सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने कल एक ऐतिहासिक फैसला देते हुए मुस्लिम समुदाय में प्रचलित तीन तलाक की प्रथा को असंवैधानिक करार दे दिया. कोर्ट ने केंद्र सरकार को भी निर्देश दिए हैं कि वह छह महीनों के भीतर इस संबंध में कानून बनाएं.

एक ओर जहां इस फैसले की जमकर सराहना हो रही है तो वहीँ कुछ लोग इस पर कई तरह के सवाल भी उठा रहे हैं. फैसले का विरोध करने वाले कुछ लोग इसे धार्मिक मामलों में न्यायालय का अनावश्यक हस्तक्षेप बता रहे हैं तो कुछ का मानना है कि दहेज़ प्रथा और जातिगत भेदभाव की तरह तीन तलाक पर भी कानून बना देने से ज्यादा कुछ नहीं होने वाला. कुछ लोग ऐसे भी हैं जो तीन तलाक खत्म किये जाने के पक्ष में तो हैं लेकिन उन्हें लगता है कि मौजूदा माहौल में ऐसा करना सही नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरोध में दिए जा रहे इन तर्कों में एक भी ऐसा नहीं है जिसे तर्कसंगत कहा जा सके. इस मामले में न्यायालय के हस्तक्षेप को अनावश्यक मानने वालों को यह समझना चाहिए कि तीन तलाक का मुद्दा सिर्फ धार्मिक नहीं है बल्कि मुस्लिम महिलाओं के अधिकार से भी जुड़ा हुआ है. बल्कि न्यायालय इस मुद्दे पर सुनवाई को ही तभी तैयार हुआ था जब तीन तलाक से पीड़ित मुस्लिम महिलाएं खुद ही उसके पास न्याय मांगने पहुंची थीं. ऐसे में उनके अधिकारों को सुनिश्चित करना न्यायालय की जिम्मेदारी थी. स्वतंत्र भारत के इतिहास में ऐसे दर्जनों उदाहरण हैं जब न्यायिक हस्तक्षेप के चलते ही बड़े बदलाव हुए हैं. शाह बानो केस, इंदिरा साहनी केस और विशाखा बनाम राजस्थान राज्य ऐसे ही कुछ मामले हैं जिनके चलते न्यायालय ने कभी तलाकशुदा महिलाओं के, कभी पिछड़े वर्ग के तो कभी नौकरी-पेशा महिलाओं के अधिकारों को सुनिश्चित किया है. तीन तलाक पर आए इस फैसले को भी बिलकुल इसी नज़रिए से देखे जाने की जरूरत है.

फैसले के विरोध का यह आधार भी खोखला ही है कि जिस तरह कानून बन जाने से दहेज़ प्रथा समाप्त नहीं हुई उसी तरह तीन तलाक पर भी कोई फर्क नहीं पड़ने वाला. कानून बनाने का उद्देश्य अपराधों पर नियंत्रण करने से ज्यादा यह होता है कि अपराध हो जाने पर पीड़ित के पास न्याय पाने का विकल्प हो. दहेज़ प्रथा के खिलाफ कानून बनने से भले ही यह पूरी तरह समाप्त न हुई हो लेकिन इससे इतना तो सुनिश्चित हुआ ही है कि अब पीड़ित पक्ष के पास न्यायालय जाने का अधिकार है. इसकी वजह से अब दहेज़ मांगने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई होती है और हजारों लोग दहेज़ लेने के आरोप में जेल भी गए हैं. इसी तरह मुस्लिम महिलाओं के पास भी अब तीन तलाक के खिलाफ न्यायालय जाने का विकल्प होगा जो अब तक उनके पास नहीं था.

जो लोग मौजूदा माहौल को अल्पसंख्यकों के खिलाफ बताते हुए इस फैसले पर सवाल उठा रहे हैं, उनका विरोध भी इसलिए सही नहीं है क्योंकि उनका ही मानना है कि ऐसा माहौल पिछले तीन-चार सालों से ही बना है. यानी इससे पहले के कई दशक तो देश का माहौल ऐसा था ही कि इस प्रथा को समाप्त कर दिया जाता. लेकिन ऐसा नहीं किया गया. इससे यह नुकसान हुआ कि जिन पार्टियों ने तीन तलाक को राजनीतिक मुद्दा बनाया, उन्हें बल मिलता गया. मौजूदा फैसला कई मुस्लिम महिलाओं और कार्यकर्ताओं के अथक प्रयासों और लंबी लड़ाई का परिणाम है. लेकिन इसे भी कई लोग एक पार्टी विशेष की जीत के रूप में देख रहे हैं. इस फैसले की अगर सभी ने खुलकर सराहना की होती तो कोई एक राजनीतिक दल इससे फायदा उठाने की कोशिश भी कैसे कर सकता था!