राज्यसभा चुनावों में अहमद पटेल को मिली रोमांचक जीत के बाद गुजरात में कांग्रेस खासी सक्रिय होती दिख रही है. सत्याग्रह से हुई बातचीत में पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता मनीष दोशी बताते हैं कि अगले विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र कांग्रेस प्रदेश में कई बड़ी रैलियों और कार्यक्रमों का आयोजन करेगी. इसी चार सितंबर को पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी अहमदाबाद पहुंचे थे. इस दौरान 125 से ज्यादा सीटें जीतने की बात कहते हुए उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं को भरोसा दिलाया कि टिकट जमीन पर काम करने वालों को ही दिया जाएगा, बाहर से पार्टी में आने वालों को नहीं. इनके अलावा पार्टी द्वारा राज्य में महीने के आखिर में लगातार 12 दिनों तक कई अन्य कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे. इनमें अहमद पटेल समेत कई बड़े चेहरों के साथ राहुल गांधी एक बार फिर गुजरात आ सकते हैं.

लेकिन यहां बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या ये रैलियां और भव्य आयोजन कांग्रेस के लिए फायदेमंद साबित होंगे? प्रदेश की राजनीति पर नज़र रखने वाले जानकार इस सवाल का जवाब न में देते हैं. वरिष्ठ पत्रकार बसंत रावत कहते हैं, ‘कांग्रेस आज भी प्रचार के पुराने ढर्रे पर चलना चाहती है. यह ढर्रा पार्टी कार्यकर्ताओं को तो प्रभावित कर सकता है, लेकिन जनता को रिझाने में असफल रहता है.’

गुजरात में कांग्रेस कहां चूक रही है?

जानकारों की मानें तो अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी बूथ स्तर पर संगठन को मजबूती देने की मुहिम में जुटी हुई है. वहीं भाजपा को समर्थन देने वाले आरएसएस की जड़ें तो और गहराई तक समाई हैं. ऐसे में प्रदेश के राजनीतिकारों का कहना है कि कांग्रेस अब भी सिर्फ हवाई पुल तैयार कर रही है जिनका जमीन से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है. बसंत रावत कहते हैं, ‘प्रदेश में कांग्रेस पदाधिकारियों का पूरा ध्यान इन रैलियों में आने वाले बड़े नेताओं की आवभगत में लगा हुआ है. जबकि इस समय ज्यादा जरूरत ग्राउंड लेवल पर युद्ध स्तर की कैंपेनिंग की है जिसे लेकर कांग्रेस कहीं से भी गंभीर नहीं दिख रही.’

आत्ममंथन का समय

गुजरात के एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं, ‘अहमद पटेल की जीत के बाद लगा था कि प्रदेश में कांग्रेस को मजबूती मिलेगी. लेकिन पार्टी का रवैया देखकर फिलहाल इसकी संभावना कम नज़र आती है.’ वे आगे कहते हैं, ‘करीब एक महिने का समय पार्टी और पदाधिकारियों ने जश्न मनाने और एक दूसरे की वाहवाही में निकाल दिया. जबकि असली लड़ाई तो बाकी है.’

प्रदेश के एक राजनैतिक विश्लेषक कहते हैं, ‘यदि कांग्रेस अहमद भाई की जीत पर खुश होना चाहती है तो उसमें कोई बुराई नहीं. लेकिन पार्टी को यह भी समझना होगा कि वे यह चुनाव विरोधियों की चूक से जीते हैं न कि अपने ही विधायकों पर पकड़ के बूते. ऐसे में पार्टी को जश्न से ज्यादा आत्ममंथन की जरूरत है.’

प्रमुख चुनौतियां

गुजरात में एक प्रमुख अखबार से जुड़े शत्रुघन शर्मा कहते हैं, ‘अहमद पटेल की जीत के बाद प्रदेश में वापसी करने का कांग्रेस के पास एक अच्छा मौका था. लेकिन मौजूदा हालात को देखते हुए पार्टी इसके लिए तैयार नज़र नहीं आती जबकि इस बार कांग्रेस को एक साथ दो मोर्चों पर लड़ाई लड़नी होगी. इनमें से एक तरफ प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा होगी और दूसरी तरफ कांग्रेस छोड़कर गए शंकर सिंह वाघेला’

शर्मा की ही तरह प्रदेश के कई राजनीतिज्ञ भी शंकर सिंह वाघेला उर्फ बापू को कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती मानते हैं. एक सूत्र के शब्दों में ‘वाघेला के भरोसे ही भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने एक साधारण से राज्यसभा चुनाव को इतनी हवा दी थी. बाद में वाघेला समूह के ही दो विधायकों की चूक की वजह से शाह अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पाए. ऐसे में वाघेला और उनके समर्थकों का भविष्य अधर में है और यह सिर्फ इसी बात पर टिका है कि वे विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को कितना ज्यादा नुकसान पहुंचा पाते हैं.’

अमित शाह पहले ही प्रदेश विधानसभा में 182 में से 150 सीटें जिताकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तोहफा देने की बात करते रहे हैं. सूत्रों की मानें तो राज्यसभा चुनाव की तरह शाह ने अहमद पटेल की जीत को भी अब निजी प्रतिष्ठा से जोड़ लिया है. ऐसे में जानकार कह रहे हैं कि प्रदेश भाजपा मिशन-150 के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा देगी.

समय कम, मैनेजमेंट कमजोर

शंकर सिंह वाघेला और उनके 14 समर्थक विधायकों के कांग्रेस छोड़कर जाने के बाद संभावनाएं जताई गई थीं कि पार्टी में नए चेहरों को मौका मिल सकता है. माना गया कि ये नए चेहरे विधानसभा चुनावों में ज्यादा जोश के साथ नयी रणनीतियां बनाकर संगठन को मजबूती देंगे. लेकिन अब ऐसा मुश्किल लग रहा है. सूत्रों के मुताबिक अभी तक प्रदेश संगठन ने इस दिशा में किसी बड़ी जिम्मेदारी का बंटवारा नहीं किया है और वह अपना पूरा ध्यान रैलियों और जुलूसों पर लगाए हुए है. जानकारों का कहना है कि जब तक इन रैलियों का दौर खत्म होगा तब चुनावों में तकरीबन दो महीने से भी कम समय बचा होगा जो कि नए चेहरों को स्थापित करने के लिहाज से बहुत कम है.

इतना ही नहीं, जानकारों की मानें तो गुजरात में कांग्रेस के पास मुख्यमंत्री पद के लिए कोई दमदार चेहरा भी नहीं है. खबरों के मुताबिक पार्टी अध्यक्ष भरत सिंह सोलंकी मुख्यमंत्री पद की दावेदारी को लेकर पहले ही इनकार कर चुके हैं. पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेताओं अर्जुन मोढवाड़िया और शक्ति सिंह गोहिल की पैठ अभी जनमानस में इतनी गहरी नहीं है कि उन्हें मुख्यमंत्री पद के लिए पेश किया जा सके. कांग्रेस के एक नेता कहते हैं, ‘प्रदेश में एक आम कार्यकर्ता असमंजस की स्थिति में है जिसका खामियाजा पार्टी को चुनावों में उठाना पड़ सकता है.’

तो कांग्रेस को क्या करना चाहिए?

जानकारों की मानें तो यदि कांग्रेस आने वाले चुनावों में किसी चमत्कार की उम्मीद रखती है तो उसे युद्ध स्तर पर मुहिम छेड़ने के साथ भाजपा के खिलाफ बड़ा जनाधार खड़ा करना होगा. विश्लेषक कहते हैं कि पार्टी को दिल्ली के बवाना उपचुनाव से सीख लेनी चाहिए जहां एमसीडी चुनावों में बड़ी हार के बाद आम आदमी पार्टी ने ग्राउंड लेवल पर लोगों से जुड़ना शुरु किया और भाजपा को पटखनी देने में सफल रही.

राजनीतिकारों के मुताबिक यदि कांग्रेस भी गुजरात में ऐसा ही करिश्मा चाहती है तो राहुल गांधी और अहमद पटेल समेत चुनाव प्रभारी अशोक गहलोत को चुनावों तक लगातार प्रदेश में ही मौजूद रहकर जमकर जमीनी मेहनत करनी होगी. लेकिन ऐसा नहीं होने की स्थिति में विश्लेषकों का कहना है कि कांग्रेस को गुजरात के विधानसभा चुनावों से कम ही उम्मीदें रखनी चाहिए.