मीडिया में चल रहा है कि चार दिन के अंदर हुई दो बड़ी रेल दुर्घटनाओं की वजह से रेल मंत्री सुरेश प्रभु को इस्तीफा देना पड़ा. सुनी-सुनाई से कुछ ज्यादा है कि सुरेश प्रभु की रेल मंत्रालय से छुट्टी पहले से ही तय थी. इस बार मंत्रिमंडल विस्तार में बड़े पैमाने पर फेरबदल होना है जिसमें सुरेश प्रभु का मंत्रालय बदला जाना तय था. अब दो रेल दुर्घटनाओं के बाद इस्तीफा देकर सुरेश प्रभु शहीद बनना चाहते हैं और मोदी सरकार भी उनके जरिये जवाबदेही का नया पैमाना तय करना चाहती है.

नए रेल मंत्री के साथ रेलवे बोर्ड के चेयरमैन एके मित्तल की विदाई भी पहले से तय थी. रेलवे बोर्ड के नए चेयरमैन अश्विनी लोहानी की फाइल करीब बीस दिन पहले ही आगे बढ़ा दी गई थी. अश्विनी सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पसंद बताए जाते हैं. अश्विनी रेलवे सेवा के अफसर हैं और उन्होंने मध्य प्रदेश और भारतीय पर्यटन विकास निगम जैसे बीमार विभागों का कायापलट किया था. वे एयर इंडिया के चेयरमैन के तौर पर उसकी किस्मत बदलना चाहते थे, लेकिन सरकार एयर इंडिया को बेचने का मूड बना चुकी है. इसलिए अश्विनी को वापस रेलवे की सेवा में भेजने का फैसला लिया गया. बस समस्या एक ही थी - लोहानी रेलवे बोर्ड के चेयरमैन जैसे पद के लिए बहुत जूनियर अफसर थे. लेकिन लगातार हुए दो रेल हादसों ने मोदी सरकार के लिए ऐसा करना भी आसान बना दिया. इस तरह सभी वरिष्ठ अफसरों को दरकिनार करते हुए अश्विनी लोहानी को रेलवे बोर्ड का चेयरमैन बनाने का फैसला कर लिया गया.

एक और सुनी-सुनाई है जो दिल्ली में मंत्रियों, पत्रकारों और संघ के स्वयंसेवकों के बीच खूब चल रही है. मोदी सरकार में भूतल परिवहन और जहाजरानी मंत्री नितिन गडकरी को नया रेल मंत्री बनाने का फैसला करीब-करीब हो चुका है. लेकिन गडकरी सिर्फ रेल मंत्री बनने से खुश नहीं हैं. वे प्रधानमंत्री के सामने प्रेजेंटेशन दे चुके हैं कि उन्हें पूरा परिवहन विभाग सौंपा जाए मतलब रेल, सड़क और समुद्री यातायात तीनों का मंत्री एक ही व्यक्ति हो.

शुरू-शुरू में प्रधानमंत्री गडकरी के इस प्रस्ताव से सहमत दिखे थे, लेकिन बाद में इस पर फैसला नहीं हो पाया. भाजपा पर नज़र रखने वाले एक पत्रकार बताते हैं कि अगर गडकरी को रेल, भूतल परिवहन और जहाजरानी जैसे तीन अहम मंत्रालय मिल गए तो सरकार में उनकी हैसियत बहुत बढ़ जाएगी. इस वक्त मोदी कैबिनेट में गडकरी ही ऐसे मंत्री हैं जो कैबिनेट की बैठकों में खुलकर अपनी बात कहते हैं. कई बार तो वे इनमें प्रधानमंत्री के फैसलों पर भी सवाल उठा चुके हैं. इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन्हें इतना मजबूत नहीं करना चाहेंगे. ऊपर से गडकरी पर संघ भी काफी भरोसा करता है.

रेल मंत्रालय के अलावा रक्षा मंत्रालय ने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पिछले दिनों काफी परेशान किया है. चीन से खतरे के वक्त रक्षा मंत्री की भूमिका और भी अहम हो गई है. मोदी सरकार के एक कैबिनेट मंत्री अपने कुछ करीबी पत्रकारों को बताते हैं कि प्रधानमंत्री को पिछले कुछ महीनों से ऐसा कोई नेता नहीं मिल रहा था जो उनके पैमाने पर सटीक बैठे. 2014 में सरकार बनने के बाद उन्होंने शिवसेना से आए सुरेश प्रभु को रेल मंत्री और गोवा से आए मनोहर पर्रिकर को रक्षा मंत्री बनाने का प्रयोग किया था. इन दोनों नेताओं के लिए राज्यसभा की सीट का भी इंतजाम किया गया. लेकिन ये दोनों ही प्रयोग असफल रहे. पर्रिकर को वापस गोवा लौटना पड़ा और प्रभु को इस्तीफा देना पड़ा.

अब सुनी-सुनाई है कि प्रधानमंत्री तीसरा प्रयोग नहीं करना चाहते. इसलिए रक्षा और रेल, दोनों ही मंत्रालयों की जिम्मेदारी इस वक्त के मंत्रियों को ही दी जाएगी. नए मंत्रियों को इतनी भारी-भरकम जिम्मेदारी देने का रिस्क अब प्रधानमंत्री नहीं लेना चाहेंगे और छाछ को फूंक कर पीने की कोशिश में वेकिसी टेकनोक्रैट को भी मंत्री शायद ही बनाएंगे.