बीसवीं सदी के हिंदुस्तान के शायरों और अफ्सानागारों की लिस्ट में एक से एक नाम आते हैं : सरदार जाफरी, कैफ़ी आज़मी, फैज़ अहमद फैज़, मज़ाज, शकील बदायूंनी, कृशन चंदर, राजिंदर सिंह बेदी, भीष्म साहनी. इन सबमें एक नाम है जिसकी शायरी का मयार माने दायरा इन सबसे कहीं ज़्यादा बड़ा है. वह नाम है- जांनिसार अख्तर. वालिद मुज़्तर खैराबदी और उनके भी वालिद मौलाना फ़ज़ले हक़ खैराबदी. ये वही फ़ज़ले हक़ खैराबदी हैं जिन्होंने ग़ालिब का दीवान, खुद ग़ालिब के कहने पर संकलित किया था.

जांनिसार अख्तर की जिंदगी ग्वालियर से शुरू होती है और फिर भोपाल और मुंबई जाकर आज के दिन ख़त्म होती है. इस सफ़र के दौरान उन्होंने वे पड़ाव तय किये हैं जो उन्हें इस खानदान का वारिस होने का हक़ दिलाते हैं.

जांनिसार अख्तर देश के शायद सबसे पहले उर्दू के गोल्ड मेडलिस्ट होंगे. उन्होंने अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से एमए किया था. हिन्दुस्तान के बंटवारे से पहले ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज में उन्हें उर्दू पढ़ाने का काम मिला. दंगों की वजह से वे भोपाल चले आये और वहां सैफिया कॉलेज में उर्दू विभाग में लग गए.

हालांकि नौकरी रास नहीं आई और जांनिसार मुंबई चले गए. अपनी बीवी साफ़िया अख्तर, बच्चे जावेद अख्तर और सलमान अख्तर को खुदा के हवाले छोड़कर धक्के खाने.

खैर, कहानी बहुत लंबी है और ज़बरदस्त भी, और ज़बरदस्त ही हैं उनके कलाम जो कई शानदार ग़ज़लों, नज्मों औप रुबाइयों में सिमटे हुए हैं.

जांनिसार के कलामों का दायरा

बात पहले फिल्मों से. ‘रज़िया सुल्तान’ फिल्म का गाना आपको याद है? लता मंगेशकर की आवाज़ में ‘ऐ दिले नादां, आरज़ू क्या है, जुस्तजू क्या है’ इसी गाने से आपको जांनिसार अख्तर की शायरी का फ़ैलाव समझ आ जाता है.

पचास से साठ के दशक की कई फिल्में जैसे सीआईडी का गाना ‘आंखों ही आंखों में इशारा हो गया’ या फिर ‘प्रेम परबत’ का वह गीत ‘ये दिल और उनकी निगाहों के साये’. मशहूर फिल्म ‘नूरी’ का गीत ‘आजा रे ओ मेरे दिलबर आजा’ के लिए उन्हें फिल्म फेयर अवार्ड भी मिला.

फिल्मों से ज़्यादा उनकी शायरी मशहूर हुई.

अशआर मेरे यूं तो ज़माने के लिए हैं

कुछ शेर फ़कत उनको सुनाने के लिए हैं

या फिर

जब ज़ख्म लगे तो क़ातिल को दुआ दी जाए

है यही रस्म तो ये रस्म उठा दी जाए.

हम से पूछो कि ग़ज़ल क्या है ग़ज़ल का फन क्या

चंद लफ़्ज़ों में कोई आग छुपा दी जाए

बकौल निदा फ़ाज़ली ‘जांनिसार अख्तर ने शायरी को पारंपरिक रूमानी दायरे से बाहर निकालकर यथार्थ की खुरदरी धरती पर लाकर खड़ा कर दिया.’

दरअसल, जांनिसार अख्तर नर्म लबो-लहजे के पुख्ता शायर थे. अपनी पत्नी साफ़िया अख्तर की मौत पर लिखी हुई नज़्म ‘ख़ाके दिल’ आज कल्ट का दर्ज़ा रखती है . उनकी एक और नज़्म ‘आख़िरी मुलाकात’ मैं जब वे कहते हैं:

मत रोको इन्हें मेरे पास आने दो

ये मुझ से मिलने आये हैं

मैं खुद न जिन्हें पहचान सकूं

कुछ इतने धुंधले साए हैं

तो उनके उन दिनों का तारूफ़ मिल जाता है जब वे गुमनामी में चले गए थे. जब गुमनामी से बाहर निकले तो इन्ही नज्मों ने उन्हें साहित्य अकादमी सम्मान दिलवाया. कुछ और उनके कलाम जैसे ‘नज़रे बुतां’, ‘जाविदां’, ‘पिछली पहर’, ‘घर आंगन’ सब इसी कतार में नज़र आते हैं.

ये उनकी रोशन ख़याली ही थी कि तब प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने उन्हें पिछले तीन सौ सालों की हिन्दुस्तानी शायरी को एक जगह पर इकट्ठा करने का काम दिया. बाद में इंदिरा गांधी ने इसे ‘हिंदुस्तान हमारा’ के नाम से रिलीज़ किया.

निदा फ़ाज़ली ने जांनिसार पर एक किताब लिखी है - ‘एक जवान की मौत’. इसमें उन्होंने जांनिसार की जिंदगी का पूरा ख़ाका खींचा है. निदा फाजली की उनसे पहली मुलाकात जांनिसार और साहिर लुधियानवी के रिश्तों को हमारे सामने रख देती है.

जांनिसार और साहिर लुधियानवी का रिश्ता

साहिर लुधियानवी और जांनिसार के बीच प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन वाली दोस्ती थी जो शायद बाद में तिजारती मजबूरी बनी. जांनिसार अख्तर ने एक फिल्म बनायीं थी जिसका नाम था ‘बहू बेग़म’ इस फिल्म के गाने उन्होंने साहिर लुधियानवी से लिखवाए थे. फिल्म नहीं चली पर गाने हिट हुए. नतीजा, अख्तर साहब इंडस्ट्री से आउट हो गए. अब वे पूरी तरह से साहिर तक सिमट के रह गए.

निदा फ़ाज़ली लिखते हैं, ‘एक बार किसी दोस्त के साथ साहिर लुधियानवी के दरबार में जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ तो कई नामी गिरामी लोगों के साथ, सोफ़े के कोने में सिमटे-सिकुड़े अख्तर साहब भी दिखाई दिए. बहुत सारे अख्तर एक जगह, एक रूप में नज़र आये तो अजीब सा लगा. कहीं कुछ खो जाने का अहसास हुआ. अपने आप में खोये हुए खामोश, आंखों का दायरा सिर्फ हाथ और मेज़ पर रखे शराब के गिलास की दूरी तक सीमित...मुझसे परिचय हुआ तो मुझे भी वे बिना शब्दों की मुस्कान थमा कर , पहले की तरह अपना जिस्म सोफ़े पर छोड़ कर कहीं और ग़ायब हो गए.’

साहिर साहब को महफ़िलें जमाने और उनमें ‘वाह साहिर वाह’ सुनने का शौक था. जांनिसार ‘बहू बेग़म’ के बाद एक तरह से बेरोजगार हो गए थे इस दौरान साहिर ही ने उनका हाथ थामा, दोस्ती के नाते नहीं, शायद किसी और नाते.

निदा फ़ाज़ली बताते हैं कि जांनिसार अख्तर सिर्फ उनके दोस्त ही नहीं ज़रूरत से ज़्यादा जल्दी शेर लिखने वाले शायर भी थे. साहिर को एक पंक्ति सोचने में जितना समय लगता था, जांनिसार उतने समय में पच्चीस पंक्तियां जोड़ लेते थे. बकौल निदा फाज़ली ‘एक तरफ़ ज़रूरत थी, दूसरी और दौलत.’

तो क्या मान लिया जाए कि वे कलाम जिनमें साहिर की बू नहीं आती , जांनिसार अख्तर ने लिखे हैं? हो सकता है. अगर उनका यह इशारा है तो फिर यकीन कर लेना चाहिए: शायरी तुझको गंवाया है बहुत दिन हमने.

जांनिसार के बेटे और जावेद अख्तर के छोटे भाई सलमान अख्तर एक किस्से को याद करके बताते हैं कि एक बार किसी खास महफ़िल में बेग़म अख्तर कुछ कलाम सुना रही थीं. ये कोई बीस-पच्चीस लोगों की महफ़िल थी. तभी अचानक उन्होंने देखा कि जांनिसार भी उस महफ़िल में चले आये हैं. बेग़म अख्तर ने सिर्फ दो ग़ज़लें ही गाई थीं कि उन्होंने मेज़बान से थोड़ी देर के लिए विराम की मोहलत मांगी. जब मेज़बान को समझ नहीं आया कि क्यूं इतनी जल्दी वे विराम की बात कह रही हैं तो उन्होंने चुपके से उन्हें कहा कि इस महफ़िल में जांनिसार भी आये हैं ओर मैं उनका कोई कलाम नहीं सुना रही हूं. बेहतर होगा कि अगर उनके पास कोई जांनिसार के कलामों की किताब हो तो वे किसी कमरे में जाकर पढ़ लेंगी और याद करके महफ़िल में सुना देंगी.

मेज़बान जांनिसार से शनासा (परिचित) थी, उनके पास जांनिसार की कई किताबें थी तो उन्होंने जांनिसार से जाकर ही पूछा कि वो कौन सा कलाम बेग़म अख्तर की आवाज़ में सुनना चाहेंगे. जांनिसार ने कहा कि अगर बेग़म अख्तर को इतना भरोसा है कि वे चंद ही मिनटों में कोई कलाम याद करके धुन बना लेंगी, तो वे एक नयी ग़ज़ल लिख देते हैं. वे ऊपर गए और महज़ तीन मिनट में एक ग़ज़ल लिख कर छोड़ आये. बेग़म अख्तर ने उसे पढ़ा, याद किया और धुन बना ली. वह कलाम था:

सुबह के दर्द को, रातों की जलन को भूलें,

किसके घर जाये कि उस वादा शिकन को भूलें.

वापस बात पर आते हैं. कहते हैं कि साहिर लुधियानवी जांनिसार को अपना दरबारी बना रहने के लिए हर महीने एक तय शुदा रकम देते थे और इसके बदले जांनिसार हमेशा ‘हां साहिर’ कहते थे.

बाद इसके फिर कुछ यूं हुआ कि ये दोस्ती किसी बात पर टूट गयी. साहिर लुधियानवी अपने ‘रंग’ में आ गए, जांनिसार, खानदानी आदमी थे, तू-तड़ाक न सुन पाए, दोस्ती टूट गयी.

साफिया अख्तर और जांनिसार अख्तर

साफ़िया अख्तर और जांनिसार अख्तर का निकाह 1943 में हुआ था. साफ़िया मशहूर शायर मजाज़ की बहन थी. बेहद नफीस, पढ़ी लिखी-औरत थीं साफ़िया जिन्होंने जांनिसार के लिए काफ़ी दुःख उठाये पर कभी कहा नहीं.

जांनिसार भोपाल की अच्छी खासी नौकरी छोड़कर मुंबई चले आये थे. साफ़िया बच्चों को भी संभालतीं और नौकरी भी करतीं. जांनिसार का मुंबई का ख़र्च भी वे ही उठातीं. दोनों का रिश्ता तकरीबन नौ साल चला. साफ़िया कैंसर से मर गईं. उन नौ सालों में दोनों लगभग एक दूसरे से दूर ही रहे. साफ़िया जांनिसार को कामरेड कहकर बुलाती थी. साफ़िया के जांनिसार को लिखे ख़तों से मालूम होता है कि उन्हें जांनिसार से कितनी मुहब्बत थी और वे जांनिसार से मिलने के लिए कितना तडपती थीं.

चंद ख़तों के मज़मून पेश हैं

तारीख 21, जनवरी 1951

कामरेड,

तुम्हारा ख़त मेरे हाथ में है...मुहब्बत को अदावत से न मिलाओ. तुम जानते हो ये मेरी ख्वाहिश थी कि में तुम्हारे साथ रहूं...मुझे हमेशा अपने इन दुःख भरी राहों में अपने साथ रखो मेरे लबों पर हमेशा मुस्कराहट रहेगी. मुझे आजकल हल्का सा बुखार रहने लगा है. तुम फ़िक्र न करना मैं किसी हकीम से दवा ले लूंगी...

तुम्हारी सफ्फो

शायद यहां उन्हें कैंसर ने घेर लिया था.

आख़िरी ख़त उन्होंने 29 दिसम्बर 1952 को लिखा जब वे मर रही थीं...

मेरे प्यारे अख्तर, मेरी ज़िन्दगी

तुम्हारी नज़्म मिली. मेरे लिए सबसे बड़ा तोहफा है, यकीन मानो...अख्तर मेरे पास आओ, मुझे मरने मत दो, मैं मरना नहीं चाहती. मुझे तुम्हारी बाहों में सोने दो...मैं शायद ठीक हो जाऊं और फिर तुम्हारे इन रास्तों पर चल सकूं.

तुम्हारी अपनी

सफ्फो.

इस ख़त के चंद दिनों बाद साफ़िया इस दुनिया से रुखसत हो गईं. सोचकर अफ़सोस होता है कि जांनिसार इतने बेरुखे हो गए थे. उन्हें मालूम था कि साफ़िया नहीं बचेंगी तो कुछ दिन क्या उनके साथ भोपाल में रहकर गुज़ार नहीं सकते थे?

हो भी सकता है कि वे साफ़िया से मुहब्बत करते रहे हों पर ज़ाहिर न कर पाये हों. साफ़िया की मज़ार के किनारे बैठकर उन्होंने एक नज़्म लिखी है: ‘खामोश आवाज़’

कितने दिन में आये हो साथी

मेरे सोते भाग्य जगाने

मुझसे अलग इस एक बरस में

क्या क्या बीती तुम पे न जाने

चुप हो क्या, क्या सोच रहे हो

आओ सब कुछ आज भुला दो

आओ अपने प्यार से साथी

फिर से मुझे इक बार जिला दो

तुमको मेरा ग़म है साथी

कैसे अब इस ग़म को भुलाऊं

अपना खोया जीवन बोलो

आज कहां से ढूंढ के लाऊं...

जो भी है, इस रिश्ते में सफ़िया ने ज़्यादा दर्द झेला और शायद यही जावेद अख्तर और जांनिसार के रिश्तों की कडवाहट का कारण बनी.

जांनिसार अख्तर और जावेद अख्तर की तल्खी

अपनी किताब ‘तरकश’ में जावेद अख्तर ने कुछ यूं लिखा है, ‘18 अगस्त 1976 को मेरे बाप( जांनिसार अख्तर) की मृत्यु होती है (मरने से नौ दिन पहले उन्होंने मुझे अपनी आख़िरी किताब ऑटोग्राफ करके दी थी, उस पर लिखा था-‘जब हम न रहेंगे तो बहुत याद करोगे.’ उन्होंने ठीक लिखा था .अब तक तो मैं अपने आप को एक बाग़ी और नारा बेटे के रूप में पहचानता था मगर अब मैं कौन हूं...शायरी से मेरा रिश्ता पैदाइशी और दिलचस्पी हमेशा से है. चाहूं तो कर सकता हूं. मगर आज तक की नहीं है. ये भी मेरी नाराज़गी और बग़ावत का प्रतीक है. 1979 में पही बार शे’र कहता हूं और ये शे’र लिखकर मैंने अपनी विरासत और बाप से सुलह कर ली है.

जावेद की जांनिसार से बग़ावत इसलिए थी कि जांनिसार ने उनकी मां और उनका और सलमान अख्तर का ख्याल नहीं रखा. साफ़िया बेवक्त ही इस दुनिया से रुखसत हो गयी थीं, जावेद और सलमान कभी अपनी खाला, कभी नानी के गहर पर अजनबियों की तरह ही रहे.

जब जावेद अख्तर मुंबई आये तो महज़ पांच या छ दिन ही जांनिसार अख्तर के घर पर रहे. सौतेली मां से नहीं बनी.अपनी ग़ुरबत(ग़रीबी), रिश्तेदारों के ताने, मां की मौत इन सबके लिए उन्होंने जांनिसार को ही मुजरिम माना. तभी तो जावेद के एक शे’र में लिखते है:

तल्खियां क्यूं न हो अशआर में, हम पर जो गुजरी हमें है याद सब.

नसरीन मुन्नी कबीर की किताब ‘सिनेमा के बारे में’ में जावेद इस पर खुलकर बात करते हैं. वे कहते हैं, ‘मेरी और मेरे वालिद यानी जांनिसार अख्तर की ये जंग खुल्लम-खुल्ला थी. और ये तब शुरू हुई जब मैं पंद्रह बरस का था.उनके घर से निकल जाने बाद मैं अपने दोस्त के घर पर रहा उन्हें ये नहीं मालूम था की मैं कहां हूं...हम पहले तो अपने वालिद की एक हीरो की तरह इबादत करते थे, लेकिन जब हमारी वालिदा गुज़र गईं और हम आने रिश्तेदारों के साथ रहने लगे तो मुझे ज़रूर अपने वालिद का सुलूक काफ़ी खटकने लगा था...और मेरा रवैया ‘भाड़ में जाए’ वाला हो गया था.’

कहा नहीं जा सकता कि क्या सलमान अख्तर भी इतने ही तल्ख़ रहे होंगे. कुछ एक इंटरव्यू जो उन्होंने दिए हैं उनमें ये कडवाहट नज़र नहीं आती. इसलिए बात को यही ख़त्म कर सकते हैं.

आप ये सोच रहे होंगे कि क्यूं निदा फाजली ने जांनिसार पर लिखी किताब का उन्वान ‘एक जवान मौत’ रखा. तो बात यह है साहब, जांनिसार को जवान लोगों की सोहबत रास आती थी. उन्होंने लिखा भी:

फिक्रो फन की सजी है नयी अंजुमन

हम भी बैठे हैं कुछ नौजवानों के बीच.

वे अक्सर कहा करते की आदमी ज़ेहन से बूढा होता है. या फिर यह संभव है कि इतने साल गुमनामी में रहना, बेटे की बेरुखी, साफ़िया से इंसाफ न कर पाने की ज़िल्लत ने उन्हें एक तरह से बाग़ी बना दिया था.

हमेशा नर्म मिज़ाज वाले जांनिसार बाद के दिनों में बेधड़क शराबनोशी में डूब कर कुछ कडवे हो गए थे.हमेशा महफिलें, हमेशा दाद पाने की चाहत, हमेशा कुछ आइनों के सामने होने की ख्वाहिश और हमेशा ‘हां जांनिसार’ सुनने की चाह. कुछ वैसे ही जैसे साहिर लुधियानवी.

निदा फ़ाज़ली लिखते हैं, ‘जांनिसार आख़िरी दम तक जवान रहे. बुढ़ापे में जवानी का यह जोश उर्दू इतिहास में एक चमत्कार है जो उनकी याद को शेरो-अदब की की महफ़िल में हमेशा जवान रखेगा.