तमिलनाडु में इस सोमवार को सत्ताधारी एआईएडीएमे (अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) के दो धड़ों का विलय हो गया. इनमें एक के मुखिया मुख्यमंत्री ईके पलानिसामी (ईपीएस) हैं तो दूसरे के उनके पूर्ववर्ती ओ पन्नीरसेल्वम यानी ओपीएस. दोनों में बनी सहमति के आधार पर सरकार की कमान की ईपीएस के हाथ में ही है. यहां ओपीएस उनके डिप्टी हैं. उन्हें सोमवार को ही वित्त मंत्रालय का प्रभार मिल गया था जबकि मंगलवार को उन्हें दो-तीन और भारी-भरकम मंत्रालय सौंप दिए गए. इनमें योजना, विधायी कामकाज, चुनाव और पासपोर्ट से संबंधित मंत्रालय प्रमुख हैं. इस तरह यह संदेश दिया गया कि ओपीएस सरकार में हों भले उपमुख्यमंत्री लेकिन उनकी हैसियत मुख्यमंत्री से कम नहीं है.

दूसरी तरफ ऐसी ही समानांतर व्यवस्था पार्टी के संचालन के लिए की गई है. लेकिन उलट जिम्मेदारियों के साथ. यानी पार्टी में संयोजक की हैसियत से मुखिया ओपीएस हैं. जबकि ईपीएस सह-संयोजक के तौर पर उनके बाद नंबर दो. पार्टी का कामकाज देखने के लिए एक 11 सदस्यीय टीम भी बनाई जाएगी. यह टीम भी ओपीएस को ही रिपोर्ट करेगी. यानी सरकार के बॉस अगर ईपीएस हैं तो पार्टी के ओपीएस. इस आपसी सहमति से बनी व्यवस्था के बाद तमाम ख़बरें आईं कि राज्य में शायद पिछले छह-सात महीने से (फरवरी से जब ओपीएस ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद बग़ावत की थी) चला आ रहा राजनीतिक संकट ख़त्म हो गया है. लेकिन यह आधा सच भी नहीं है. हक़ीक़त यह है कि तमिलनाडु का राजनीति संकट अभी बना हुआ है. बल्कि इसके और ज़्यादा गहराने के संकेत मंगलवार से ही मिलने लगे हैं.

और इससे भी ज़्यादा दिलचस्प बात यह है कि एआईएडीएके और उसकी सरकार के सामने पेश आने को तैयार बैठीं तीन बड़ी चुनौतियों से निपटने की ज़िम्मेदारी सबसे ज्यादा ओपीएस के कंधों पर ही नज़र आ रही है. कहीं पार्टी प्रमुख की हैसियत से तो कहीं सरकार के सह-प्रमुख के रूप में.

दिनाकरन नाम की ‘बाधा’ और सरकार बचाने की चुनौती

ईपीएस और ओपीएस की सामने सबसे बड़ी ‘बाधा’ अभी टीटीवी दिनाकरन हैं. दिसंबर में जयललिता के निधन के बाद पार्टी महासचिव का पद कब्जाने वाली शशिकला नजटरान के भतीजे दिनाकरन कई मायनों में कुख्यात हैं. ख़ासकर पैसों के बल पर राजनीतिक हालात को अपने पक्ष में करने की कोशिशों के चलते. फरवरी में जब ओपीएस ने शशिकला से बग़ावत की थी तब इन्हीं की देखरेख में एआईएडीएमके विधायकों को चेन्नई के बाहरी इलाके में स्थित गोल्डन बे रिजॉर्ट ले जाया गया था. उन्हें तब तक वहां रोक कर रखा गया जब तक शशिकला के ‘तत्कालीन विश्वस्त’ ईपीएस की सरकार ने सदन में विश्वास मत प्रस्ताव नहीं जीत लिया. इस घटना के सिलसिले में बीती जून में पार्टी के दो विधायकों ने कैमरे के सामने माना था कि शशिकला-दिनाकरन ने उस वक्त उन्हें पैसों और सोने का लालच दिया था.

ख़बरों के मुताबिक ईपीएस के ओपीएस से हाथ मिला लेने के बाद अब यही दिनाकरन फिर सक्रिय हैं. मंगलवार को उनके समर्थक क़रीब 19 एआईएडीएमके विधायकों ने राज्यपाल सीएच विद्यासागर राव से मुलाकात की है. उन्होंने राज्यपाल को बताया है कि वे ईपीएस सरकार के समर्थन में नहीं हैं. इसके अलावा तीन निर्दलीय विधायक भी दिनाकरन के समर्थन में बताए जाते हैं. इस तरह 22 विधायकों का समर्थन दिनाकरन के साथ बताया जा रहा है. इस आधार पर विपक्षी डीएमके (द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) के प्रमुख एमके स्टालिन राज्य सरकार को ‘अल्पमत में’ बताते हुए ऐलान किया है कि उनकी पार्टी विधानसभा में अविश्वास प्रस्ताव पेश करेगी. ख़बरें हैं कि 10 और विधायक दिनाकरन की तरफ जा सकते हैं. बताया जाता है कि इन विधायकों को पुड्‌डुचेरी के दो होटलों में ले जाए जाने का इंतज़ाम भी हो गया है.

सो अब मौज़ूदा हालात ये हैं कि पलानिसामी की सरकार ओपीएस समर्थक नौ को मिलाकर 112 विधायकों के समर्थन पर टिकी है. राज्य विधासनभा विधानसभा की कुल सदस्य संख्या 235 (एक मनोनीत सदस्य मिलाकर) है. निर्वाचित 234 सदस्यों में से पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता के निधन के बाद एक सीट खाली है. यानी रह गए 233 विधायक. इनमें सरकार बचाए रखने के लिए ईपीएस-ओपीएस की जोड़ी को 117 विधायकों के समर्थन की ज़रूरत होगी जो अभी तो उसके साथ नहीं दिखते. और दिलचस्प बात यह है कि इस स्थिति से निपटने की ज़िम्मेदारी मुख्यमंत्री ने बड़ी चतुराई से ओपीएस के कंधों पर डाल दी है. विधायी कामकाज वाले विभाग की मुखिया की हैसियत से ओपीएस अगर सदन में सरकार को बचा ले गए तो अच्छी बात नहीं तो सरकार गिरने की बदनामी आधी तो उनके हिस्से आएगी ही.

शशिकला-दिनाकरन को हटाना और नए महासचिव का चुनाव

मार्के की बात है कि दूसरी चुनौती से निपटने की ज़िम्मेदारी भी पार्टी के संयोजक की हैसियत से ओपीएस को ही उठानी है. यानी अपनी पुरानी मांग के अनुरूप शशिकला और दिनाकरन को पार्टी से बाहर करना और फिर नए महासचिव का चुनाव. इसके लिए उन्हें एआईएडीएमके के संविधान के मुताबिक पार्टी की महासभा बुलानी होगी. क्योंकि इसके बिना यह संभव नहीं है. वरना ईपीएस अब तक ओपीएस की यह सबसे बड़ी मांग मान चुके होते. बहरहाल अब पार्टी के राज्य सभा सदस्य आर वैतिलिंगम ने कहा है कि जल्द ही इन दोनों कामों के लिए महासभा बुलाई जाएगी. लेकिन इसमें ओपीएस सहज भाव से अपने दोनों उद्देश्य हासिल कर पाएंगे इसमें संदेह है. क्योंकि शशिकला और दिनाकरन के समर्थक वहां भी चुप नहीं बैठेंगे, इसका संकेत उन्होंने अभी से देना शुरू कर दिया है.

निर्वाचन आयोग से पार्टी चुनाव चिन्ह हासिल करना

पार्टी चुनाव चिन्ह (दो पत्तियां) पर दावेदारी का मसला भी बीती मार्च में ओपीएस ही निर्वाचन आयोग तक लेकर गए थे. उसके एक महीने बाद से एआईएडीएमके का नाम और चुनाव चिन्ह निर्वाचन आयोग के पास ज़ब्त है. बताया जाता है कि ओपीएस अब तक अपनी दावेदारी के समर्थन में चुनाव आयोग के पास छह लाख से ज़्यादा हलफनामे जमा करा चुके हैं. लेकिन चूंकि वे अब ख़ुद ‘एकीकृत पार्टी’ के मुखिया हैं. इसलिए उन्हें ही निर्वाचन आयोग को सूचना देनी होगी कि वे चुनाव चिन्ह पर दावेदारी वापस ले रहे हैं. पार्टी एक हो चुकी है. उसे उसका नाम व चुनाव चिन्ह फिर आवंटित किया जाए. इसके बाद ही इस बात की संभावना बनेगी कि एआईएडीएमके अपने मूल स्वरूप में लौट सके. हालांकि यहां भी यह दावे के साथ नहीं कहा जा सकता कि दिनाकरन और उनके समर्थक ओपीएस की राह में रोड़ा नहीं बनेंगे.

यानी कुल मिलाकर स्थिति यह है कि अभी भले ही एआईएडीएमके के इस विलय से ओपीएस सबसे अधिक फायदे में दिख रहे हों, लेकिन उनकी असल स्थिति तब मज़बूत होगी जब वे ऊपर बताई गई इन तीनों बाधाओं को पार कर लेते हैं. अगर वे इसमें सफल रहे तो तमिलनाडु और एआईएडीएमके के ‘बड़े नायक’ के तौर पर उभर सकते हैं. लेकिन अगर नहीं कर पाए तो नतीज़ा इसके उलट भी हो सकता है.