शिव विश्वनाथन ने हाल ही में दिल्ली में नेमिचन्द्र स्मृति व्याख्यान देते हुए मार्क्सवाद को बड़े दुलार से याद किया. अरसा बाद किसी सार्वजनिक मंच पर रचनात्मक संभावना और ऊर्जा के स्रोत के रूप में मार्क्सवाद की चर्चा की गई.

नेमिजी को याद करते हुए मार्क्सवाद की चर्चा स्वाभाविक ही है. आखिर हिंदी के सबसे दुर्द्धर्ष माने जाने कवि मुक्तिबोध के मार्क्सवाद के शिक्षक वही थे. 30 अक्टूबर, 1945 के अपने पत्र में मुक्तिबोध उन्हें याद दिलाते हैं, ‘याद हैं, आपकी बड़ी जिम्मेदारी है. आपने एक व्यक्ति के साथ नाजुक खेल खेला है. उसे कम्युनिस्ट बनाया, दुर्द्धर्ष घृणा के ताप से पीड़ित. और उसकी स्त्री के प्रति उसका रुख पलटा. अधिक सहनशील, भावनामय बनाया उसे. यह काम बहुत बड़ा ही नहीं, नाजुक भी है.’

मार्क्सवाद की किसी भी चर्चा में संघर्ष, क्रांति, वर्ग घृणा, रणनीति, टैक्टिक्स जैसे शब्दों का आना तो आम है. लेकिन इस अंश में नाजुक, सहनशील, भावनामय शब्दों पर भी ध्यान जाता है. साथ ही उस वाक्य पर जिसके मुताबिक़ मार्क्सवादी होने का एक अर्थ स्त्री के प्रति रवैय्ये में तब्दीली भी है.

हिंदी की स्मृति में मुक्तिबोध मार्क्सवादी रहे लेकिन नेमिजी के मार्क्सवादी रूप को भुला दिया गया. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के पूरावक्ती सदस्य रह चुके नेमिचंद्र जैन का संबंध पार्टी से शिथिल हो गया क्योंकि वे उसके सदस्य नहीं रह गए लेकिन उनका मार्क्सवाद से रिश्ता बना रहा था. उनके जीवन के उत्तरार्द्ध में ही उनके संपर्क में आ सका. उसके बाद भी यह देख पाना कुछ देर में ही संभव हुआ कि मद्धम आवाज़ और धीर गति वाले नेमिजी और उनकी संगिनी रेखाजी का पूंजीवादी अर्थव्यवस्था से ही नहीं, उसके जीवन मूल्यों से रिश्ता अस्वीकार का ही था. यही नहीं, वे उसे पलट देने वाले किसी भी संघर्ष की सूचना को अत्यंत ही आशा से भी देखते थे.

खुद को नेमिजी ने अपनी पत्रिका ‘नटरंग’ में रमा लिया था. लेकिन संगठन के पक्ष से उनका ध्यान हटा न था. आखिर वे भारतीय जननाट्य संघ(इप्टा) के शुरुआती दौर के संगठनकर्ता थे. वह आसान वक्त न था. उस पर भी रेखाजी और वे इप्टा के सेंट्रल ट्रूप के सदस्य थे. साहित्य, नाटक, रंगमंच, संगीत और कला के भारतीय दिग्गजों में शायद ही कोई हो जो उस वक्त की इप्टा से न जुड़ा हो. वैसी प्रतिभाओं का साथ निभाने और उनका नेतृत्व करने के लिए असाधारण प्रतिभा चाहिए थी.

यह कहा जा सकता है कि स्वाधीनता पूर्व भारत और नवस्वाधीन भारत की सांस्कृतिक संवेदना को गढ़ने और संवारने का काम मार्क्सवाद ने नेमिजी सरीखे लोगों और उनकी संस्थागत स्फूर्ति के माध्यम से ही किया. भारतीय संस्कृति का नाम जाप करने की जगह उसके स्रोत की खोज में लोक तक पहुंचना और फिर वहीं से लय, धुन, भंगिमा, मुद्रा लेकर जन संस्कृति के सृजन का अभियान करना, यह इप्टा की और उससे जुड़े कलाकारों की विशेषता थी.

भारतीय लोक, श्रमशील किसान इस अभियान का लक्ष्य या भोक्ता मात्र न थे, वे उसकी गंगोत्री थे. आप बांग्ला, अहमिया, तेलुगू, मलयालम, हिंदी, किसी भी भाषा के तत्कालीन नाटकों और गानों को याद करें, सबकी आतंरिक लय लोक से निर्मित है. कह सकते हैं कि भारतीय मार्क्सवादी विचार के प्राण उसकी गहन सांस्कृतिक चिंता है और उसकी रीढ़ लोक संस्कृति है. अगर आप इप्टा के पुराने गीतों को सुनें तो उनमें उत्ताप है उल्लास का. संघर्ष में भी साथ का उत्साह है. उनको सुनते हुए आपके मन में घृणा और हिंसा का भाव जगना संभव नहीं है.

जैसा शिव विश्वनाथन ने कहा, यह मार्क्सवाद क्रीड़ात्मक अधिक लगता है, राजनीतिक कम. शिव के लिए वह वास्तविक संघर्ष और क्रांति के मुकाबले उनकी अंतहीन चर्चाओं के चलते अधिक आकर्षक था - भारतीय राज्य का चरित्र क्या है और क्रांति की पद्धति क्या होगी? लेनिन और त्रात्स्की, स्टालिन या बुखारिन? सशस्त्र क्रांति या संसदीय संशोधनवाद? सोवियत पथ या चाइना लाइन?

एक तरह से मार्क्सवादी किसी भी दूसरी राजनीतिक विचारधारा वालों के मुकाबले कही अधिक गप्पी थे. इससे वे भले ही नाराज़ हो जाएं, लेकिन शिव मार्क्सवादियों को उनकी इस गपबाजी के लिए ही अधिक कीमती मानते हैं.

गप के लिए हर कस्बे, शहर, यहां तक की गांवों में भी अड्डे बनते रहते थे. आप कामरेडों से यहां मिल सकते थे. मिलना तो आसान था लेकिन उनकी सोहबत के लिए तो आपको कुछ योग्यताएं अर्जित करनी होती थीं - ‘एक कदम आगे, दो कदम पीछे’, ‘साम्राज्यवाद, पूंजीवाद की सर्वोच्च अवस्था’, ‘वामपंथी भटकाव एक बचकाना मर्ज’, क्या बहस में आप इनका सही जगह पर इस्तेमाल करना जानते हैं? क्या आपको टैक्टिक्स और स्ट्रेटेजी का फर्क मालूम है? क्या आपको मालूम है कि संशोधन और संशोधनवाद की ध्वनि में काफी अंतर है? क्या आपको पार्टी में टू लाइन स्ट्रगल के बारे में कुछ भी पता है? माओ और लिन बियाओ लाइन में क्या फर्क है? मार्क्सवादी साक्षरता और कामरेडों की सोहबत प्राप्त करना टेढ़ी खीर थी.

इसीलिए मार्क्सवादी अगर खुद को सतह से एक इंच ऊपर समझते थे तो कोई आश्चर्य नहीं. मार्क्सवादी होने का मतलब था पढ़ा लिखा होना. गांव-जबार में मार्क्सवादियों को उनकी कबीर बानी के चलते भी ज़रा संभ्रम से देखा जाता था. और जनता के लिए संघर्ष करने वालों की भी नाक ज़रा ऊंची हुआ करती थी.

मार्क्सवाद का अर्थ जितना इन नातमाम बहसों से खुलता है, उतना पार्टी प्रोग्रामों से नहीं. इन बहसों की उत्तेजना से मार्क्सवादियों का वजूद हमेशा ही थरथराता रहता था.

शिव ने ठीक कहा कि मार्क्सवाद को सोवियत संघ से छपकर आने वाली किताबों और पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस के बिना याद करना असंभव है. अनेकानेक बचपन इन चिकने कागज़ों पर खूबसूरत चित्रों और सावधान छपाई वाली किताबों से गढ़े गए. किताबें, सुंदर किताबें जिन्हें पढ़ना नहीं देखना और छूना भी तजुर्बा था. आपके पास अठन्नी हो तो भी आप एकाध किताब तो खरीद ही सकते थे.

इससे बड़ा सांस्कृतिक जनतंत्र और भला क्या हो सकता था या है? लेकिन क्या हमारे आज के पार्टी मार्क्सवादी, मार्क्सवाद की इस सांस्कृतिक जनतांत्रिक व्याख्या से संतुष्ट होंगे?