बेंगलुरु सेंट्रल जेल की पूर्व डीआईजी डी रूपा ने कहा है कि आप जेल से निकलकर एआईएडीएमके विधायक बालाकृष्ण रेड्डी के घर गई थीं, क्या अब भी वहीं हैं?

रूपा से तो मैं बाद में निपट लूंगी. फिलहाल आप सिर्फ इंटरव्यू लीजिये, जांच-पड़ताल की कोशिश करेंगी तो मैं फोन काट दूंगी!...वैसे भी जब जेल प्रशासन और मुख्यमंत्री तक को इस बात से कोई ज्यादा मतलब नहीं कि मैं कहां हूं तो आपका कौन-सा काम है जो मेरी लोकेशन के कारण रुका हुआ है! (खीजते हुए)

ठीक है, मत बताइए. लेकिन यह तो बता सकती हैं कि आपकी पार्टी के दोनों गुटों, यानी मुख्यमंत्री ईके पलानिसामी (ईपीएस) और पूर्व मुख्यमंत्री पन्नीरसेल्वम (ओपीएस) के धड़ों का विलय कैसे हो गया?

पहले यह सवाल नीतीश जी से करिये, जिन्होंने इस तरह के यूटर्न लेने की परंपरा को आगे बढ़ाया है! अब्ब्ब...मेरा मतलब कि मैंने जेल में रहकर जो साहित्य पढ़ा, उसमें एक कहानी ‘संगठन में शक्ति’ की भी थी. तो मुझे नए सिरे से अहसास हुआ कि अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए विलय करने में ही समझदारी है.

मतलब कि ईपीएस और ओपीएस गुटों के विलय में आपकी भी सहमति है?

इसमें सिर्फ उन दोनों गद्दारों की सहमति है! अब्ब्ब...मेरा मतलब कि बिल्कुल पार्टी को मजबूत बनाने के लिए जो भी जरूरी होगा, हम करेंगे.

लेकिन सुनने में तो आ रहा है कि ओपीएस गुट ने आपको और आपके परिवार को पार्टी से निकालने की शर्त पर ही विलय किया है. इस बात में कितनी सच्चाई है?

मैं जेल से चुपचाप निकल सकती हूं, पर पार्टी से नहीं! अब्ब्ब...मेरा मतलब कि ये दोनों ‘पीएस’ मिलकर जो खिचड़ी पका रहे हैं, मैं उसमें इतना नमक मिला दूंगी कि दोनों में से कोई भी उसे नहीं खा सकेगा!...मेरा मतलब कि ये सब अफवाहें हैं, इन पर ध्यान देने की जरूरत नहीं है.

क्या ईपीएस और ओपीएस गुटों का विलय, आपके राजनीतिक करियर के लिए बाधा नहीं है?

जो मेरे लिए बाधा बनके खुश हो रहे हैं, अभी उन्हें अहसास ही नहीं है कि मैं उनके पूरे राजनीतिक करियर को बधिया कर दूंगी! अब्ब्ब...मेरा मतलब हम सबको एकसाथ मिलकर ही पार्टी में काम करना है. हम मिलकर सारे खतरों का सामना करेंगे.

आपके भतीजे और पार्टी के उप महासचिव टीटीवी दिनाकरन को तो पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है. ऐसा नहीं लगता कि अब आपकी बारी है?

देखिये, कब अंदर हूं, कब बाहर, यह बात सिर्फ मैं जानती हूं या जेल प्रशासन. और दिनाकरन तो अंदर ही नहीं गया तो उसे बाहर कैसे निकाला जा सकता है, अब्ब्ब...मेरा मतलब कि यह सब व्यर्थ की बातें हैं. वैसे भी मुख्यमंत्री पलानि ‘सामी’ हैं, ‘सूमो’ नहीं कि जिसे मर्जी चित करके उसके ऊपर बैठ जाएंगे!

मुख्यमंत्री ईपीएस आपकी बजाए पार्टी के दूसरे धड़े और पूर्व मुख्यमंत्री ओपीएस की ज्यादातर बातें मान रहे हैं. इस बात से आपको कोई खतरा तो महसूस नहीं हो रहा?

देखिये, राजनीति में खतरे बहुत तरह से आते हैं. कभी घर से, तो कभी बाहर से. कभी बात मान करके, तो कभी न मान करके भी. अब कांग्रेस को ही ले लीजिये, वहां इसी बात का खतरा है कि राहुल की बात और कब तक मानी जाती रहेगी. मतलब कि घर के मुखिया की बात मानना ही भारी पड़ रहा है न!... आपको पता है, एक समय जयललिता अपने गुरु एमजी रामचंद्रन के लिए खतरा बन गई थीं. मैं उसी इतने बड़े खतरे के साथ खेलकर, अब्ब्ब...मेरा मतलब अम्मा के साथ-साथ ही राजनीति में बड़ी हुई हूं. मुझे अपने विरोधियों को कुचलना, मेरा मतलब उनसे निपटना अच्छे से आता है. आपके बॉलीवुड में ‘खतरों का खिलाड़ी’ है, यहां दक्षिण भारत में ‘खतरों की खिलाड़ी’ है.

एआईएडीएमके का कई महीनों से चला आ रहा राजनीतिक संकट अंततः खत्म हो गया है. लेकिन इस विलय के बाद क्या ऐसा नहीं लग रहा कि ओपीएस तमिलनाडु के सबसे बड़े राजनीतिक नायक बनकर उभरेंगे?

देखिये, नायक कौन बनेगा यह ‘हम’ यानी मैं और दिनाकरन जैसे खलनायक तय करेंगे, अब्ब्ब...मेरा मतलब राजनीति में नायक और खलनायक में कोई फर्क नहीं होता. नायक-खलनायक का फर्क सिर्फ फिल्मों में होता है. राजनीति में तो जो सबसे बड़ा खलनायक, वही सबसे बड़ा नायक! ...और मुझे ओपीएस में बड़े खलनायक जैसी कोई बात नहीं दिखती. क्योंकि अतीत में वह भरत था और मेरे साथ उसने छोटी सी गद्दारी भर की है. ऐसी बातें साफ करती हैं कि उसमें बड़ा खलनायक बनने के लक्षण तो बिल्कुल ही नहीं है तो फिर वह सबसे बड़ा नायक भला कैसे बन सकता है!

ओपीएस की मांग पर मुख्यमंत्री ईपीएस ने जयललिता के निधन की जांच के लिए एक आयोग भी गठित कर दिया है. क्या आप इस आयोग के गठन से कुछ चिंतित नहीं हैं?

कैसी चिंता, यह आयोग अपने यहां ही काम करेगा ना, विदेश में तो नहीं. भारत में हर जांच आयोग मनमाफिक परिणाम देता है, बस आपको वो परिणाम लेने आना चाहिए! अब्ब्ब...मेरा मतलब मैं खुद चाहती हूं कि जांच करके उनकी मौत का सही कारण पता लगाया जाए ताकि यदि कोई दोषी हो तो उसे सजा दी जा सके.

आपकी पार्टी का चुनाव चिह्न (दो पत्तियां) तो चुनाव आयोग ने जब्त कर लिया है, उसे हासिल करने के लिए आप क्या करेंगी?

मैंने जेल में रहने के दौरान ‘तीन पत्ती’ के खेल में महारत हासिल कर ली है, फिर ‘दो पत्ती’ हासिल करना क्या बड़ी बात है! (हंसते हुए)

शशिकला जी, यह बताइये कि आप जयललिता और खुद में से किसे ज्यादा किस्मत वाला मानती हैं?

जयललिता को.

वह कैसे?

दो मामलों में उनकी किस्मत मुझसे ज्यादा अच्छी थी. एक वे जेल में भी रहीं और मुख्यमंत्री की कुर्सी पर भी बैठीं. पर मुझे तो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने से ठीक पहले जेल जाना पड़ा. अब पता नहीं वह दिन कब आएगा. दूसरा ये कि अम्मा को जेल में चैन से रहने देने के लिए एक ओपीएस मिल गया था, जिसने भरत की तरह मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली. लेकिन मेरे साथ आकर तो ओपीएस और ईपीएस दोनों ही गद्दार बन गए! पहले ओपीएस ने मुख्यमंत्री बनकर अपना रंग दिखाया, अब ये ईपीएस मुख्यमंत्री बनाने के बाद फिर उसी पनीर के टुकड़े, अब्ब्ब...मेरा मतलब पन्नीरसेल्वम से हाथ मिलाने के लिए मुझे पार्टी से निकालने तक की सोच रहा है. जेल में एक दिन भी मैं चैन से नहीं रह सकी और ऐसा सिर्फ ईपीएस की वजह से हुआ! (खीजते हुए)

एक अंतिम सवाल. डीआईजी रूपा ने आप पर जेल में विशेष सुविधा लेने के बदले, जेल अधिकारियों को दो करोड़ रुपये की रिश्वत देने का आरोप लगाया है. इसमें कितनी सच्चाई है?

लगता है जेल के बाकी अधिकारियों ने खुद ज्यादा खाने के चक्कर में रूपा को कम हिस्सा दिया, तभी उसका मूड खराब है! अब्ब्ब...मेरा मतलब कि यह आरोप पूरी तरह से बेबुनियाद है. रूपा ने तो ‘स्टाम्प पेपर घोटाले’ से जुड़े अब्दुल करीम तेलगी जैसे शरीफ व्यक्ति पर भी ऐसा ही आरोप लगाया था. कुछ लोग अपनी ईमानदारी का ढोल पीटकर ही नाम कमाना चाहते हैं. पर वे यह भूल जाते हैं कि भारत में सिर्फ एक अच्छा घोटाला करके जितना नाम कमाया जा सकता है, उतना अपनी ईमानदारी के कई उदाहरणों का डंका पीटकर भी नहीं कमाया जा सकता! मेरा मतलब है कि वे किसी बात से व्यथित होकर, जब-तब ऐसी बहकी-बहकी बातें करती रहती हैं.