. शायद इसलिए कि मैं हमेशा उनकी निगाहों में बदसूरत, गंदी सी, गरीब औऱ शराबी की बेटी थी. इसलिए वे हमेशा मुझसे दूरी बनाकर रखते थे. मुझे इस बात का दुख नहीं है क्योंकि इसी तरह के व्यवहारों के चलते मैं इतनी मजबूत और दृढ़ हुई हूं.

इसके अलावा एक और बात जो मुझे अक्सर याद आती है, वो यह कि हर कोई मेरी मां को बुरा-भला कहता रहता था. जब कभी मां हमारे लिए कुछ करतीं तो रिश्तेदार तंज करते हुए कहते – रांड भई, लाज गई. विधवा मां अपने बच्चों को थोड़ी भी सुख-सुविधा देने की कोशिश करे तो लाज चली जाती है. यह तो हमारे समाज की मानसिकता है!

उसी मां की परवरिश की बदौलत मैं 2006 में उत्तराखंड पुलिस में महिला आरक्षी रह चुकी हूं और फिलहाल प्राइमरी स्कूल की शिक्षिका हूं, लेकिन अपने पंत मास्साब जैसी बिल्कुल नहीं. शायद इसलिए कि मैं गरीब विधवा मां और पियक्कड़ पिता की बेटी हूं जो हर तरह का दुख-दर्द समझ सकती है. इसलिए अपने स्कूल के बच्चों को शिक्षा से ज्यादा अपनत्व और प्रेम की भावना देना चाहती हूं.

(पाठक बचपन से जुड़े अपने संस्मरण हमें mailus@satyagrah.com या anjali@satyagrah.comपर भेज सकते हैं.)