खबर है कि एपल के ऑपरेटिंग सिस्टम आईओएस पर अपना सर्च इंजन रखने के लिए गूगल, एपल को इस साल लगभग 20 हज़ार करोड़ रुपये देगा. सन 2014 में गूगल ने एपल को लगभग सात हज़ार करोड़ रुपये दिए थे.

जानकारों के मुताबिक़ गूगल द्वारा दी जाने वाली रकम एपल के लिए विशुद्ध मुनाफ़ा है. ये रकम एपल के ऑपरेटिंग प्रॉफिट का लगभग पांच प्रतिशत है. लेकिन गूगल क्यों एपल को इतनी बड़ी रकम देना चाहता है?

प्रतिस्पर्धा ख़त्म करने की जिद

जैसा नाम से जाहिर है सर्च इंजन एक तरह का सॉफ्टवेयर सिस्टम होता है जो वर्ल्ड वाइड वेब पर चाही गयी जानकारी ढूंढता है. आज इंटरनेट की दुनिया में गूगल, बिंग, याहू, बायदू, एओएल और आस्कडॉटकॉम जैसे कई सर्च इंजन हैं. लेकिन गूगल इन सबका बादशाह है. बाजार में गूगल सर्च की भागीदारी आज भी 80 फीसदी से ज्यादा है. फिर भी वह दूसरे सर्च इंजनों को और पीछे धकेलना चाहता है. बाकी सर्च इंजनों में से अगर गूगल किसी को अपना प्रतिस्पर्धी मानता है तो वह है माइक्रोसॉफ्ट का बिंग जिसकी हिस्सेदारी सिर्फ पांच प्रतिशत ही है.

गूगल और माइक्रोसॉफ्ट की तनातनी आज की नहीं है. 1998 में जब लैरी पेज और सेर्गे ब्रिन ने गूगल की स्थापना की थी तो इसके कुछ समय बाद ही माइक्रोसॉफ्ट और गूगल के बीच टेक्नॉलॉजी की सबसे बेहतरीन कंपनी बनने की होड़ शुरू हो गयी थी. बाद में लड़ाई यूनिवर्सिटी के कैंपसों में सबसे बेहतर छात्रों को पाने की होड़ में लड़ी जाने लगी.

सन 2006 में जब यू ट्यूब खरीदने की बोली लगाई जा रही थी तो गूगल ने लगभग पौने दो अरब अमरीकी डॉलर की बोली लगाकर इसे माइक्रोसॉफ्ट की पहुंच से दूर कर दिया था. 2013 में यह लड़ाई और भी तेज हो गयी जब गूगल ने साबित कर दिया कि बिंग उसके यानी गूगल सर्च के सर्च परिणामों की जासूसी कर रहा है. असल में माइक्रोसॉफ्ट ब्राउज़र टूलबार पर गूगल सर्च में डाले जाने वाले शब्दों को पकड़ने की कोशिश कर रहा था. गूगल ने इसे साबित करने के लिए एक गलत शब्द बनाया और अपने सर्च इंजन पर डाल दिया. माइक्रोसॉफ्ट ने भी बिंग पर वही शब्द कॉपी कर लिया!

आज एपल उस मुक़ाम पर है जहां हर सर्च इंजन उसके ऑपरेटिंग सिस्टम का हिस्सा बनना चाहता है. माइक्रोसॉफ्ट लगातार कोशिश कर रहा है कि उसका सर्च इंजन बिंग गूगल की बराबरी पर आ जाए. फिलहाल तो यह बहुत दूर की कौड़ी लगती है. फिर भी गूगल ऐसी कोई गलती करना नहीं चाहेगा जिससे उसे बाद में पछताना पड़े.

गूगल के मुनाफ़े में एपल की बड़ी भागेदारी

बहुत समय तक गूगल का रेवेन्यू मॉडल दुनिया के लिए एक अबूझ पहेली ही रहा. 2005 में तब सीईओ एरिक श्मिड्ट से वाशिंगटन यूनिवर्सिटी में जब किसी छात्र ने इस बारे में जानना चाहा तो उन्होंने कहा कि वे इसे साझा नहीं कर सकते क्योंकि उनका मॉडल बहुत ही अलग किस्म का है. उनका कहना था कि अगर उन्होंने यह बता दिया तो निश्चित ही हर इंटरनेट सर्च इंजन कंपनी इसे अपना लेगी. कुछ सालों बाद जाकर खुद गूगल ने इसे साझा किया, लेकिन तब तक कंपनी बाकियों से मीलों आगे निकल चुकी थी. गूगल के मुताबिक कंपनी की लगभग 96 फीसदी आय एडवरटाइजिंग (विज्ञापन) से होती है जिसमें लगभग 70 फीसदी एड वर्ड और एड सेंस से आती है.

एपल के ऑपरेटिंग सिस्टम आईओएस के ब्राउजर सफारी पर गूगल डिफॉल्ट सर्च इंजन है. माना जाता है कि गूगल को मोबाइल सर्च से होने वाली कमाई का लगभग 50 प्रतिशत इससे आता है. 2014 में तो यह आंकड़ा 75 फीसदी था. ऐसे भी स्वाभाविक ही है कि गूगल किसी भी प्रकार से एपल से नाता नहीं तोड़ सकता. हालांकि आईओएस पर गूगल सर्च इंजन को बनाए रखना एपल की भी मजबूरी है क्योंकि गूगल सर्च का पर्याय बन चुका है और अगर वह कोई और विकल्प अपनाए तो ग्राहक बिदक सकते हैं. लेकिन मजबूरियों के इस व्यापार में फिर भी गूगल का पलड़ा हल्का है. इसलिए बीते तीन साल में उसके द्वारा एपल को दी जाने वाली रकम में तीन गुना बढ़ोतरी हो चुकी है.