आंध्र प्रदेश की गोदावरी नदी में तेजी से संख्या बढ़ा रही पिरान्हा मछली की एक प्रजाति भविष्य में नदी के बाकी जीव-जंतुओं का सफाया कर सकती है.
हम में से ज्यादातर भारतीयों की पिरान्हा मछली से जुड़ी जानकारी हॉलीवुड की कुछ फिल्मों तक सीमित है. लैटिन अमेरिकी देशों की नदियों में पाई जाने वाली इस मछली के बारे कहा जाता है कि यह काफी आक्रामक होती है. जलीय जीव-जंतुओं को तो यह शिकार बनाती ही है, इंसानों पर भी हमले कर सकती है. अब इसी पिरान्हा मछली की एक प्रजाति आंध्र प्रदेश की गोदावरी नदी में बड़ी संख्या में देखी जा रही है. विशेषज्ञों के मुताबिक भविष्य में यह मछली नदी के जलीय जीवन और मछुआरों, दोनों के लिए खतरा बन सकती है.
दो साल पहले हुए एक अध्ययन के मुताबिक पाकू और कुछ दूसरी विदेशी प्रजातियों की मछलियां ने मुंबई की पोवाई झील में पाई जानेवालीं तकरीबन 15 स्थानीय प्रजातियों को खत्म कर दिया था
गोदावरी में देखी जा रही विदेशी मछली लाल पेट वाली पिरान्हा की एक प्रजाति है जिसे पाकू कहा जाता है. हालांकि यह ‘इंसानों का शिकार’ करने वाली श्रेणी में नहीं आती लेकिन, अर्जेंटीना, वेनेजुएला और ब्राजील में ऐसी कई घटनाएं सामने आई हैं जहां लोग इसके हमले से घायल हुए हैं. यह पाकू इस समय अचानक चर्चा में तब आई जब कुछ वन्यजीव विशेषज्ञों ने स्थानीय मछली बाजार में इसे बिकते हुए देखा. हैदराबाद में मछुआरों से जुड़े एक समूह डेक्कन एंगलर्स के विशेषज्ञ शेख सलाउद्दीन एक अखबार से कहते हैं, ‘स्थानीय लोगों से बात करके हमें पता चला कि यहां पाकू का पाया जाना आम बात है. मछुआरे इसे रूप चंद मछली कहते हैं.’ सलाउद्दीन के मुताबिक वे एक साल पहले कृष्णा नदी में भी यह मछली देख चुके हैं.
भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) ने एक साल पहले गोदावरी में पिरान्हा की उपस्थिति का पता लगाया था. अपनी रिपोर्ट में डब्ल्यूआईआई कहता है, ‘ यह मांसाहारी और आक्रामक मछली है. पाकू अपने भोजन के लिए स्थानीय जलीव जीव-जंतुओं से संघर्ष कर सकती है और आखिर में बाकी प्रजातियों का सफाया कर सकती है.’ विशेषज्ञों की यही चिंता है. पाकू के स्थानीय बाजार में बिकने का मतलब है कि अब यह मछली गोदावरी में अपनी संख्या बढ़ा रही है. यानी यह बाकी मछलियों को भी खत्म कर रही होगी.
पिरान्हा मूल रूप से दक्षिण अमेरिका की मछली है. आंध्र प्रदेश में इसकी उपस्थिति के पीछे एक्वेरियम के गैरकानूनी कारोबार को जिम्मेदार माना जाता है. मत्स्य विज्ञान विशेषज्ञ डॉ ए बीजूकुमार इस बात से सहमति जताते हैं. आज से 15 साल पहले अपनी एक रिपोर्ट में उन्होंने चेतावनी दी थी, ‘यह मछली भारत में बिकने वाले एक्वेरियम में आसानी से उपलब्ध है. यदि यह कभी प्राकृतिक पानी के स्रोतों तक पहुंच गई तो खतरनाक साबित हो सकती है.’
पिरान्हा मूल रूप से दक्षिण अमेरिका की मछली है और आंध्र प्रदेश में इसकी उपस्थिति के पीछे एक्वेरियम के गैरकानूनी कारोबार को जिम्मेदार माना जाता है
आज से दो साल पहले पाकू और कुछ दूसरी विदेशी प्रजातियों की मछलियां मुंबई की पोवाई झील में पाई गई थीं. उस समय हुए एक अध्ययन से पता चला था कि इन मछलियों ने पोवाई में पाई जाने वाली तकरीबन 15 स्थानीय प्रजातियों को खत्म कर दिया था. विशेषज्ञों का कहना है कि यदि गोदावरी में पाकू की बढ़ती संख्या पर नियंत्रण नहीं किया गया तो मुमकिन है कि यहां के पानी पर इसी मछली का कब्जा हो जाए. तब यहां स्थानीय मछुआरों के लिए इससे आजीविका का संकट भी पैदा हो जाएगा.
डब्ल्यूआईआई की रिपोर्ट इसबारे में कहती है, ‘इस समय बहुत ही जरूरी है कि एक्वेरियम बेचने वालों, स्थानीय लोगों और सरकारी नीति निर्धारकों को जागरूक किया जाए. इस मछली और इसी तरह की दूसरी आक्रामक प्रजातियों को खत्म करने का कार्यक्रम शुरू करने की जरूरत है.’
फिलहाल गोदावरी में पाकू के आम लोगों पर हमले की घटनाएं सामने नहीं आई हैं. यह अध्ययन भी अभी उपलब्ध नहीं है कि स्थानीय मछलियों की संख्या पर इनका क्या असर हो रहा है, लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि इनकी संख्या नियंत्रित नहीं की गई तो जल्दी ही इस मछली से जुड़े बड़े खतरे सामने दिखने लगेंगे.