स्पीकिंग टाइगर्स द्वारा प्रकाशित और मेरे द्वारा संपादित अंग्रेज़ी संचयन ‘इण्डिया डिसेण्ट्स’ पर इण्डिया इण्टरनेशनल सेण्टर ने एक परिचर्चा आयोजित की. इसमें अंग्रेज़ी कवि-आलोचक केकी दारूवाला, अंग्रेज़ी लेखिका और संपादिका गीता हरिहरन, पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन, साहित्यकार पुरुषोत्तम अग्रवाल और विदुषी माधवी मेनन ने भाग लिया. मंझोले क़िस्म के सभागार में सभी सीटें भर गईं जिनमें दिल्ली के कई बुद्धिजीवी और लेखक-मित्र श्रोताओं में थे और लगभग दो घण्टे रहे. सभी वक्ताओं ने पुस्तक के सामयिक, समावेशी, प्रासंगिक होने का जिक्र किया और एकाधिक ने उसे असहमतों की बाइबिल तक कह डाला.

असहमति पर जो चर्चा हुई वह बहुत व्यापक थी और उसे दबाने या अमान्य करने की जो संगठित मुहिम चल रही है और जो हमारे बौद्धिक-नैतिक-लोकतांत्रिक जीवन के लिए बड़ा खतरा बन कर उभर रही है उस पर गहरी चिन्ता व्यक्त हुई. असहमति को लेकर राज्य, राजनैतिक दलों और मीडिया की आक्रामकता का विशद विश्लेषण करते हुए यह कहा गया कि सिर्फ़ असहमति तक रह जाना और किसी तरह के सामाजिक कर्म में उसे परिणत न करना एक सुरक्षित उपाय हो सकता है और ऐसी अकर्मकता असहमति को कुन्द या भोंथरा कर सकती है. प्रश्नवाचकता और असहमति के परिवेश को ख़त्म करने के लिए शैक्षणिक और सांस्कृतिक संस्थानों पर जो हमले हो रहे हैं और जिस तरह से उन्हें क़द और सार्थकता में अवमूल्यित किया जा रहा है इसकी निन्दा भी की गयी. स्वयं अहसहमतों के बीच भी असहमति है ओर उन्हें एक ही तरह की प्रवृत्ति में सामान्यीकृत करना उचित नहीं है. असहमति को अपने केंद्र में आने की आकांक्षा नहीं पालना चाहिए क्योंकि ऐसी आकांक्षा उसे विकृत कर सकती है: असहमति दृश्य पर सक्रिय रहे तो, पर हाशिये पर ही रहकर. उसे विफल होने के लिए तैयार ही नहीं होना चाहिये बल्कि उसे विफलता अपनी अनिवार्य नियति मानना चाहिये.

इस बात का भी उल्लेख हुआ कि असहमति को लेकर विभिन्न राजनैतिक दलों का रिकार्ड कमोबश एक जैसा है, भले आज उसके प्रति असहिष्णुता बहुत व्यापक और उग्र हो गयी है सत्तारूढ़ दल की कुन्दज़हनी के कारण. कम से कम हमारे यहां सत्ता के साथ कुछ दुर्गुण अनिवार्य रूप से जुड़ गए हैं: सत्ताधारी प्रायः भ्रष्ट होते हैं और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते हैं, दूसरों के प्रति आदर-सम्मान और उनकी बात को महत्व देना कम होता जाता है; अपने को हर हालत में ठीक मानने का अहंकार बढ़ता जाता है और लोकाभिमुख होने के बजाय सत्ता तन्त्राभिमुख होती जाती है. लोकतंत्र के बुनियादी मूल्यों का सबसे उत्कट हनन वे करते हैं जो लोकतांत्रिक पद्धति और स्वतंत्रता से सत्ता अर्जित करते हैं. असहमत होने का अर्थ इन दुष्प्रवृत्तियों पर तीख़ी नज़र रखना भी है.

इन्दौर-उज्जैन में मुक्तिबोध

मध्य प्रदेश के मालवा अंचल से मुक्तिबोध का लम्बा और घनिष्ठ संबंध था, अपने आरंभिक जीवन में. उनकी जन्मशती पर उज्जैन के अभिनव रंगमण्डल ने इन्दौर और उज्जैन में दो आयोजन किये जिनमें पत्रकार-मित्र ओम थानवी के साथ भाग लेने का सुयोग हुआ. जब मैं मध्यप्रदेश में था तो उज्जैन में साहित्यिक अभिरुचि अधिक व्यापक थी और इन्दौर में कलात्मक: इस बार के अनुभव से लगा कि स्थिति उलट गयी है. उज्जैन में ठहरने आदि की सुविधाएं बहुत बढ़ गयी हैं पर रुचि कुछ सिमट गयी है जबकि मध्यप्रदेश की वाणिज्य-राजधानी इन्दौर में साहित्य और रंगमंच में रुचि का विस्तार हो रहा है.

मुक्तिबोध की कुछ छवियां हिन्दी आलोचना में रूढ़ हो गयी हैं. उनके बरक़्स यह याद दिलाने की ज़रूरत है कि मुक्तिबोध का आग्रह सिर्फ़ सामाजिक यथार्थ पर नहीं था. उनका आग्रह इस यथार्थ में हमारी ज़िम्मेदारी और शिरकत को उजागर करने का भी था. वे हिन्दी के संभवतः सबसे बड़े आत्माभियोगी कवि थे और हैं. उन्होंने सामाजिकता में अन्तःकरण की अवधारणा को जोड़ा: उनकी कविता कई अर्थों में अन्तःकरण पर इसरार करनेवाली कविता है. वह जब लिखी गयी थी याने आज से पचास-पचपन बरस पहले तब भी अवां गार्द (नया विचार) थी और आज तक बनी हुई है. मुक्तिबोध ने साहित्य के दो स्थायी और लगभग कालजयी सरोकारों प्रेम और मृत्यु का बहुत कम अन्वेषण किया है और सामान्यतः इन दो सरोकारों से उलझे बिना कोई बड़ा कवि नहीं बन सकता. पर वे इनके बिना भी बड़े कवि हैं जो एक असाधारण, अभूतपूर्व उपलब्धि है.

मुक्तिबोध को अपनी कविता और आलोचना में अपने वैचारिक शत्रुओं से बहस करते देखा गया है. लेकिन वे अपने वैचारिक सहचरों से भी द्वन्द्व और संवाद की स्थिति में थे इस पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है. वे अगर अज्ञेय का विलोम थे तो वे नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल आदि का भी विलोम थे. उनकी कविता आत्मा की, दो अर्थों में, गुप्तचर है: पहले में वह आत्मा की ओर से सच्चाई की गुप्तचर है और दूसरी में वह सच्चाई की ओर से आत्मा और कविता की गुप्तचर है.

हर बार ऐसे आयोजनों में मुक्तिबोध की कविता की दुरूहता और असम्प्रेषणीयता को लेकर सवाल उठते हैं. उन्हें कठिन काव्य का प्रेत मानने-मनवाने की आलोचनात्मक रूढ़ि ही बन गयी है. स्वयं मुक्तिबोध को सम्प्रेषण की समस्या को लेकर परेशानी थी. पर जिस तरह की सच्चाई को वे अपनी कविता में चरितार्थ करना चाह रहे थे उसका कोई पूर्ववर्ती मॉडेल नहीं था: मुक्तिबोध का न कोई पूर्वज है, न ही वंशज. उन्होंने अभिव्यक्ति के ख़तरे असम्प्रेषणीयता की हद तक जाकर उठाये और इस मायने में भी वे अकेले हैं: उनके संघर्ष का अपार आदर करनेवाले भी किसी कवि ने कभी वैसा जाखिम नहीं उठाया. मुक्तिबोध जिस दुरुह सचाई से कविता में दो-चार हो रहे थे उसकी अभिव्यक्ति दुरुह ही हो सकती थी. उन्होंने उसे सरलीकृत करने की चेष्टा नहीं की और इसी ‘ईमान की भाफ़’ ने उनकी कविता को कठिन पर मूल्यवान, दुरुह लेकिन ईमानदार बनाया.

सतह से उठता आदमी

मुक्तिबोध को लेकर 1980 में बनायी गयी मणि कौल की फ़िल्म ‘सतह से उठता आदमी’ हालांकि कान फिल्म महोत्सव में विशेष खण्ड में आमंत्रित हुई थी, उसे हिन्दी के साहित्य-जगत् में स्वीकृति तक नहीं मिली, सराहना तो दूर. उसे ख़ारिज करनेवालों में निर्मल वर्मा से लेकर अधिकांश हिन्दी वामपन्थी लेखक शामिल थे. उसका जो पहला प्रदर्शन दिल्ली में 1980 में त्रिवेणी कला संगम में हुआ था उसके बाद प्रतिकूल प्रक्रिया की ऐसी उग्रता थी कि मणि के साथ शारीरिक सुलूक तक हो सकता था. निर्मल वर्मा जैसे फ़िल्मों के पारखी को यहां तक एतराज़ था कि सार्वजनिक धन से ऐसी अबूझ फ़िल्म कैसे बनवायी जा सकती है!

इसलिए यह दिलचस्प है कि अब जब मुक्तिबोध-शती चल रही है तब प्रतिष्ठित फिल्मविद् आशीष राज्याध्यक्ष ने अपने एक व्याख्यान में मणि कौल के सिनेमा और उनकी जगह पर बोलते हुए यह बताया कि मणि कौल के सिनेमा में अब इस फ़िल्म की केन्द्रीय जगह है और उनकी दो और फ़िल्में ‘माटी मानस’ और ‘सिद्धेश्वरी’ के साथ मिलकर एक बृहत्त्रयी मानी जाने लगी है. आशीष ने अपने व्याख्यान में मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ का विस्तार से ज़िक्र किया और उसके कृष्ण बलदेव वैद के उसके अंग्रेज़ी अनुवाद का भी. मुझे फिर याद आया कि हमारे कुछ वामपन्थी कवि उस समय यह मानने को तैयार ही नहीं थे कि वेद जैसा नीचट कलावादी, उसका अंग्रेज़ी पर कितना ही अधिकार हो, मुक्तिबोध की इस कालजयी कविता का अच्छा अनुवाद कर सकता है. उनकी यह धारणा बिना अनुवाद पढ़े बेहद उग्र और सरासर निराधार थी. अब उसी अनुवाद की मान्यता बढ़ रही है. संयोगवश वही एकमात्र उपलब्ध अनुवाद है.

किसी तरह की छुआछूत, फिर वह वैचारिक हो या धार्मिक, भावनात्मक हो या बौद्धिक, सांस्कृतिक हो या राजनैतिक, अंततः घातक होती है और उसके नाम पर जो अत्याचार होते हैं या दुर्व्याख्याएं वे आजकल तो रोज़ाना की घटनाएं हो गये हैं. उनका अथक दुहराव उन्हें लगभग सामाजिक आदत या व्यवहार बना रहा है और हो सकता है कि हम उनसे जो अन्याय हो रहा है उसे धीरे-धीरे अनदेखा करने की आदत भी डाल दें. जिस स्वतंत्रता के 70 वर्ष हम पूरे कर रहे हैं उसी में इस तरह तिल-तिल कर हम ही कटौती करते रहे हैं. इतना भर ज़रूर है कि ऐसे लोग हैं और होते रहेंगे जो सच्चाई को, उपेक्षित कलाकृतियों को, उनके मर्म और प्रासंगिकता को पहचानेंगे और यह पहचान हम तक पहुंचाते रहेंगे. उन्हें शायद इसका कोई एहसास न हो पर सही तो यह है कि ऐसी विलम्बित पहचान हमारी स्वतंत्रता में इज़ाफ़ा करती है, उसे संकीर्ण होने से बचाती है. सतह को कितना ही दबाया जाये उस सतह से आदमी ऊपर उठ ही आता है. हमारा यह सौभाग्य है कि हममें से कुछ यह देख पाते हैं. मुक्तिबोध और मणि कौल ने निश्चय ही अपने समय में यह देखा था.