देश के 44वें मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जेएस खेहर इसी हफ्ते रिटायर होने जा रहे हैं. आने वाली 26 अगस्त को उनके कार्यकाल का आखिरी दिन है. लिहाजा इसकी प्रबल संभावनाएं हैं कि उन तमाम मामलों में इसी हफ्ते फैसले सुनाए जा सकते हैं जिनकी सुनवाई जस्टिस खेहर की अध्यक्षता में हुई है. विशेष तौर से उन मामलों में, जिनमें सुनवाई पूरी होने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया गया है. सर्वोच्च न्यायालय में लंबित ऐसे ही मामलों में से तीन सबसे महत्वपूर्ण को देखते हैं:

तीन तलाक

बहुचर्चित तीन तलाक मामले की सुनवाई जस्टिस खेहर की अध्यक्षता में पांच जजों की एक संवैधानिक पीठ में हुई थी. इस पीठ में जस्टिस खेहर के अलावा जस्टिस कुरियन जोसेफ, जस्टिस आरएफ नरीमन, जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर शामिल थे. कई दिनों तक लगातार चली सुनवाई के बाद बीती 19 मई को इस पीठ ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था.

इस मामले की शुरुआत साल 2015 में हुई थी. उस साल 16 अक्टूबर के दिन सर्वोच्च न्यायालय ने जनहित याचिका पर सुनवाई करते ऐसे तमाम मामलों को एक ही पीठ के हवाले करने का फैसला किया था जिनमें मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की बात कही गई थी. इनमें से सबसे चर्चित मामला शायरा बानो नाम की एक तलाकशुदा महिला का था. उन्होंने तीन तलाक के साथ ही मुस्लिम समुदाय में प्रचलित ‘निकाह हलाला’ और बहुविवाह जैसी प्रथाओं को भी चुनौती दी थी. इस मामले की सुनवाई आगे बढ़ने पर संवैधानिक पीठ ने तय किया फिलहाल न्यायालय सिर्फ तीन तलाक की संवैधानिकता पर ही विचार करेगा.

कई जानकार मानते हैं कि तीन तलाक इस्लामिक कानून के हिसाब से भी तलाक का सही तरीका नहीं है. इस तर्क को इसलिए भी वजन मिलता है क्योंकि पाकिस्तान समेत कई इस्लामिक देशों में भी तीन तलाक की व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया है. सर्वोच्च न्यायालय का इस मामले की सुनवाई के दौरान जो रुख रहा है, उसे देखते हुए कई जानकार मान रहे हैं कि न्यायालय याचिकाकर्ता महिलाओं के पक्ष में फैसला सुना सकता है और तीन तलाक को असंवैधानिक करार दे सकता है. अपना फैसला सर्वोच्च न्यायालय लगभग तीन महीने पहले ही सुरक्षित कर चुका है और उम्मीद है कि इस हफ्ते जस्टिस खेहर के रिटायर होने से पहले ही यह फैसला सुना दिया जाएगा.

निजता का अधिकार

न्यायालय में लंबित निजता के अधिकार के इस मामले की शुरुआत आधार योजना पर उठाए गए सवालों से हुई थी. कई अलग-अलग जनहित याचिकाओं में आधार योजना के विभिन्न पहलुओं को चुनौती दी गई थी. ऐसे में न्यायालय ने ऐसी कुल 22 याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करने का मन बनाया और इस मामले को नौ जजों की एक संवैधानिक पीठ को सौंप दिया.

आधार योजना को कई लोगों ने इसलिए भी चुनौती दी थी क्योंकि उनके मुताबिक यह योजना देश के नागरिकों के ‘निजता के अधिकार’ का हनन करती है. ऐसे में यह सवाल पैदा हुआ कि क्या ‘निजता का अधिकार’ मौलिक अधिकारों में से एक है या नहीं. पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी का इस सवाल पर कहना था कि हमारे संविधान में निजता के अधिकार को मौलिक अधिकारों में शामिल नहीं किया गया है. बिलकुल यही तर्क नए अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल का भी है. दूसरी तरफ याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि संविधान के अनुछेद 21 में जो अधिकार देश के नागरिकों को मिले हैं, निजता का अधिकार भी उनका अभिन्न हिस्सा है लिहाजा इसे घोषित रूप से मौलिक अधिकार माना जाना चाहिए.

इस मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने इस पर भी चर्चा की है कि अगर निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार मान लिया जाता है तो इसका प्रभाव कई अन्य मामलों पर भी होगा. आधार योजना तो इससे प्रभावित होगी ही साथ ही कुछ समय पहले दिए गए फैसले भी इससे प्रभावित होंगे. मसलन समलैंगिकों के अधिकार. साल 2009 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को उस हद तक असंवैधानिक करार दे दिया था जहां तक ये धारा स्वेच्छा से बनाए गए शारीरिक संबंधों को भी अपराध मानती थी. लेकिन 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने इस फैसले को पलट दिया था. ऐसे में निजता के अधिकार पर चर्चा करते हुए न्यायालय का कहना था कि अगर निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार मान लिया जाता है तो धारा 377 पर दिया गया फैसला भी इससे प्रभावित होगा क्योंकि सेक्सुअल ओरिएंटेशन (यौन अभिरुचि) भी लोगों की निजता का ही मामला है. जस्टिस खेहर की अध्यक्षता में हुई इस मामले की सुनवाई पर भी इसी हफ्ते फैसला आने की पूरी संभावनाएं हैं.

जजों की नियुक्ति

उच्च न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति की व्यवस्था को बदलने के लिए लाए गए एनजेएसी कानून को भले ही सर्वोच्च न्यायालय ने ठुकरा दिया था लेकिन निचली अदालतों में जजों की नियुक्ति की व्यवस्था को सर्वोच्च न्यायालय खुद ही बदलना चाहता है. सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले को स्वतः संज्ञान लेते हुए उठाया है. कुछ समय पहले केंद्रीय सचिव (न्याय) स्नेहलता श्रीवास्तव ने सर्वोच्च न्यायालय को एक पत्र लिखते हुए इस बात पर चिंता जताई थी कि निचली अदालतों में करोड़ों मामले लंबित हैं और जजों के हजारों पद खाली हैं. इस पत्र को गंभीरता से लेते हुए जस्टिस खेहर की अध्यक्षता में तीन जजों की एक पीठ ने निचली अदालतों में जजों की नियुक्ति की व्यवस्था पर विचार शुरू किया.

मौजूदा व्यवस्था में निचली अदालतों में जजों की नियुक्ति की जिम्मेदारी राज्य के उच्च न्यायालय की होती है. अब सर्वोच्च न्यायालय इस व्यवस्था को बदलकर एक केंद्रीय व्यवस्था लाने पर विचार कर रहा है. इसके लिए सर्वोच्च न्यायालय ने सभी उच्च न्यायालयों और सभी राज्यों के सचिवों (विधि) से सुझाव मांगे थे. न्यायालय ने यह भी कहा था कि सभी राज्यों के कानून मंत्रालय इस विषय पर नागरिकों से सलाह मांगें और 17 अगस्त तक अपने सुझाव न्यायालय के सामने रखें.

इस मामले में कुछ राज्यों का यह भी तर्क था कि एक ही केंद्रीय व्यवस्था के आने से देश का संघीय ढांचा कमज़ोर होगा. हालंकि न्यायालय का इस तर्क पर कहना था कि जिस तरह आईएएस नियुक्त करने के लिए एक केंद्रीय व्यवस्था है उसी तरह निचली अदालतों के जजों की नियुक्ति की व्यवस्था भी बनाई जा सकती है और इससे देश का संघीय ढांचा प्रभावित नहीं होगा. इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने सभी राज्यों और उच्च न्यायालयों से किसी सहमति पर पहुंचने की बात कही थी लेकिन साथ ही न्यायालय का यह भी कहना था कि अगर राज्यों और उच्च न्यायालयों के बीच कोई आम सहमति नहीं बनती तो भी हम इस प्रस्ताव पर आगे बढना चाहते हैं.

जस्टिस खेहर की अध्यक्षता वाली इस पीठ ने यह भी कहा है कि जरूरत पड़ी तो 22 अगस्त को यह पीठ पूरे दिन इस मामले पर सुनवाई करने को तैयार है. ऐसे में इसकी संभावनाएं और भी बढ़ जाती हैं 26 अगस्त को रिटायर हो रहे जस्टिस खेहर अपना कार्यकाल पूरा करने से पहले भारतीय न्यायपालिका में बड़ा बदलाव लाने वाला यह फैसला सुना जाएं.