विवादास्पद संत आसाराम एक नाबालिग पीड़िता से बलात्कार के दोषी साबित हो गए हैं. यह फैसला जोधपुर की एक अदालत ने सुनाया है. आसाराम समर्थकों द्वारा हंगामे की आशंका को देखते हुए जोधपुर में सुरक्षा बढ़ा दी गई है. शहर में धारा 144 लागू है. देश के कई राज्यों में हाई अलर्ट जारी किया गया है. बलात्कार पीड़िता के घर की सुरक्षा भी बढ़ाई गई है.

यह स्वाभाविक भी है. अतीत में इस तरह के मामलों में धर्मगुरुओं के खिलाफ फैसलों के बाद उनके समर्थकों ने खासा तांडव मचाया है. बीते साल बलात्कार का दोषी साबित होने पर जैसे ही गुरमीत राम रहीम को जेल हुई, उनके समर्थकों ने कोहराम मचा दिया. जगह-जगह हिंसा का तांडव हुआ जिसमें दर्जनों लोगों की जान चली गई. सैकड़ों गाड़ियां फूंक दी गईं, हजारों लोग कर्फ्यू से और लाखों लोग रेल व्यवस्थाएं ठप होने से प्रभावित हुए और करोड़ों रुपयों की सरकारी-गैर सरकारी संपत्ति आग के हवाले कर दी गई. इसके कुछ साल पहले हरियाणा में ही जब हत्या के आरोपित संत रामपाल की गिरफ्तारी हुई थी तो उनके समर्थक भी लगभग ऐसी ही हिंसा पर उतर आए थे.

अक्सर देखा गया है कि जब भी ऐसे स्वघोषित बाबाओं को जेल होती है तो उनकी मुक्ति के लिए वे लोग मरने-मारने पर उतर आते हैं, जो कभी खुद ‘मुक्ति’ पाने इन बाबाओं तक पहुचे थे. 2013 में जब एक नाबालिग बच्ची के यौन शोषण के आरोप में आसाराम को गिरफ्तार किया गया था तो तब भी ऐसा ही हुआ था. सैकड़ों की संख्या में जंतर-मंतर पहुंचे उन ‘भक्तों’ ने पत्रकारों के साथ मारपीट करके उनके कैमरे तक तोड़ दिए थे. महीनों तक ये भक्त जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करके आसाराम की रिहाई की मांग करते रहे. आज भी ये भक्त जमीन से लेकर सोशल मीडिया तक खूब सक्रिय हैं.

ऐसे स्वघोषित बाबाओं और घोषित अपराधियों के लिए लोगों में पागलपन की हद तक श्रद्धा भाव देखना हैरान करता है. सवाल उठता है कि आखिर इन बाबाओं में ऐसा क्या है कि लोग इनके लिए न तो किसी की जान लेने से हिचकते हैं और न ही अपनी जान देने से. क्यों लाखों लोग इन बाबाओं को भगवान मानने लगते हैं, उनके खिलाफ कुछ भी सुनने-समझने को तैयार नहीं होते और क्यों वे मानसिक रूप से बाबाओं के गुलाम बन जाते हैं? इन सवालों के जवाब मनोवैज्ञानिकों और मानव व्यवहार जैसे विषयों के विशेषज्ञों से समझते हैं.

‘इंस्टीट्यूट ऑफ़ ह्यूमन बिहेवियर एंड अलाइड साइंसेज’ (इहबास) के निदेशक डॉक्टर निमेश देसाई के मुताबिक अमूमन लोग अपनी आस्था के लिए कोई स्रोत तलाशते हैं. वे कहते हैं, ‘लोगों की इसी आस्था को ये संत और बाबा भुनाते हैं. इनकी शरण में जाने से व्यक्ति को यह भ्रम होने लगता है कि उसकी जिम्मेदारियां निभाने में कोई बाबा या दैवीय शक्ति उसके साथ है. ऐसे में अगर उसके जीवन में कुछ भी अच्छा होता है तो वह व्यक्ति इसे बाबा का आशीर्वाद समझता है और हमेशा के लिए उसका भक्त बन जाता है.’

‘चमत्कार’ को नमस्कार

चमत्कार को नमस्कार करने की बहुत पुरानी परंपरा है. अधिकतर बाबा इसी परंपरा का फायदा उठाते हैं और अपने धंधे की शुरुआत छोटे-मोटे चमत्कार या हाथ की सफाई दिखाकर करते हैं. दक्षिण भारत के सत्य साईं बाबा तो ऐसी हाथ की सफाई के लिए खूब चर्चित थे. कभी हवा में से राख तो कभी सोने की चेन निकालकर उन्होंने करोड़ों भक्त और अरबों रुपये कमाए. कुछ साल पहले जब उनकी मौत हुई तो लगभग 12 करोड़ रुपये नकद, 98 किलो सोना और 307 किलो चांदी तो सिर्फ उनके निजी कमरे से ही बरामद हुआ था.

इस तरह के बाबाओं की पोल खोलने के लिए कुछ प्रगतिशील संस्थाएं और उनसे जुड़े लोग अपनी जान जोखिम में डालकर भी काम कर रहे हैं. महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति भी ऐसी ही एक संस्था है. इसकी स्थापना साल 1989 में नरेंद्र दाभोलकर ने की थी. लेकिन ढोंगी संतों और बाबाओं का पर्दाफाश करने की कीमत उन्हें अपनी जान गंवाकर चुकानी पड़ी. 2013 में कुछ लोगों ने उनकी गोली मारकर हत्या कर दी थी.

नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के बाद भी उनकी संस्था लगातार अंधविश्वास के खिलाफ कार्यरत है. इस संस्था के उपाध्यक्ष डॉक्टर प्रदीप पाटकर कहते हैं, ‘जादू के प्रति इंसान में एक स्वाभाविक उत्सुकता होती है. जब किसी जादू या हाथ की सफाई को धर्म या भगवान से जोड़कर पेश किया जाए तब तो लोग और भी आसानी से प्रभावित हो जाते हैं.’ हाथ की सफाई दिखाकर गांव-कस्बों में कई साधु-बाबा धर्म का धंधा चला रहे हैं लेकिन ऐसे बाबाओं को प्रदीप पाटकर समाज के लिए ज्यादा घातक नहीं मानते. वह इसलिए कि ऐसे बाबाओं के पास लोग अपनी समस्या के सीधे समाधान के लिए पहुंचते हैं और बेवकूफ बनकर लौट जाते हैं. प्रदीप के अनुसार सबसे घातक वे बाबा हैं जो लोगों को उनके पूरे जीवन भर के लिए अपना मानसिक गुलाम बना लेते हैं.

इस तरह के बाबाओं के अक्सर बेहद आलीशान और भव्य आश्रम होते हैं. इन आश्रमों में चारों तरफ बाबा के जयकारे गूंज रहे होते हैं, लोग बाबा के ध्यान में लीन होते हैं, बाबा का गुणगान करते भजन आश्रम में बज रहे होते हैं और फूल मालाओं से लदी बाबा की तस्वीरें जगह-जगह लगी होती हैं. यह माहौल इतना भव्य होता है कि यहां आने वाला लगभग हर व्यक्ति इससे प्रभावित जरूर होता है. डॉक्टर प्रदीप बताते हैं, ‘ऐसे बाबाओं से पहली मुलाकात में या इन भव्य आश्रमों में पहली बार जाने पर अक्सर लोगों को एक सुखद अनुभव होता है. यह पूरी तरह से एक मनोवैज्ञानिक भ्रम के चलते होता है. जैसे देशभक्ति की कोई फिल्म या वाघा बॉर्डर पर परेड देखते हुए किसी भी व्यक्ति में देशभक्ति का भाव जाग उठता है ठीक उसी तरह इन आश्रमों में भी होता है.’

भव्य आश्रमों में रहने वाले ऐसे बाबाओं के अधिकतर भक्त स्थायी होते हैं. दिलचस्प यह भी है कि इन भक्तों में अधिकतर लोग पढ़े-लिखे और आर्थिक रूप से संपन्न होते हैं. डॉक्टर प्रदीप बताते हैं कि असुरक्षा का भाव लोगों को आसानी से बाबाओं तक पहुंचा देता है. जिन लोगों में कुछ खोने का भाव होता है उनकी निर्भरता ऐसे बाबाओं पर सबसे ज्यादा होती है. यह भी मजेदार है कि देश का सबसे कम पढ़ा-लिखा वर्ग, जो दिन में बमुश्किल दो वक्त की रोटी का इंतजाम कर पाता है और संभवतः सबसे ज्यादा तकलीफ झेलता है, वह वर्ग किसी भी तरह के बाबाओं से बेहद दूर है.

धर्म, योग, अध्यात्म और कई बार भगवान का ही प्रतीक बन चुके इन बाबाओं को नजदीक से समझने वाले मानते हैं कि ये लोग बेहद सुनियोजित तरीके से अपना कारोबार चलाते हैं. इसके लिए सबसे पहले लोगों को खुद से जोड़ना होता है, फिर उन्हें जोड़े रखने के प्रयास होते हैं, धीरे-धीरे उन्हें खुद पर आश्रित बनाया जाता है और अंत में इस हद तक अपने वश में करना होता है कि वे मानसिक गुलामों की तरह व्यवहार करने लगें. ठीक वैसे ही जैसे राम रहीम के भक्तों ने हाल के दिनों में किया.

लोग बाबाओं से जुड़ते कैसे हैं?

मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि परेशान और निराश लोग सबसे जल्दी और सबसे आसानी से बाबाओं की ओर आकर्षित होते हैं. डॉक्टर पाटकर बताते हैं, ‘परेशानी के समय लोगों की चेतना और तर्क शक्ति कमज़ोर हो जाती है और लोग त्वरित समाधान खोजने लगते हैं. इसका फायदा ये बाबा लोग उठा ले जाते हैं.’ हर बड़े बाबा का एक पूरा तंत्र होता है जो लोगों को जोड़ने का काम करता है. यह तंत्र बाबाओं को ही लोगों की परेशानी के एकमात्र समाधान के रूप में पेश करने का काम करता है. नाम न छपने की शर्त पर एक विज्ञापन कंपनी के निदेशक बताते हैं कि जितना पैसा उनकी कंपनी को धर्मगुरुओं के लिए विज्ञापन बनाने का मिलता है, उतना बड़ी-बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियों से भी उन्हें नहीं मिलता.

टीवी से लेकर इंटरनेट तक में इन धर्मगुरुओं और बाबाओं के कई तरह के विज्ञापन आते हैं. कभी समागम के नाम पर तो कभी प्रवचनों के सीधे प्रसारण के लिए चैनलों को मोटी रकम ये बाबा चुकाते हैं. लेकिन आम दर्शक ये नहीं समझ पाते कि ये प्रसारण बाबाओं के प्रचार का हिस्सा है. वे इन समागमों में मौजूद लोगों की बातों से प्रभावित होते हैं जिनमें अधिकतर अपने अनुभव बताने वाले बाबाओं के ही लोग होते हैं. इसके अलावा लगभग सभी बड़े बाबाओं की अपनी वेबसाइट भी हैं. इन वेबसाइट्स पर भी लोगों के ‘चमत्कारिक’ अनुभवों की कोई कमी नहीं है. इनमें से अधिकतर अनुभव फर्जी होते हैं और वेबसाइट चलाने वाले बाबाओं के लोगों द्वारा ही लिखे जाते हैं. आसाराम की वेबसाइट पर भी ऐसे ढेरों फर्जी अनुभव आसानी से पकडे जा सकते हैं. इन अनुभवों को जिस मेलआईडी का दर्शाया गया है, वे आईडी ही फर्जी हैं.

कई लोग इन बाबाओं से अपने मुनाफे के लिए भी जुड़ते हैं. मसलन होटल या रिसॉर्ट मालिक. अधिकतर बड़े धर्मगुरु और बाबा जब भी किसी दूसरे शहर में जाते हैं तो बड़े होटलों में रहने के लिए पैसे देते नहीं बल्कि लेते हैं. कुछ साल पहले जब बाबा रामदेव उत्तराखंड के हल्द्वानी शहर गए थे तो वहां होटल मालिकों ने उन्हें ठहराने के लिए बोलियां लगाई थीं. लगभग सभी बड़े बाबाओं के जनसंपर्क अधिकारी होते हैं जो होटल मालिकों से डील करते हैं. बाबाओं के ठहरने से होटल को प्रचार तो मिलता ही है साथ ही बाबाओं के पुराने भक्त स्वतः ही फिर उसी होटल में ठहरना चाहते हैं जहां उनके आराध्य ठहरते हैं. होटल मालिक भी ऐसे बाबाओं की तस्वीरें भी अपने होटल में लगाते हैं जो वहां ठहरे हों, इससे होटल का भी प्रचार होता है और बाबाओं का भी. इसी तरह कई अन्य व्यापारी भी बाबाओं से अपने मुनाफे के लिए जुड़ते हैं और लोगों की कड़ी लगातार बढती जाती है.

नेता और जनप्रतिनिधि भी बाबाओं का दायरा बढ़ाने में अहम् भूमिका निभाते हैं. बाबाओं के पास भक्तों की जो ताकत होती है वह एक बड़ा वोट-बैंक भी होता है इसलिए नेता इनसे अच्छे संबंध बनाए रखते हैं. गुरमीत राम रहीम का ही उदाहरण लें तो हरियाणा के मुख्यमंत्री से लेकर तमाम अन्य मंत्री उनके आगे लगातार नतमस्तक रहते थे. इसी तरह आसाराम, श्री श्री रविशंकर, बाबा रामदेव, तरुण मुनि और अन्य कई बड़े बाबा पूरी तरह से राजनीतिक संरक्षण में रहते हैं. मध्यप्रदेश में तो एक बार उमा भारती ने मुख्यमंत्री रहते हुए विधानसभा के अंदर आसाराम के प्रवचन करवाए थे और पूरे मंत्रिमंडल के साथ ही सत्ता पक्ष के सभी विधायकों के लिए यह प्रवचन सुनना अनिवार्य था. ऐसा ही पिछले साल हरियाणा में भी हुआ जहां तरुण सागर को विधान सभा अध्यक्ष से भी ऊंचे आसन पर बैठाकर प्रवचन करवाए गए.

नेता बाबाओं से अपना राजनीतिक लाभ लेते हैं तो बदले में बाबाओं को भी कई फायदे मिलते हैं. औने-पौने दामों में सरकारी जमीनों से लेकर वीआईपी सुरक्षा तक बाबाओं को सबकुछ मिलता है. साथ ही अपने नेता को बाबाओं के आगे नतमस्तक देख कर नए लोग भी इन बाबाओं से जुड़ते हैं और इनका दायरा और बड़ा होता चला जाता है.

क्यों बाबाओं के अपराधी साबित होने पर भी भक्त उन पर कोई सवाल नहीं उठाते?

जहां आस्था होती है वहां तर्कों की गुंजाइश नहीं होती. इस बात का बाबाओं के आश्रम में जमकर फायदा उठाया जाता है. अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति से जुड़े लोग बताते हैं कि बाबाओं के आश्रम में जो पहली शिक्षा भक्तों को दी जाती है वह यही होती है कि ‘बाबा जी पर सच्ची श्रद्धा से विश्वास करो.’ उन्हें सच्चा भक्त होने के यही गुण बताए जाते हैं कि गुरूजी की कही हर बात का पालन करो.

जब आसाराम को जेल हुई थी तो उनके आश्रम ने बाकायदा पर्चे छपवाकर भक्तों को बंटवाए थे जिनमें लिखा था, ‘गुरु की निंदा सुनने से भी गोहत्या का पाप लगता है - रामचरित मानस.’ आसाराम का वह प्रवचन भी उन दिनों उनकी वेबसाइट पर प्रमुखता से दिखाया जा रहा था जिसमें वे बता रहे थे कि भक्तों को कभी अपने गुरु की निंदा न तो करनी चाहिए और न ही सुननी चाहिए. लगभग ऐसा ही सभी बाबा अपने भक्तों को बताते हैं.

कई बार भक्तों को यह कहकर भी बहकाया जाता है कि कुछ विदेशी या दूसरे धर्म के लोग बाबाओं के खिलाफ साजिश कर रहे हैं. उन्हें बताया जाता है कि अगर ऐसे लोग कामयाब हो गए तो अधार्मिक और विदेशी ताकतें हावी हो जाएंगी इसलिए बाबा पर विश्वास बनाए रखें. आसाराम से लेकर गुरमीत राम रहीम तक जो भी बाबा जेल गए, उनके भक्त आज भी इसे साजिश के तौर पर ही देखते हैं. बल्कि अब दूसरे लोगों के साथ अपने बाबाओं की चर्चा में इन भक्तों का जोर ही साजिश की बात पर होता है.

कई सालों तक बाबाओं की भक्ति में पूरी तन्मयता से विश्वास करने वाले ये लोग कभी स्वीकार नहीं कर पाते कि उनके बाबा कुछ बुरा या गलत कर सकते हैं. दूसरा, बाबाओं पर भक्तों की आस्था ऐसी होती है कि वे उन्हें किसी आम इंसान की तरह नहीं बल्कि किसी दिव्य पुरुष की तरह देखते हैं. ऐसे भक्तों के लिए ये बाबा धर्म और कभी-कभी भगवान का ही पर्यायवाची बन जाते हैं. इसलिए वे बाबाओं के आगे कानून या न्याय व्यवस्था की कोई अहमियत नहीं समझते और बाबाओं के लिए अपनी जान तक देने को अपना सौभाग्य ही समझते हैं. बिलकुल वैसे ही जैसे धर्म के नाम पर कई लोग आत्मघाती हमलावर तक बन जाते हैं.

लोगों में वैज्ञानिक चेतना की भारी कमी भी इन बाबाओं के मजबूत होने का एक अहम कारण है. जिस देश के सांसद तक लोक सभा में देश के चिकित्सा विज्ञान का इतिहास बताते हुए पूरे आत्मविश्वास से कह सकते हैं कि हमारे यहां गणेश भगवान को सर्जरी के जरिए हाथी का सिर लगाया गया था, उस देश में बाबाओं के लिए ऐसा पागलपन समझ से परे नहीं है.