केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड उर्फ सेंसर बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष पहलाज निहलानी शायद इकलौते ऐसे शख्स होंगे जिन्हें प्रधानमंत्री और उनके कैबिनेट के ज्यादातर मंत्री उनके पद पर नहीं देखना चाहते थे, फिर भी वे अपने दफ्तर में टिके हुए थे. उन्हें हटाने का फैसला अरुण जेटली और वेंकैया नायडू तक नहीं कर पाए. लेकिन स्मृति ईरानी ने सूचना एवं प्रसारण मंत्री बनने के महीने भर में ही ऐसा कर दिया.

सुनी-सुनाई से कुछ ज्यादा है कि पहलाज निहलानी को सेंसर बोर्ड का मुखिया बनाने का फैसला आरएसएस के एक बड़े पदाधिकारी की तरफ से हुआ था. निहलानी आरएसएस के नेताओं की खूब खातेदारी किया करते थे और उसी से खुश होकर उन्हें सम्मानजनक पद देने का वादा कर दिया गया.

2014 में मोदी सरकार नई थी और हर तरफ से नई-नई नियुक्तियों के लिए नाम भेजे जा रहे थे. उसी दौरान पहलाज निहलानी का नाम भी सेंसर बोर्ड के चीफ के लिए सूचना और प्रसारण मंत्री अरुण जेटली के पास भेजा गया. उस वक्त जेटली एक साथ कई जिम्मेदारी संभाल रहे थे. नए वित्त मंत्री के साथ साथ रक्षा मंत्री भी वे ही थे. ऐसे में सूचना-प्रसारण मंत्रालय का ज्यादातर काम राज्यमंत्री राज्यवर्धन राठौर देखते थे. सेंसर बोर्ड का नया चीफ कौन होगा, यह फैसला भी जेटली ने राज्यवर्धन पर छोड़ दिया. आरएसएस की तरफ से आए पहलाज निहलानी के नाम को भाजपा में नए-नए आए राज्यवर्धन नज़रअंदाज़ नहीं कर पाए और उन्हें सेंसर बोर्ड का चीफ बना दिया गया.

उस वक्त तक सरकार के शीर्ष नेतृत्व को तनिक भी ये इल्म नहीं था कि सेंसर बोर्ड के नये चीफ को आते ही मीडिया में इतनी सुर्खियां मिलेंगी. बाद में पूछने पर कई मंत्रियों ने मजाकिया लहजे में कहा, ‘शायद हम इतनी फिल्में नहीं देख पाते, इसलिए सेंसर बोर्ड के सर्टिफिकेट की अहमियत उस वक्त समझ में नहीं आई.’ जब पहलाज ने फिल्मों पर कैंची चलानी शुरू की तो सरकार को भी इस वजह से खासी आलोचना झेलनी पड़ी. इसके बाद जेटली ने जब-जब निहलानी को हटाने की कोशिश की, हर बार संघ के कुछ खास अधिकारियों ने उन्हें एक और मौका देने की वकालत कर दी.

इसके बाद श्याम बेनेगल समिति बनी. इस कमिटी की रिपोर्ट के आधार पर जेटली सेंसर बोर्ड के चीफ की शक्ति को ही खत्म कर देना चाहते थे. ऐसा होता इससे पहले ही मंत्रिमंडल में फेरबदल हो गया और जेटली सूचना प्रसारण मंत्री नहीं रहे. इसके बाद वेंकैया नायडू सूचना प्रसारण मंत्री बने. उनके पास भी एक और शहरी विकास मंत्रालय भी था. वे भी संघ को नाराज़ करना नहीं चाहते थे इसलिए पहलाज निहलानी अपने पद पर टिके रहे.

मोदी सरकार में तीसरी सूचना प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी बनीं. स्मृति ईरानी के पास जिस दूसरे कपड़ा मंत्रालय की जिम्मेदारी थी वह उतना भारी-भरकम नहीं था. दूसरा उन्हें जल्द ही होने वाले मंत्रिमंडल के फेरबदल में पूरी तरह से सूचना मंत्रालय का ही प्रभार दिया जा सकता है. इसलिए उन्होंने अपने नए मंत्रालय को पूरा वक्त देना शुरू किया. मोदी सरकार में स्मृति ईरानी उन गिनी-चुनी मंत्रियों में हैं जिनका मुंबई के फिल्म और टीवी उद्योग के लोगों से सीधा संपर्क है. वे खुद टीवी धारावाहिकों की मशहूर अभिनेत्री रह चुकी हैं. एकता कपूर जैसे फिल्म निर्माताओं से उनके पारिवारिक रिश्ते हैं.

ऐसे में पिछले दो सालों से पहलाज निहलानी के खिलाफ कई तरह की शिकायतें स्मृति ईरानी को सीधे ही मिल रही थीं. सुनी-सुनाई है कि पहलाज निहलानी के खिलाफ स्मृति को कुछ ऐसी जानकारियां भी मिली थीं जिनसे पता लगता था कि अगर उन्हें वक्त रहते न हटाया तो वे सरकार के लिए पहले से बड़ी मुसीबत बन सकते हैं.

स्मृति ईरानी ने इन आरोपों के बारे में सरकार, पार्टी और संघ तीनों के ही शीर्ष नेतृत्व को भरोसे में लिया और एक झटके में पहलाज निहलानी के नीचे से कुर्सी खींच ली. इससे पहले कि वे अपनी कुर्सी बचाने की कोशिश करते उनकी जगह प्रसून जोशी को सेंसर चीफ बनाने का फैसला लिया जा चुका था.

प्रसून जोशी ऐसा नाम हैं जिन्हें गजेंद्र चौहान की तरह लाइटवेट भी नहीं माना जा सकता. उन्हें मोदी सरकार के करीब भी माना जाता है. 2014 के आम चुनाव में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनाव प्रचार में अहम भूमिका निभाई थी. उन्होंने स्वच्छ भारत अभियान के लिए भी काम किया लेकिन कभी न बातों की ज्यादा चर्चा नहीं की. माना जा रहा है कि प्रसून जोशी को जो ईनाम 2014 में ही मिल जाना चाहिए था वो 2017 में मिला.