पिछले साल नाेटबंदी के बाद हफ्तों-महीनों तक लोगों को नए नोटों की उम्मीद में तक़लीफ झेलनी पड़ी थी. बैंकों के सामने लंबी-लंबी लाइनों में लगना पड़ा. जानते हैं क्याें? क्योंकि आरबीआई (भारतीय रिजर्व बैंक) ने नए नोट उतनी मात्रा में छापे ही नहीं थे, जितने की जरूरत थी. द इकॉनॉमिक टाइम्स की ख़बर में ख़ुलासा हुआ है.

ख़बर के मुताबिक आठ नवंबर को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 500 और 1,000 रुपए के नोट को बंद करने का ऐलान किया उस वक़्त आरबीआई हालात से निपटने के लिए पूरी तरह मुस्तैद ही नहीं था. उसके पास 4.95 लाख करोड़ रुपए के नए नोट थे ज़रूर लेकिन सब 2,000 के. समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक 500 रुपए के नए नोट तो केंद्रीय बैंक के पास बिल्कुल भी नहीं थे जबकि सबसे ज़्यादा मांग उन्हीं की थी.

इसीलिए लोगों को नए नाेटों के लिए लंबा इंतज़ार करना पड़ा. यही वज़ह थी कि प्रधानमंत्री द्वारा दी गई 50 दिन की समय सीमा के बाद भी नए नोटों की आपूर्ति सामान्य नहीं हो पाई थी. लोगों को इस दौरान काफी मशक्कत के बाद नए नोट मिले लेकिन ज़्यादातर 2,000 के ही. उनके छुट्‌टे हासिल करने के लिए आम आदमी को फिर परेशान होना पड़ा. हालात कई हफ्ते बाद तब कुछ सुधरे जब 500 के नोटों की आपूर्ति की जाने लगी.

देश में नोट छापने के लिए मैसुरू (कर्नाटक), सालबोनी (पश्चिम बंगाल), देवास (मध्य प्रदेश), नासिक (महाराष्ट्र) में चार प्रिंटिंग प्रेस हैं. इनमें मैसुरू और सालबोनी के प्रेस का संचालन आरबीआई देखता है. नोटबंदी की घोषणा होते ही इनमें 500 के नए नोटों की छपाई भी शुरू हो गई. लेकिन उनसे पर्याप्त आपूर्ति नहीं हो पा रही थी. सो नवंबर के दूसरे हफ्ते में नासिक और देवास की प्रेस में भी छपाई शुरू हुई जिनका संचालन सरकार के ज़िम्मे है.

सूत्र बताते हैं नोट छापने का काम भी पहले-पहले दो शिफ्ट में ही हो रहा था. बाद में इस काम को तीन शिफ्टों में करने का फैसला किया गया. नोटबंदी के बाद नए नोट छापने की प्रक्रिया में प्रिंटिंग प्रेसों से कुछ समय पहले ही सेवानिवृत्त हुए 100 कर्मचारियों को फिर लगाया गया. इसके अलावा रक्षा मंत्रालय ने अपने 200 कर्मचारियों को भी इस काम में तैनात किया. इन्हें नोट छापने की प्रक्रिया में ग़ैर-तकनीकी किस्म के काम सौंपे गए.

सूत्रों के मुताबिक नए नोट छापने की पूरी प्रक्रिया में अमूमन 40 दिन लगते हैं. इनमें 30 दिन तो नया कागज, स्याही आदि पहुंचने में लगता है. जबकि 10-11 दिन सुदूरवर्ती आरबीआई चेस्ट (चुनिंदा बैंकों की वे शाखाएं जिन्हें रिजर्व बैंक अपनी ही तरह नोट वितरित करने और जमा करने का अधिकार देता है) तक छपे हुए नोट पहुंचने में लगते हैं. सरकार ने यह समय भी घटाकर अौसतन 22 दिन किया. तब कहीं स्थिति सामान्य हो पाई.