केवल पौने तीन करोड़ जनसंख्या वाला उत्तर कोरियाई कम्युनिस्ट बौना 32 करोड़ 33 लाख जनसंख्या वाले पूंजीवादी अमेरिकी भीम से दो-दो हाथ कर लेने के लिए मचल रहा है. इस बौने को लगता है कि दुनिया को ठेंगा दिखा कर उसने अब तक जितने परमाणु बम और प्रक्षेपास्त्र जुटा लिये हैं, उनके बल पर वह महाबली अमेरिकी भीम के गर्व को धूल चटा सकता है. दुनिया सहमी हुई है कि इन दोनों वहमी देशों के अक्खड़ नेताओं की अकड़ कहीं विश्वशांति को ही न जकड़ ले!

तथ्य यह है कि बड़बोले उत्तर कोरिया के केवल 32 वर्षीय वर्तमान तानाशाह किम जोंग उन को ही नहीं, उसके पिता किम इल जोंग और दादा किम इल सुंग को भी आजीवन यह शौक चर्राता रहा कि अमेरिका के साथ कभी न कभी दो-दो हाथ हो ही जाना चाहिये. दादा किम इल सुंग का यह शौक पूरा भी हो गया होता, यदि 25 जून 1950 से 27 जुलाई 1953 तक चले तथाकथित ‘कोरिया युद्ध’ में पहले भारी सफलता और बाद में वैसी ही मार खाने के बाद उनकी हार न हो गयी होती. पोते को भी शायद भ्रम हो गया है कि उसने ‘कहीं का ईंट, कहीं का रोड़ा, भानमती ने कुनबा जोड़ा’ वाले तरीके से अब तक जो बम और रॉकेट बना लिये हैं, वे अमेरिका को टक्कर देने और दादा की हार का बदला लेने के लिए पर्याप्त हैं.

धौंस-धमकी क्या युद्ध की भूमिका बनेगी?

सारी दुनिया उधेड़बुन में है कि उत्तर कोरिया और अमेरिका के बीच इस समय जो धौंस-धमकी चल रही है, क्या वह सचमुच एक नये युद्ध की भूमिका बनेगी? उत्तर कोरिया क्या सीधे अमेरिका पर या प्रशांत महासागर में उसके गुआम नौसैनिक अड्डे पर प्रहार करने का दुस्साहस करेगा? पश्चिमी देशों के राजनीति-पंडित ही नहीं, जाने-माने अस्त्र-शस्त्र विशेषज्ञ भी इस बारे में एकमत नहीं हैं कि अंततः क्या होगा. पर इस बात पर सभी एकमत लगते हैं कि किम जोंग उन का ऐसा हर दुस्साहस आत्मघाती ही सिद्ध होगा. देखते हैं सामरिक महत्व के ऐसे कुछ तथ्य, जो कुछ विशेषज्ञों को यह मानने के लिए प्रेरित करते हैं कि उत्तर कोरिया की धमकियों को सरासर खारिज भी नहीं किया जा सकता.

इन विशेषज्ञों का कहना है कि चीन के बाद 10 लाख से अधिक नियमित और सदा तैयार सैनिकों वाली उत्तर कोरिया की थल और वायुसेना ही एशिया में दूसरी सबसे बड़ी सेना है. उसका संख्याबल हथियारों के अत्याधुनिक नहीं होने की भरपाई करने में सक्षम माना जा सकता है. उसके इस दावे की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती कि उसके पास कई परमाणु बम हैं और अब तो ताएपोदोंग-2 नाम का एक ऐसा नवविकसित अंतरमहाद्पीय प्रक्षेपास्त्र (मिसाइल/रॉकेट) भी है, जिसे परमाणु हथियारों से लैस किया जा सकता है.

परीक्षणों की झड़ी

9 अक्टूबर 2006 को उत्तर कोरिया के पहले भूमिगत परमाणु परीक्षण से पैदा हुई तरंगों की पुष्टि रूसी और दक्षिण कोरियाई वैज्ञानिकों ने भी की थी, भले ही यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि ये तरंगें किसी पारंपरिक बम के भूमिगत विस्फोट से पैदा हुई थीं या वाकई परमाणु बम के विस्फोट से. इसी तरह फरवरी 2013 में उत्तर कोरिया ने अपना दूसरा भूमिगत परमाणु परीक्षण किया. पांच जनवरी 2016 को उसने अपने पहले हाइड्रोजन बम के परीक्षण का दावा भी ठोक दिया और एक महीने बाद, आठ फ़रवरी 2016 के दिन कहा कि उसने लंबी दूरी के एक रॉकेट से एक उपग्रह अंतरिक्ष में भेजा है. उस समय अनुमान लगाया गया था कि उपग्रह के बहाने से वास्तव में एक ऐसे रॉकेट का परीक्षण किया गया है, जो परमाणु बम ले कर अमेरिका तक पहुंच सके.

उत्तर कोरिया ने नौ और 23 अप्रैल 2016 को अंतरमहाद्पीय प्रक्षेपास्त्रों वाले दो और कथित परीक्षण भी किये थे. फ़रवरी 2017 में उसने मध्यम दूरी के एक नये प्रक्षेपास्त्र के सफल परीक्षण का दावा किया और कहा कि पुकगुक्सोन-2 नाम का यह प्रक्षेपास्त्र एक बैलिस्टिक (अंतरिक्ष में जा कर वायुमंडल में फिर प्रवेश करने वाली) मिसाइल है. उत्तर कोरिया के प्रतिद्वंद्वी दक्षिण कोरियाई सैन्य सूत्रों ने उस समय कहा कि जापान की दिशा में छोड़ा गया यह प्रक्षेपास्त्र केवल 500 किलोमीटर की उड़ान के बाद समुद्र में भले ही जा गिरा, पर वह 550 किलोमीटर तक ऊपर जाने के बाद, यानी सचमुच अंतरिक्ष में जाने के बाद, समुद्र में गिरा था. बीते हफ्ते कोरिया ने पहली बार एक इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल का परीक्षण जापान के ऊपर से करने की भी हिम्मत जुटा ली, इसे लेकर दुनिया भर में चर्चा चली ही रही थी कि उसने बीते सोमवार को दूसरे हाइड्रोजन बम के परीक्षण का भी दावा कर दिया. उसका कहना है कि ये हाइड्रोजन बम इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल के जरिये अमेरिका तक पहुंचने में सक्षम है.

एक साल में 20 से अधिक परीक्षण

अकेले 2016 में उत्तर कोरिया ने 20 से अधिक रॉकेट परीक्षण किये हैं. उसने दो ऐसे भूमिगत परमाणु परीक्षण भी किये, जिनके झटके जापान के हिरोशिमा पर गिराये गये पहले परमाणु बम जितने शक्तिशाली थे. इस समय वह संभवतः 9000 किलोमीटर तक जा सकने वाले एक ऐसे अंतरमहाद्पीय प्रक्षेपास्त्र को परिष्कृत करने में व्यस्त बताया जाता है जिसकी दायरे में अमेरिका के लगभग सभी प्रमुख शहर आ जाएंगे.

उत्तर कोरिया के इन दावों को गंभीरता से लेने वाले यूरोपीय विशेषज्ञों के लिए सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि संयुक्त राष्ट्र द्वरा लगाये गये कठोर आर्थिक व तकनीकी प्रतिबंधों के बावजूद वह इन धुआंधार परीक्षणों की झड़ी कैसे लगा पाया और अब भी लगाए जा रहा है? वर्षों से व्यापक ग़रीबी, यहां तक कि भुखमरी तक से पीड़ित बताए जा रहे इस देश की सनकी सरकार को बमों और प्रक्षेपास्त्रों के लिए आवश्यक तकनीकी ज्ञान, धन और साधन कहां से मिलता है?

चीन संदेह के घेरे में

अटकलें लगाई जा रही हैं कि हो-न-हो, ‘मुंह में राम बगल में छुरी’ रख कर चलने में माहिर चीन अब भी उत्तर कोरिया की अकड़ का मुख्य संबल हो! पर, चीन भी इतना चुप्पा और रहस्यमय है कि यह जान पाना संभव नहीं लगता कि वह पर्दे के पीछे क्या गोरखधंधा कर रहा है. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में उत्तर कोरिया पर लगे प्रतिबंधों को और कड़ा करने के नए प्रस्ताव के प्रति चीनी समर्थन को इसी कारण बहुत गंभीरता ले नहीं लिया जा सकता.

जर्मनी में म्यूनिक के तकनीकी विश्वविद्यालय में रॉकेट तकनीक के प्रोफ़ेसर और देश के एक जाने-माने प्रक्षेपास्त्र-विशेषज्ञ, रोबेर्ट शूमाकर उन विशेषज्ञों में गिने जाते हैं, जो उत्तर कोरिया के दावों को गीदड़भभकी मानते हैं. 12 अगस्त को एक मीडिया-इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि वे नहीं मानते कि उत्तर कोरिया प्रक्षेपास्त्र तकनीकी में उस ऊंचाई पर पहुंच गया है, जिसका वह स्वांग भरता है. प्रो शूमाकर का कहना है, ‘उत्तर कोरिया गुआम की तरफ या सीधे अमेरिका की तरफ भी एकाध रॉकेट चला तो सकता है, पर इससे ज्यादा वह कुछ नहीं कर पायेगा, क्योंकि उसका रॉकेट किसी बहुत कम वज़न वाले बम को ही ले जा पायेगा.’

उत्तर कोरियाई ढोल की पोल

प्रोफेसर शूमाकर ने इस इंटरव्यू में कहा कि पिछले परीक्षणों के समय उत्तर कोरियाई रॉकेट जितनी ऊंचाई पर गये, उतनी दूरी नहीं तय कर पाये. उनके शब्दों में ‘ऐसा जानबूझ कर किया गया होना चाहिये, क्योंकि कोई रॉकेट जितना अधिक ऊपर जायेगा, उतना ही नज़दीक गिरेगा. यदि रॉकेट काफ़ी दूर तक जाने के लिए चलाया गया, तो उसका (वायुमंडल में) पुनरप्रवेशी हिस्सा भी कहीं दूर जा कर समुद्र में गिरेगा, जिसे खोजना, निकालना और जांचना-परखना होगा. उत्तर कोरिया के पास ऐसे नौसेनिक बल और साधन नहीं हैं कि वह समुद्र में गिरे हिस्सों को खोज कर निकाल पाये. ऐसी किसी खोज के समय ख़तरा यह होगा कि (वायुमंडल में) पुनरप्रवेशी हिस्सा कहीं किसी दूसरे देश के हाथ न लग जाये.’

प्रो. शूमाकर मानते हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को भी यह बात ज़रूर बतायी गयी होगी, इसीलिए वे फ़िलहाल केवल शब्दबाण चला रहे हैं. परमाणु युद्ध छेड़ने की उन्हें ज़रूरत ही नहीं है. वे कहते हैं, ‘यदि कोई कहता है कि मैं तुम्हारे ऊपर रॉकेट चलाऊंगा तो उन्हें (ट्रंप को) भी तो यह कहना ही होगा कि देख, ज़रा सोच-समझ ले, वर्ना तेरी ख़ैरियत नहीं है!’ प्रो. शूमाकर की सलाह है कि बेहतर तो यही होगा कि राष्ट्रपति ट्रंप 32 वर्षीय उत्तर कोरियाई तनाशाह किम जोंग उन की हरकतों को बिगड़ैल बच्चों जैसी बचकानी हरकतें मान कर अनदेखी कर दें. रॉकेट-तकनीक के इस जर्मन विशेषज्ञ का कहना है, ‘वह (किम) बच्चों की तरह हमारा ध्यान खींचना चाहता है और हम हैं कि उसकी चाल में आ गये. यह ग़लत है,’

यूक्रेन प्रक्षेपास्त्र तकनीक देने में सबसे आगे

उत्तर कोरियाई तानाशाह की नीतियां और हरकतें तर्कसम्मत या विवेकसंगत तो सच में नहीं कही जा सकतीं. तब भी यह प्रश्न अपनी जगह बना ही रहता है कि उसे प्रक्षेपास्त्र बनाने का धन, साधन और तकनीकी ज्ञान भला कहां से मिलता है? वे कौन से देश या लोग हैं, जो उत्तर कोरिया की आड़ ले कर विश्व-शांति को भंग करने में दिलचस्पी रखते हैं? इस प्रश्न का पूरा तो नहीं, पर एक चौंकाने वाला महत्वपूर्ण उत्तर इन्हीं दिनों मिला है. लंदन स्थित उंतरराष्ट्रीय सामरिक अध्ययन संस्थान (आईआईएसएस) के एक अध्ययन से पता चला है कि अमेरिका, जर्मनी और पूरे यूरोपीय संघ का लाडला यूक्रेन वह देश है, जो उत्तर कोरिया को प्रक्षेपास्त्र निर्माण की तकनीक देने में सबसे आगे है!

‘आईआईएसएस’ के खोजियों ने पाया कि उत्तर कोरिया के नये मध्यवर्ती दूरी और लंबी दूरी वाले अंतरमहाद्वीपीय प्रक्षेपास्त्रों के इंजन उसे यूक्रेनी कंपनी ‘युशमाश’ से मिले हैं. ‘आईआईएसएस’ के एक विशेषज्ञ को तो यहां तक शक है कि यूक्रेन की यह कंपनी उत्तर कोरिया को अपने ‘परीक्षण-स्थल’ के तौर पर इस्तेमाल कर रही है. हालांकि यूक्रेन की सरकार ने इस बात से साफ़ इन्कार किया है कि उत्तर कोरिया की सामरिक प्रगति में उसका रत्ती भर भी हाथ है.

यूक्रेनी कंपनी की गोलमटोल स्वीकारोक्ति

‘आईआईएसएस’ के सामरिक तकनीक विशेषज्ञ माइकल एलेमैन का कहना है कि हो सकता है कि ‘युशमाश’ कंपनी हथियरों की तस्करी करने वाले व्यापारियों के माध्यम से उत्तर कोरिया को अवैध रूप से राकेट-इंजन भेजा करती हो, पर इस गोलमाल में वह शामिल ज़रूर है. ‘युशमाश’ कंपनी का दावा है कि उसके किसी भी कर्मचारी का इस सौदे में हाथ नहीं है, पर वह इस संभावना से इन्कार नहीं करती उसके बनाए रॉकेट-इंजनों की कॉपियां (नकलें) उत्तर कोरिया पहुंच गयी हों. कंपनी का कहना है कि आख़िरकार, उसके इंजनों की दुनिया भर में अच्छी-ख़ासी मांग है.

कहने की आवश्यकता नहीं कि ‘युशमाश’ कंपनी के रॉकेट-इंजनों की यदि दुनिया भर में मांग है, तो उत्तर कोरिया को भी उन्हें बेचने से वह परहेज़ भला क्यों करने लगे! जर्मनी में म्यूनिक के तकनीकी विश्वविद्यालय में रॉकेट तकनीक के प्रोफ़ेसर रॉबर्ट शूमाकर ने उत्तर कोरिया के उन सभी क़रीब 100 रॉकेटों की गहराई से छानबीन की है, जिनके उसने 1984 से अब तक कथित ‘परीक्षण’ किये हैं. इसके लिए उन्होंने उनके वीडियो, फ़ोटो, उड़ानपथ तथा पड़ोसी देशों जापन और दक्षिण कोरिया द्वारा एकत्रित टेलीमेट्रिक डेटा का अध्ययन किया है. उनका कहना है कि वे सब किसी उड़ान के ‘परीक्षण’ (टेस्ट) नहीं मात्र ‘प्रदर्शन’ (डेमॉन्सट्रेशन) थे. उत्तर कोरिया को रॉकेट-तकनीक देने वाले देश ‘यदि अपना नल बंद कर दें,’ तो उसके कथित ‘परीक्षणों’ का सूखा पड़ जायेगा.

सात रॉकेट रूसी स्कड रॉकेटों जैसे मिले

प्रो. शूमाकर और उनके सहयोगी जर्मनी के ही मार्कुस शिंलर ने उत्तरी कोरिया के रॉकेटों और अन्य देशों के रॉकेटों की बनावट के मॉडलों की तुलनाएं भी की हैं. इन तुलनाओं के आधार पर उन्होंने पाया कि उत्तर कोरिया के सात रॉकेट रूसी ‘स्कड’ रॉकेटों वाले परिवार के थे. ये रॉकेट, जो सैनिक प्रक्षेपास्त्र थे, सोवियत संघ वाले दिनों में बना करते थे. उत्तर कोरिया के तरल ईंधन वाले सभी रॉकेट सोवियत काल की यादगार हैं. पर, इसका यह मतलब नहीं कि राष्ट्रपति पुतिन के रूस ने उन्हें उत्तर कोरिया को दिया होगा. वे सोवियतकालीन यूक्रेन में बना करते थे और हो सकता है कि उनके कई हिस्से-पुर्जे अब भी वहां बनते हों. पश्चिमी देशों का चहेता यूक्रेन 2013 से गृहयुद्ध ग्रस्त और धन की कमी से त्रस्त है. यदि वह चोरी-छिपे इन हिस्तों-पुर्जों का उत्तर कोरिया को भी निर्यात करता हो, तो यह कोई अनहोनी बात नहीं कही जायेगी. वह रूसी मॉडल वाले टैंक पाकिस्तान को भी बेचा करता था.

ठोस ईंधन वाले रॉकेट चीनी मॉडलों जैसे

प्रो. शूमाकर का कहना है कि इस साल के वसंतकाल में उत्तर कोरिया ने जिस रॉकेट का कथित परीक्षण किया, उसे इतनी जल्दबाज़ी में किया कि उसके त्रुटिपूर्ण प्रक्षेपण के बाद उसके रास्ते में सुधार की कोई गुंजाइश ही नहीं रही. पिछले कुछ ही वर्षों में उसने तरल ईंधन-चालित सात नए मॉडल ज़रूर दागे, पर सभी के इंजन कही बाहर से ही मंगाये होंगे. प्रो. शूमाकर का यह भी कहना है कि तरल ईंधन-चालित उत्तर कोरियाई रॉकेट या प्रक्षेपास्त्र यदि सोवियत काल की याद दिलाते हैं, तो ठोस ईंधन वाले मॉडल पूरी तरह चीनी मॉडलों की नकल लगते हैं. यह समानता ‘ग़जब की है,’

प्रो. शूमाकर के अनुसार, उत्तर कोरिया ने ठोस ईंधन-चालित अपना पहला रॉकेट तीन साल पहले दिखाया था. वह लगभग अचानक रातोंरात दिखाई पड़ा था, जबकि उत्तर कोरिया में ऐसा कोई संयंत्र तक नहीं था जो रॉकेट के लिए ठोस ईंधन बना सकता. वे यह नहीं कहते कि रूसी या चीनी सरकार ने ठोस ईंधन वाले रॉकेट उत्तर कोरिया को दिये होंगे. पर, इशारा साफ़ है कि रूस तीन साल पहले चीनी मॉडल वाले रॉकेट किसी को भला क्यों और कैसे देता, जबकि उसके पास अपने ही मॉडलों की कोई कमी नहीं है. वह अपने माल के बदले अपने प्रतिद्वंद्वी का माल क्यों बेचेगा?

उत्तर कोरिया के सिर पर चीन का वरदहस्त!

कहने की आवश्यकता नहीं कि उत्तर कोरिया के सिर पर दोगले चीन का वरदहस्त है! भारत का यह पाखंडी पड़ोसी अब भी भोलेपन का ऐसा स्वांग भर रहा है कि सारा पश्चिमी जगत उत्तर कोरिया के विरुद्ध उसके कथित ‘कोयला आयात प्रतिबंध’ पर मुग्ध हो गया है. डोनाल्ड ट्रंप चाहे जितने सिरफिरे हों, उत्तर कोरिया के प्रश्न पर चीन को आड़े हाथों लेने का साहस अकेले वही दिखा रहे हैं. इस कारण भी वाकयुद्ध तो चलता रहेगा, पर सशस्त्र युद्ध की संभावना नहीं के बराबर ही मानी जा रही है.

उत्तर कोरिया भी यह नहीं कह रहा है कि वह अपनी भूमि से तीन हज़ार किलोमीटर दूर के अमेरिकी नौसैनिक अड्डे गुआम को अपने रॉकेटों का सीधा निशाना बनायेगा. बल्कि यह कह रहा है कि उसके रॉकेट 30-40 किलोमीटर पहले ही समुद्र में जा गिरेंगे. समुद्र में वह रॉकेट गिराता रहे, अमेरिका का इससे क्या बिगड़ेगा! तब भी अमेरिका को यदि उत्तर कोरिया के होश ठिकाने लगाना है, तो पहले चीन के कान ऐंठने होंगे.

भारत के लिए भी खतरे की घंटी

भारत को भी सावधान रहना होगा कि कहीं ऐसा न हो कि उत्तर कोरिया और अमेरिका के बीच शक्ति-परीक्षण की आड़ में चीन, 1962 की तरह एक बार फिर भारत को ‘सबक सिखाने’ की कोशिश करे. 1962 में चीन ने भारत पर ठीक उन्हीं दिनों आक्रमण किया था जब सारी दुनिया का ध्यान ‘क्यूबा संकट’ के कारण पूरी तरह अमेरिका और सोवियत संघ के बीच तनातनी की पराकाष्ठा पर केंद्रित था. क्यूबा संकट ठीक 10 दिन चला था. भारत पर चीनी आक्रमण भी ठीक उन्हीं 10 दिनों तक चला था. जिस दिन क्यूबा संकट का अंत हुआ, उसी दिन चीन ने भी भारत से अपने सैनिक हटा लिये थे. शेष दुनिया ने उस समय नोट ही नहीं किया कि चीन क्यूबा संकट की आड़ में भारत पर पिल पड़ा था. इस समय भी चीन डोकलाम में वह भारत को ठीक उसी समय से डरा-धमका रहा है, जब से अत्तर कोरिया और अमेरिका के बीच ठनी हुई है.