मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम. इसी मामले को ‘शाह बानो केस’ नाम से भी जाना जाता है. इस केस की जितनी अहमियत स्वतंत्र भारत के न्यायिक इतिहास में है उतनी ही अहमियत राजनीतिक इतिहास में भी है. माना जाता है कि देश में सांप्रदायिक तुष्टिकरण की राजनीति इसी मामले के बाद से शुरू हुई थी. इसे समझने के लिए पहले संक्षेप में शाह बानो मामले को समझते हैं.

शाह बानो मध्य प्रदेश के इंदौर की रहने वाली एक मुस्लिम महिला थीं. उनके पति ने जब उन्हें तलाक दिया तब उनकी उम्र 60 वर्ष से ज्यादा हो चुकी थी. इस उम्र में अपने पांच बच्चों के साथ पति से अलग हुई शाह बानो के पास कमाई का कोई जरिया नहीं था. लिहाजा उन्होंने दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125 के अंतर्गत अपने पति से भरण पोषण भत्ता दिए जाने की मांग की. न्यायालय ने शाह बानो के पक्ष में फैसला दिया. उनके पति ने इस फैसले के खिलाफ अपील की और आखिरकार यह मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा.

शाह बानो के पति का तर्क था कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत तलाकशुदा महिलाओं को ताउम्र भरण-पोषण भत्ता दिए जाने का कोई प्रावधान ही नहीं है. दूसरी तरफ शाह बानो का तर्क था कि दंड प्रक्रिया संहिता देश के प्रत्येक नागरिक (चाहे वह किसी भी धर्म का हो) पर सामान रूप से लागू होती है लिहाजा उन्हें भी इसका लाभ मिलना चाहिए. न्यायालय ने शाह बानो के तर्क को स्वीकार करते हुए 23 अप्रैल 1985 को उनके पक्ष में फैसला दे दिया. इस फैसले को मुस्लिम महिलाओं के अधिकार सुनिश्चित करने की राह में एक मील का पत्थर माना गया और शाह बानो का नाम भारत के न्यायिक इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गया. लेकिन इसके तुरंत बाद ही इस फैसले पर राजनीति शुरू हो गई.

मुस्लिम संगठनों का विरोध और सरकार का असाधारण कदम

तमाम मुस्लिम संगठन इस फैसले का विरोध करने लगे. उनका कहना था कि न्यायालय उनके पारिवारिक और धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप करके उनके अधिकारों का हनन कर रहा है. जगह-जगह विरोध प्रदर्शन होने लगे. आखिरकार राजीव गांधी सरकार ने मुस्लिम धर्मगुरुओं के दबाव में आकर मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 1986 पारित कर दिया. इस अधिनियम के जरिये सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को पलट दिया गया. ऐसा होने पर हिंदूवादी संगठनों ने राजीव गांधी पर अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के आरोप लगाए और उनकी जमकर निंदा की. इससे विचलित हुए राजीव गांधी अब बहुसंख्यक तुष्टिकरण की राह पर निकल पड़े.

प्रसिद्द इतिहासकार राम चंद्र गुहा अपनी किताब ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ में लिखते हैं कि शाह बानो केस पर हुई राजनीति से नाराज चल रहे बहुसंख्यक समुदाय के तुष्टिकरण के लिए राजीव गांधी ने राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के ताले खुलवाने में अहम भूमिका निभाई थी. लेकिन तुष्टिकरण की जिस राह पर राजीव गांधी निकल पड़े थे, उसके नतीजे बेहद घातक सिद्ध हुए. सांप्रदायिक ताकतें लगातार हावी होती चली गई, बाबरी मस्जिद गिरा दी गई और हजारों लोग धार्मिक उन्माद की भेंट चढ़ गए.

शाह बानो केस जीतकर भी वह नहीं पा सकीं जिसकी लड़ाई वे लड़ रही थीं. पहले तो मुस्लिम धर्मगुरुओं के दबाव में उन्हें स्वयं ही अपने पति से मिलने वाला भत्ता त्यागना पड़ा और बाद में राजीव गांधी सरकार ने न्यायालय के फैसले को ही पलट दिया था. हालांकि साल 2001 में सर्वोच्च न्यायालय ने डेनियल लतीफी मामले की सुनवाई के दौरान शाह बानो केस के फैसले को पुनः सही ठहराते हुए तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के लिए भत्ता सुनिश्चित कर दिया है. लेकिन शाह बानो केस से जो अधिकार मुस्लिम महिलाओं को साल 1985 में ही दे दिए गए थे, इस फैसले पर हुई राजनीति के चलते वे अधिकार पाने में इन महिलाओं को 16 साल और लग गए.

इस पूरे प्रकरण का एक बेहद दिलचस्प पहलू और भी है. 80 के दशक में जब शाह बानो केस के फैसले का तमाम मुस्लिम संगठन और धर्मगुरु विरोध कर रहे थे, तब तत्कालीन गृह राज्य मंत्री आरिफ मोहम्मद खान, स्वयं एक मुस्लिम होकर भी इस फैसले के पक्ष में खड़े थे. बल्कि जब राजीव गांधी सरकार ने कानून बनाकर न्यायालय के फैसले को पलटा तो आरिफ मोहम्मद खान ने इसके विरोध में सरकार से इस्तीफ़ा तक दे दिया था. ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ में इस बारे लिखा गया है कि तब आरिफ ने एक साक्षात्कार में कहा था कि ‘पूरी दुनिया में सिर्फ भारतीय मुस्लिम महिलाएं ही ऐसी होंगी जिन्हें इस भत्ते से वंचित किया जा रहा है.’

शायरा बानो की लड़ाई

सिर्फ मुस्लिम महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव का जो सवाल लगभग तीस साल पहले आरिफ मोहम्मद खान ने उठाया था, वही सवाल एक बार फिर से सर्वोच्च न्यायालय में कुछ समय पहले उठा. इस बार यह सवाल उठाने वाली शायरा बानो नाम की एक मुस्लिम महिला थीं. उनकी याचिका में में ऐसे तमाम भेदभावों को समाप्त करने की बात कही गई थी जो सिर्फ मुस्लिम महिलाओं के साथ हो रहे हैं.

शाह बानो की तरह ही शायरा बानो भी एक तलाकशुदा महिला हैं जो अपने अधिकारों के लिए न्यायालय पहुंची थीं. शाह बानो की तरह ही इस मामले के भी कई न्यायिक और राजनीतिक पहलू हैं. इन्हें समझने की शुरुआत उन समीकरणों से करते हैं जिनके चलते शायरा बानो सर्वोच्च न्यायालय पहुंची थीं.

शायरा बानो उत्तराखंड के काशीपुर की रहने वाली हैं. साल 2002 में उनकी शादी इलाहाबाद में रहने वाले रिजवान अहमद से हुई थी. शायरा का आरोप है था उनके ससुराल वाले उनसे दहेज़ की मांग करते थे और उनके साथ मारपीट भी किया करते थे. उनका यह भी आरोप था कि उन्हें ऐसी नशीली दवाएं दी जाती थीं जिनके कारण उनकी याददाश्त कमज़ोर होने लगी और अंततः वे गंभीर रूप से बीमार पड़ गईं. शायरा के अनुसार अप्रैल 2015 में उनके पति ने उन्हें जबरदस्ती मायके भेज दिया और कुछ समय बाद ‘तीन तलाक’ देते हुए उनसे रिश्ता ही समाप्त कर दिया.

इसी तलाक की वैध्यता को चुनौती देते हुए शायरा सर्वोच्च न्यायालय पहुंची थीं. लेकिन शायरा की याचिका का मुख्य पहलू यह भी था कि उसके माध्यम से ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरियत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937’ की धारा 2 की संवैधानिकता को भी चुनौती दी गई है. यही वह धारा है जिसके जरिये मुस्लिम समुदाय में बहुविवाह, ‘तीन तलाक’ (तलाक-ए-बिद्दत) और ‘निकाह-हलाला’ जैसी प्रथाओं को वैध्यता मिलती है. साथ ही शायरा ने ‘मुस्लिम विवाह विघटन अधिनियम, 1939’ को भी इस तर्क के साथ चुनौती दी थी कि यह कानून मुस्लिम महिलाओं को बहुविवाह जैसी कुरीतियों से संरक्षित करने में सार्थक नहीं है.

शायरा का तर्क था कि ऐसी प्रथाओं की आज के प्रगतिशील समाज में कोई जगह नहीं होनी चाहिए जिनमें महिलाओं को सिर्फ निजी संपत्ति समझा जाता है. उनका कहना था कि ऐसी कुरीतियों का समर्थन और इनका प्रचार सिर्फ वे इमाम और मौलवी करते हैं जो अपने पद का दुरूपयोग कर रहे हैं. शायरा ने अपनी याचिका में मुख्यतः तीन मुद्दों को उठाया था - तीन तलाक, निकाह हलाला और बहुविवाह.

शायरा का कहना था कि पारंपरिक तौर पर भारत में कई अन्य समुदायों में भी बहुविवाह प्रथा का चलन रहा है. लेकिन समय के साथ सभी ने इस प्रथा को समाप्त कर दिया. याचिका में सरला मुद्गल केस का हवाला देते हुए कहा गया था कि ‘इसाई समुदाय में 1872 के अधिनियम के तहत बहुविवाह को दंडनीय माना गया है, पारसियों में 1936 के अधिनियम के तहत यह दंडनीय है और हिन्दू, बौध, सिख तथा जैनियों में 1955 के अधिनियम के अनुसार बहुविवाह दंडनीय है. लेकिन 1939 का ‘मुस्लिम विवाह विघटन अधिनियम’ बहुविवाह को दंडनीय नहीं मानता. लिहाजा, जहां भारत की सभी महिलाओं को बहुविवाह जैसी प्रथा से संवैधानिक सुरक्षा प्राप्त है, वहीँ मुस्लिम महिलाओं को आज भी इस प्रथा से बचाया नहीं जा रहा है.’

तीन तलाक के बारे में याचिका में लिखा गया था, ‘इस प्रथा के चलते महिलाओं को संपत्ति की तरह समझा जाता है. यह प्रथा न सिर्फ मानवाधिकारों और लैंगिक समानता के विरुद्ध है बल्कि कई प्रख्यात विद्वानों के अनुसार यह इस्लामी आस्था का अभिन्न हिस्सा भी नहीं है. सऊदी अरब, पकिस्तान और इराक जैसे कई इस्लामिक देशों ने भी इस प्रथा पर पूर्ण या आंशिक प्रतिबंध लगा दिया है. लेकिन भारतीय समाज में यह आज भी मौजूद है और भारतीय मुस्लिम महिलाओं को इसके दुष्परिणाम भुगतने पड़ रहे हैं.’

निकाह हलाला जैसी प्रथा को भी शायरा बानो ने चुनौती दी थी. उनकी याचिका के अनुसार निकाह-हलाला वह प्रथा है जिसके अंतर्गत कोई तलाकशुदा मुस्लिम महिला यदि अपने पति से पुनः शादी करना चाहती है तो पहले उसे किसी अन्य व्यक्ति से शादी करनी होती है. इसके बाद जब यह दूसरा व्यक्ति भी उसे तलाक दे, तभी वह अपने पहले पति से पुनः शादी कर सकती है. सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी याचिका को कई अन्य याचिकाओं के साथ मिलाते हुए तय किया कि न्यायालय फिलहाल सिर्फ तीन तलाक के मामले पर ही अपनी सुनवाई सीमित रखेगा.

इस मामले की सुनवाई जस्टिस खेहर की अध्यक्षता में पांच जजों की एक संवैधानिक पीठ में हुई. इस पीठ में जस्टिस कुरियन जोसेफ, जस्टिस आरएफ नरीमन, जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर भी शामिल थे. कई दिनों तक लगातार चली सुनवाई के बाद बीती 19 मई को पीठ ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था. आज यह फैसला देते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित कर दिया है. न्यायालय ने केंद्र सरकार को छह महीनों के भीतर इस संबंध में कानून लाने के भी निर्देश दिए हैं. शायरा बानो ने इसे अपनी ही नहीं बल्कि तमाम मुस्लिम महिलाओं की जीत बताया है.

शाह बानो की तरह ही अब शायरा बानो का नाम भी देश के न्यायिक इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो चुका है. लेकिन शाह बानो मामले की तरह ही इस मामले के भी कई राजनीतिक निहितार्थ हो सकते हैं. केंद्र में इन दिनों उस भाजपा की सरकार है जिसके लिए ‘समान नागरिक संहिता’ हमेशा से एक बड़ा मुद्दा रहा है. ऐसे में कई जानकार मान रहे हैं कि तीन तलाक पर आए इस फैसले से समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए सरकार की राह कुछ हद तक आसान ज़रूर हो गई है.