एल नीनो से हुए नुकसान की भरपाई करके इंडियन नीनो मौसम विभाग की भविष्यवाणी को गलत साबित कर सकता है.
गर्मी से झुलस रहे देश को भारतीय मौसम विभाग ने दो जून को और भी परेशान करने वाली खबर दी. विभाग ने कहा कि इस बार मॉनसून सामान्य से 88 फीसदी रहेगा. इससे पहले मौसम विभाग ने अप्रैल में भी कहा था कि इस साल सात फीसदी कम यानी 93 फीसदी बारिश होगी. पिछले साल भी मॉनसून के दौरान सामान्य से कम बारिश हुई थी. इस साल भी ऐसा ही हुआ तो पहले से ही सूखे से जूझ रहे एक बड़े इलाके में हालात और भी खराब हो जाएंगे. इस साल अप्रैल-जून में हुई बेमौसम बारिश ने गेहूं, सरसों सहित तमाम फसलों का काफी नुकसान किया. अब अगर मॉनसून में सामान्य से कम बारिश होती है तो धान, मक्का, ज्वार और खरीफ की ऐसी तमाम फसलों पर इसका बुरा असर पड़ेगा. कुल मिलाकर यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए अच्छी खबर नहीं है.
इस भविष्यवाणी का बड़ा आधार प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान बढ़ने की वह घटना है जिसे एल नीनो कहा जाता है और जिसका नतीजा मॉनसून के कमजोर होने के रूप में सामने आता है.
लेकिन यह भी हो सकता है कि 140 साल पुराना भारतीय मौसम विभाग गलत हो. देश में मौसम की भविष्यवाणी करने वाली निजी क्षेत्र की सबसे बड़ी कंपनी स्काईमेट का मानना तो यही है. यह कंपनी देश भर में फैले अपने करीब ढाई हजार मौसम केंद्रों से आंकड़े जुटाती है और खबरों पर जाएं तो कम से कम बीते तीन साल से मॉनसून को लेकर उसकी भविष्यवाणियां मौसम विभाग से ज्यादा सटीक रही हैं. अप्रैल में जब मौसम विभाग ने कहा था कि बारिश सात फीसदी कम होगी तो स्काईमेट का कहना था कि 50 साल की दीर्घावधि वाले औसत (एलपीए) के मुकाबले इस साल मॉनसून 102 फीसदी रहेगा. यानी देश में इस साल बारिश सामान्य रहेगी. एलपीए 1951 से लेकर 2000 तक जून से सितंबर के दौरान हुई बारिश का औसत आंकड़ा है जिसका मानक एक साल के दौरान 89 सेमी वर्षा तय किया गया है.
एक वेबसाइट से बातचीत में स्काइमेट के मुख्य मौसम विज्ञानी महेश पलावत कहते हैं, 'बुरी से बुरी परिस्थितियों में भी हमारा मानना है कि मॉनसून सामान्य से दो फीसदी कम यानी 98 फीसदी रहेगा. तब भी इसका मतलब है कि इस साल बारिश सामान्य रहेगी.' उधर, मौसम विभाग का मानना है कि मॉनसून एलपीए के 90 फीसदी से भी कम रहेगा.
कम बारिश की इस भविष्यवाणी का बड़ा आधार प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान बढ़ने की वह घटना है जिसे एल नीनो कहा जाता है और जिसका नतीजा एशियाई देशों में मॉनसून के कमजोर होने के रूप में सामने आता है. भारतीय मौसम विज्ञान विभाग और स्काईमेट, दोनों का मानना है कि एल नीनो के मॉनसून को कमजोर करने की संभावना 90 फीसदी है.
लेकिन स्काईमेट के विशेषज्ञों का कहना है कि एक और बड़ी चीज है जो एल नीनो के असर को खत्म कर सकती है. यह है द इंडियन ओशन डाइपोल (आईओडी) जिसे इंडियन नीनो भी कहा जाता है. इंडियन नीनो नाम की यह परिघटना हिंद महासागर के पश्चिमी और पूर्वी छोर पर समुद्र की सतह के तापमान में अंतर के चलते अस्तित्व में आती है. हालांकि आईओडी मॉनसून पर सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों तरह के प्रभाव होते हैं, लेकिन इस बार जानकार उम्मीद कर रहे हैं कि यह सकारात्मक रहेगा. आईओडी के सकारात्मक होने का मतलब है भारतीय उपमहाद्वीप में अच्छी बारिश होने की संभावनाओं में वृद्धि. यानी इंडियन नीनो, एल नीनो के असर को खत्म कर सकता है. ऐसा अतीत में हुआ भी है. 1997 में जब एल नीनो के चलते मॉनसून के बारे में चिंताएं जताई गई थीं तो उस साल सकारात्मक आईओडी के चलते अच्छी बारिश हुई थी.
ऐसा अतीत में हुआ भी है. 1997 में जब एल नीनो के चलते मॉनसून के बारे में चिंताएं जताई गई थीं तो सकारात्मक आईओडी के चलते अच्छी बारिश हुई थी.
पलावत कहते हैं, 'अरब सागर में तापमान अभी तक सामान्य से ऊपर रहा है और हमें लग रहा है कि यह सकारात्मक आईओडी की वजह बन सकता है. यह एल नीनो के प्रभाव को खत्म कर देगा जिसके नतीजे में अच्छी बारिश होगी.' कुछ समय पहले सत्याग्रह की एक रिपोर्ट में भी कहा गया था कि 2015 में एल नीनो प्रभाव से प्रशांत महासागर के पूर्वी हिस्से का तापमान तेजी से बढ़ रहा है इसलिए इसका असर मॉनसून पर नहीं पड़ेगा. अगर मध्य हिस्से के तापमान में बढ़ोतरी हो रही होती तो चिंता की बात होती.
स्काईमेट का यह भी मानना है कि लगातार दूसरे साल मॉनसून के कमजोर रहने की संभावनाएं बहुत क्षीण हैं. बीती सदी के दौरान लगातार दो साल सूखा पड़ने की घटनाएं सिर्फ तीन बार हुई हैं. पहली बार यह 1904-05 में हुआ. दूसरी बार 1966-67 में और तीसरी बार1985-86-87 में. जानकारों के मुताबिक फिलहाल लगातार दूसरे साल सूखा पड़ने की संभावना सिर्फ तीन फीसदी है. एक लाइववेबचैट के दौरान स्काइमेट के सीईओ जतिन सिंह का कहना था कि मौसम विभाग एल नीनो के प्रभाव को कुछ ज्यादा ही आंक रहा है और इस बार न सिर्फ बारिश सामान्य रहेगी बल्कि इसके बीच लंबे अंतराल भी नहीं रहेंगे जैसा पिछले साल देखने को मिला था. उनके मुताबिक इसके चलते इस बार खरीफ की बंपर फसल होगी.
पांच दिन की देर के बाद आखिरकार मॉनसून पांच जून को केरल पहुंचने वाला है. सितंबर तक साफ हो जाएगा कि कौन सही था और कौन नहीं.