बीती 17 अगस्त की बात है. मैं बिहार के अररिया जिले में पड़ने वाले अपने गांव बथनाहा में था. पांच-छह दिनों तक लगातार तेज बारिश के बाद आसमान से काले बादल छंट चुके थे. लेकिन 13-14 अगस्त को आई बाढ़ की विनाशलीला और इससे पैदा डर लोगों के दिलो-दिमाग पर अभी तक छाया हुआ था. बड़े-बुजुर्गों का कहना था कि उन्होंने इलाके में ऐसी भयंकर बाढ़ कभी नहीं देखी थी. सरकारी मदद के अभाव में बड़ी संख्या में लोग अपना घर-बार छोड़कर जरूरी सामान के साथ सड़क पर आ चुके थे.
कहा जाता है कि प्राकृतिक आपदा पर किसी का कोई बस नहीं. अक्सर हमारे पास इसका कहर झेलने के अलावा कोई चारा नहीं होता. लेकिन उस मुसीबत से तो बचा ही जा सकता है जो आपदा वाले इलाकों में असामाजिक तत्वों द्वारा फैलाई गई अफवाह के चलते पीड़ितों पर टूटती है. 17 अगस्त की उस शाम को हमारे इलाके में ऐसी ही एक मुसीबत आई.
पानी घटने और मौसम साफ होने के साथ स्थानीय बाजार में लोगों की चहल-पहल बढ़ चुकी थी. लोग अपने रोज के इस्तेमाल की चीजें खरीदने में व्यस्त थे. मैं भी अपने एक दोस्त के साथ एक दुकान पर पहुंचा. इससे पहले कि सामान खरीद पाता सड़क पर अचानक ही लोगों की हलचल तेज हो गई. मैंने देखा कि सभी इधर-उधर भाग रहे हैं. दुकान पर खड़े लोगों को समझ नहीं आ रहा था कि अचानक से क्या हो गया.
एक-दो लोगों से पूछा तो पता चला कि नेपाल के सुनसरी जिले स्थित कोसी नदी पर बना राजा बास बांध टूट चुका है और 15-20 फीट ऊंचा पानी का सैलाब तेजी से आगे बढ़ रहा है. बथनाहा भारत-नेपाल सीमा से छह किमी की दूरी पर है. सुनसरी से इसकी दूरी करीब 30 किमी है. देखते ही-देखते पूरे बाजार में अफरा-तफरी मच गई. सड़क किनारे ठेला लगाए दुकानकारों ने भी अपना सामान समेटना शुरू कर दिया. जहां चहल-पहल थी वहां कुछ ही मिनट में सन्नाटा छा गया.
हालांकि तेजी से फैलती इस खबर को लेकर लोगों के मन शंका भी थी. इसकी वजह यह थी कि 2008 में कोसी त्रासदी के वक्त कई बार ऐसी ही बातें सामने आई थीं जो बाद में अफवाह साबित हुईं. इससे मची अफरातफरी का फायदा असामाजिक तत्वों द्वारा उठाने की कोशिश की गई थी. इसके बावजूद लोगों के मन में डर तो था ही. सभी अपने-अपने घरों की तरफ भाग रहे थे. मैं भी थोड़ा सहम गया था क्योंकि खबर सही होने पर ऐसी तबाही की आशंका थी कि इलाके का कोई नामोनिशान नहीं बचता. हम लोग भी तेजी से घर की ओर निकले.
घर पहुंचने के बाद एक करीबी ने कोसी बैराज के नजदीक स्थित अपने एक परिचित से संपर्क साधा . उसने इस तरह की किसी बात से इनकार किया. लेकिन इस बीच यह बात जंगल में आग की तरह हमारे यहां से 36 किलोमीटर दूर अररिया शहर से लेकर पड़ोसी जिले पूर्णिया तक फैल चुकी थी. जान-पहचान के लोगों के घबराहट भरे फोन आने शुरू हो गये थे. आस-पास के लोग भी काफी डरे-सहमे हुए थे. कई जरूरी सामान लेकर ऊंची जगहों की ओर बढ़ चले थे.जिन्होंने अपना घर नहीं भी छोड़ा, उन्होंने सामान को ऊंचाई पर सुरक्षित रखने का बंदोबस्त करना शुरू कर दिया था. मवेशी खोल दिए गए थे.
कई लोगों से बात करने के बाद और इस खबर के अफवाह होने की पुष्टि के बाद रात के करीब 10 बजे दोबारा बाजार निकला. इस बीच प्रशासन ने भी ऐलान कर दिया था कि बांध टूटने की खबर अफवाह है. लेकिन यह कदम उठाने में उसे ढाई घंटे से ज्यादा का वक्त लग गया था. इस दौरान लोगों के दिलोदिमाग और बाहरी दुनिया में काफी कुछ घट चुका था.
बाद में एक राष्ट्रीय दैनिक के साथ जुड़े स्थानीय पत्रकार शत्रुघ्न यादव से बात हुई. उनका कहना था, ‘इस अफवाह के पीछे कुछ असामाजिक तत्वों का हाथ होने की बात सामने आई है. इसके पीछे इनका मकसद लोगों के डर को बढ़ाने से लेकर अफरातफरी की वजह से पैदा स्थिति का फायदा उठाना तक होता है.’ यह पूछने पर कि क्या पुलिस ने ऐसे तत्वों का पता लगाने की कोशिश नहीं की, उन्होंने बताया, ‘पुलिस ने अगले दिन कई इलाकों में शक के आधार पर कई लोगों से पूछताछ की, लेकिन इसके लिए जिम्मेदार लोगों का पता अब तक पता नहीं लगाया जा सका है.’
प्राकृतिक आपदा के वक्त असामाजितक तत्वों द्वारा फैलाई गई अफवाह प्रशासन के साथ लोगों के लिए कितनी मुसीबतों का सबब बन सकती है, इसका एक और उदाहरण पड़ोस के ही किशनगंज जिले में देखने को मिला. एक मित्र ने बताया कि प्रशासन ने अफवाहों को फैलने से रोकने के लिए सरकारी टेलिकॉम कंपनी बीएसएनएल को छोड़कर बाकी सभी की सेवाएं बंद कर दी थीं. इससे अफवाहें फैलने की आंशका को भले ही कम कर दिया गया हो, लेकिन बाढ़ जैसी स्थिति के बीच लोगों का अपने परिजनों से फोन के जरिए संपर्क करीब-करीब नामुमकिन हो गया.
बीते कुछ समय के दौरान पूरे देश में देखा गया है कि प्रशासन अफवाहों को रोकने के लिए इंटरनेट सहित मोबाइल फोन सेवा बंद कर देता है. माना जाता है कि इसके जरिए इसके जरिये ही अफवाहें तेजी से फैलती हैं और इन्हें रोकने का यह एक आसान रास्ता है. लेकिन यह तरीका कई बार पहले से परेशान लोगों की मुसीबतें बढ़ाने का काम करता दिखता है. देखा जाए तो बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं के दौरान अफवाहें पीड़ितों की मुश्किलें बढ़ाने का काम न करें, इसके लिए एक चुस्त और कारगर व्यवस्था की जरूरत है
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