रामकृष्ण परमहंस के जीवन की एक घटना है. राजसी खानदान की कोई महिला उनसे मिलने गई. रामकृष्ण नदी किनारे बैठे थे. महिला ने उन्हें प्रणाम करते हुए अपने सोने के कंगन उन्हें भेंटस्वरूप दिए. रामकृष्ण ने कंगन इस हाथ से लेकर उस हाथ से नदी में बहा दिए.

महिला को लगा कि शायद रामकृष्ण को यह उपहार पसंद नहीं आया. वह एक-एक कर अपनी हीरे की अंगूठियां और मोतियों की माला उन्हें देती गई और रामकृष्ण उन्हें नदी में फेंकते गए. महिला इसे समझ नहीं पाई और अत्यंत दुखी हो गई. रामकृष्ण ने उसे समझाते हुए कहा कि ये हीरे-जवाहरात तुम्हारे लिए महत्व की चीज हो सकती हैं, लेकिन मेरे लिए मिट्टी ही है. इसलिए मैंने उन्हें वापस मिट्टी में ही डाल दिया.

इस घटना के वर्णन में अतिशयोक्ति भी हो सकती है, लेकिन वास्तविक संतों का जीवन ऐसा ही होता था. पिछले वाक्य के अंत में ‘था’ लिखते हुए एक निराशा की अनुभूति होती है. क्योंकि चिन्मयानंद, रामपाल, गुरुमीत राम रहीम या आसाराम जैसे मामलों के बाद यह सवाल सहज ही उठने लगा है कि पता नहीं आज हमारे बीच ऐसे सच्चे संत कहीं मौजूद भी हैं या नहीं!

हमारे सामाजिक विकास में संतों का प्रभाव इस कदर रहा कि आज भी दुनिया के भौगोलिक हिस्सों को संतों के नाम से पहचाना जा सकता है. यूनान का नाम लेते ही सुकरात ध्यान में आते हैं. लाओत्से और कन्फ्यूशियस का नाम लेते ही चीन की महान आध्यात्मिक सभ्यता जेहन में आ जाती है. मोहम्मद और जीसस का नाम लेते ही अरब और फिलस्तीन की वह तस्वीर सामने आती है, जहां के रेगिस्तानों में वे कभी नंगे पैर चले होंगे. रूमी का नाम लेते ही फारस और ईरान याद आता है.

और भारत का तो कहना ही क्या. यहां की आध्यात्मिक जमीन तो इतनी उर्वर थी कि उपनिषद् के ऋषियों से लेकर बुद्ध, महावीर, शंकराचार्य, तिरुवल्लुवर, कबीर, रैदास और नानक और उनके बाद तक संतों और फकीरों ने यहां के समाज को समय-समय पर सच्चे मानवीय जीवन की राह दिखाई. अंडाल से लेकर अक्का महादेवी, मीरा और राबिया तक महिला संतों की भी एक समृद्ध परंपरा रही. वास्तव में आज भी दुनियाभर में लोकमानस पर इतना अधिक प्रभाव किन्हीं शासकों, अमीरों और भौतिक विज्ञानियों का भी नहीं दिखाई देता, जितना इन संतों का दिखाई देता है.

आश्चर्य हो सकता है कि जिस युग में लेखन, प्रसारण और प्रचार के इतने माध्यम उपलब्ध नहीं थे, उस युग से लेकर आज तक ऐसे ऋषियों और संतों की वाणी दुनियाभर में गूंज रही है. राजा से लेकर भिखारी तक और अमीर से लेकर गरीब तक के मन में इन संतों के प्रति एकसमान श्रद्धा और भक्ति कायम रही है. लेकिन इन संतों ने स्वयं अपना पंथ नहीं चलाया. पंथ इनके बाद चले, इनके नाम पर चले. पंथों ने शुरू-शुरू में लोगों को इन विचारों के आधार पर एकजुट करने का काम किया. इन संतों की वाणियों को भी अगली पीढ़ियों के लिए संग्रहित करने और लिखकर रखने का काम किया.

हालांकि इस प्रक्रिया में संतों की मूल वाणियों में घालमेल भी स्वाभाविक रूप से हुआ होगा. क्योंकि जरूरी नहीं कि अनुयायियों और चेलों के द्वारा सहेजी जानेवाली वाणियों में भी संतों की अनुभूतियां ज्यों की त्यों उतर ही पाई हों. हालांकि संतों के सरल शब्द जीवन की सच्चाइयों के इतने करीब होते थे कि वे लौकिक मुहावरों से लेकर गीत और भजन के रूप में पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों की जुबान पर बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के ही चढ़ते गए. तमाम वैज्ञानिक उपलब्धियों और जीवन शैली में सभी तरह के बदलावों के बावजूद सैकड़ों वर्षों से संतों की वाणी हमारे हृदय पर राज करती आई है.

आजकल संत-महात्माओं का उदय कैसे होता है?

तकनीकी सुविधाओं और भौतिक संरचनाओं के विकास के बावजूद हमारा पारिवारिक और सामाजिक जीवन जटिल से जटिलतर होता गया है. तमाम तरह की व्यक्तिगत, सामाजिक, मानसिक और नैतिक समस्याओं में घिरे व्यक्तियों और समुदायों को जब अपनी समस्याओं का समाधान कहीं और नहीं मिल पाता, तो उनके मन में अस्तित्ववादी सवाल उठने लगते हैं. इन प्रश्नों का जवाब हमारी पाठ्य-पुस्तकों में नहीं होता. उपन्यास, कहानियां, कविताएं या अन्य विचारधारात्मक साहित्य भी हमारे जीवन की पहेलियों को समझने में सहायक तो हो सकती हैं, लेकिन वे भी जनसामान्य को स्पष्ट और ठीक-ठीक समाधान नहीं दे पाती हैं. फिर इन तक सबकी पहुंच भी नहीं होती.

ऐसी परिस्थिति में कुछ ऐसी वैकल्पिक संभावनाएं बचती हैं जो शहरी-ग्रामीण, साक्षर-निरक्षर सबके लिए सुलभ और एकसमान लागू होने वाली हों. पहली संभावना यह कि वे किसी ऐसे ईश्वर को अपनी पूजा-अर्चना, मान-मनौती, चढ़ावा-प्रसाद से प्रसन्न कर दें, जो इन चढ़ावों या टोने-टोटकों से खुश होकर उनकी हर छोटी-बड़ी मनौतियों को पूरा करता हो. ऐसे में पादरी-पुरोहित से लेकर जंतरिया-मंतरिया तक ऐसे ईश्वर के प्रतिनिधि या बिचौलिये के रूप में उभरते हैं, जो खुद दान-दक्षिणा लेकर ऐसे ईश्वर से अपने यजमानों की सिफारिश करते हैं. ऐसे यजमानों के जीवन पर ऐसे पंडे-पुरोहितों का प्रभाव सहज ही समझा जा सकता है.

दूसरी संभावना यह होती है कि कोई व्यक्ति या समुदाय पूरी तरह से भाग्यवादी हो जाए. प्रायः हमारे अतीत के दुख, वर्तमान की निराशा और भविष्य की असुरक्षा और भय हमें भाग्यवादी बनाते हैं. जो होगा देखा जाएगा, क्योंकि जो होना है, वह होके रहेगा. अपने से धनवान और शक्तिशालियों को वे ‘मुकद्दर का सिकंदर’ मानकर संतोष करते हैं. ध्यान रहे कि ऐसा व्यक्ति या समुदाय अधपका नास्तिक भी हो सकता है या किसी मूर्त-अमूर्त ईश्वर के साथ या उसके बजाय किन्हीं ग्रह-नक्षत्र या कुंडली और राशि को माननेवाला भी हो सकता है.

इस विद्या के वैज्ञानिक होने या न होने की बहस में न जाते हुए भी हम इतना तो देख ही सकते हैं कि मनोवैज्ञानिक रूप से यह विकल्प मनुष्य को तात्कालिक राहत देता है. इसमें भविष्य के लिए एक झूठी-सच्ची उम्मीद बंधती है. लेकिन यहां भी एक खतरा होता है कि हम अपनी जीवन-परिस्थितियों या आदतों-प्रवृत्तियों में अपनी मेहनत से ठोस परिवर्तन करने के बजाय किसी ज्योतिषी या रत्नों-अंगूठियों के चक्कर में पड़ जाएं. कोर्ट-कचहरियों के पास सरसों के तेल पात्र में डूबे शनिदेव पर सिक्का लुटाते या काले घोड़े की नाल की नकली अंगूठी खरीदनेवालों की भीड़ देखकर हम इसका अंदाजा सहज ही लगा सकते हैं.

एक और वैकल्पिक संभावना होती है कि वह किसी ऐसे राजनीतिक नेतृत्व को मसीहा के रूप में देखने लगे जो सत्ता में आते ही उसकी सारी समस्याओं का समाधान कर देगा. वह नेतृत्व उस व्यक्ति या समुदाय की कच्ची-पक्की विचारधारा के भी प्रतिनिधित्व करने का संतोष दिलाने वाला हो सकता है. उस नेतृत्व के साथ व्यक्ति या समुदाय की निजी और स्वार्थपूर्ण राजनीतिक आकांक्षाएं भी जुड़ी हुई हो सकती हैं. ऐसा राजनीतिक नेतृत्व लोकतांत्रिक भी हो सकता है, तानाशाह भी या सैन्य-शक्ति के जरिए सुरक्षा और स्थिरता का एहसास दिलानेवाला भी हो सकता है.

एक और विकल्प होता है कि संबंधित व्यक्ति या समुदाय किन्हीं धन्ना सेठों या राज्येतर संस्थाओं के बारे में ऐसा समझने लगे कि वे आर्थिक सहयोग देकर उनकी सारी समस्याओं का समाधान कर देंगे. कोई सीएसआर फंड, कोई ट्रस्ट या कोई फाउंडेशन इसी तरह समाज में अपना प्रभाव छोड़ने का प्रयास करते हैं. वे स्कूल चलाते हैं, अस्पताल चलाते हैं, रोजगार के कौशल और अवसर पैदा करते हैं. इनके प्रति लोगों की निष्ठा भी कुछ हद तक कायम होती है. लेकिन यह निष्ठा भी तात्कालिक और सीमित ही होती है. क्योंकि इस तरह का कोई भी प्रयास किसी भी समुदाय के सभी जरूरतों और आकांक्षाओं की पूर्ति पूरी तरह से और हमेशा के लिए नहीं करता रह सकता.

अब इन सभी वैकल्पिक संभावनाओं के अंत में क्या होता है? ईश्वर का कोई कथित प्रतिनिधि या बिचौलिया, कोई ज्योतिषी, कोई राजनेता, कोई धन्ना सेठ या राज्येतर संस्था उस व्यक्ति या समुदाय को एक सीमा तक भौतिक और मानसिक संतुष्टि भले ही प्रदान कर देता हो, लेकिन वह संतुष्टि होती तो क्षणिक ही है. इनकी स्वीकार्यता भी सभी समुदायों में एकसमान रूप से नहीं बन पाती. फिर वे उनकी अस्तित्ववादी जिज्ञासाओं का समाधान भी नहीं दे पाते. जरूरी नहीं कि कोई व्यक्ति या समुदाय सचेत रूप से उपरोक्त सभी वैकल्पिक संभावनाओं को एक-एक करके आजमाए. वह अपने परिवेश, पृष्ठभूमि और परिस्थितियों के हिसाब से इनमें से सब कुछ थोड़ा-थोड़ा होता है. वह अपनी समृद्धि, सुरक्षा और शांति के लिए इन सभी विकल्पों को एक साथ और अनायास ही आजमाते हुए चलता है.

ऐसी ही परिस्थितियों में सामान्य लोगों के मनोविज्ञान और सामाजिक-राजनीतिक आकांक्षाओं को समझने वाले कुछ ऐसे व्यक्तित्व उभर आते हैं, जो उपरोक्त सभी वैकल्पिक संभावनाओं का मिश्रित रूप या क्लोन होते हैं. जैसे वह ईश्वर का प्रतिनिधि या स्वयं ईश्वर होने का दावा करने वाला होगा. साथ ही वह अपने अनुयायियों के संख्याबल की सौदेबाजी के जरिए राजनीतिक सत्ता के साथ सांठ-गांठ करनेवाला और इस तरह अपने अनुयायियों को राजनीतिक सुरक्षा प्रदान करनेवाला व्यक्ति भी होगा. वह विभिन्न नैतिक-अनैतिक स्रोतों से धन जुटाकर स्कूल, अस्पताल और लंगर-भंडारा चलाने वाला व्यक्ति भी होगा. इसके साथ ही वह आध्यात्मिक ज्ञान के सामान्य और अधकचरे बोल-वचन यहां-वहां जोड़कर लोगों के अस्तित्ववादी प्रश्नों का समाधान करने वाला भी होगा.

अमीर-गरीब, कथित सवर्ण-अवर्ण, स्त्री-पुरुष सभी प्रकार के भक्तों को एकसाथ लाकर वह सबको छद्म-समानता का एहसास देनेवाला व्यक्ति भी होगा. कुल मिलाकर वह सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक प्रतिस्पर्धा में किसी न किसी रूप में असंतुष्ट व्यक्तियों और समुदायों को किसी न किसी प्रकार की संतुष्टि प्रदान करने वाला मसीहाई व्यक्तित्व होगा. साथ ही वह ऊपरी तौर पर एक तरह के अंधविश्वास का विरोध करनेवाला, लेकिन किसी दूसरे प्रकार के अंधविश्वास को प्रचलित करने वाला भी होगा. हम दिनोंदिन जितना अधिक जटिलतर सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक संरचनाओं में घिरते जा रहे हैं, उतना ही ऐसे लोगों की मांग भी बढ़ती जाती है. धनशाली और सत्ताधारी वर्ग कई बार जानबूझकर अपने राजनीतिक और आर्थिक स्वार्थ साधने के लिए, तो कई बार स्वयं अंधविश्वास का शिकार होकर ऐसे बाबाओं के शरणागत होता है.

सच्चे संत तो आज भी होंगे, लेकिन उनकी पहचान कैसे हो?

वर्तमान में नकली बाबाओं की भरमार होने और उनका असली रूप प्रकट होते जाने से एक तो यह संभावना बनती है कि देर-सवेर समाज को अंधविश्वासों से छुटकारा मिल सकता है. लेकिन दूसरी तरफ यह आशंका भी उत्पन्न होती है कि इससे सच्चे संतों के प्रति भी समाज में अश्रद्धा उत्पन्न हो जाए. नई पीढ़ियां यह सवाल सहज ही उठा सकती हैं कि सच्चे संत वास्तव में संभव हो भी सकते हैं क्या? अध्यात्म या जीवन-विद्या का वास्तव में कोई वैज्ञानिक आधार हो भी सकता है क्या? ये सवाल स्वाभाविक भी हैं और जरूरी भी. भारतीय परंपरा में ‘श्रद्धा’ का अर्थ बताया गया है- ‘श्रत्+धा’ यानी सत्य को धारण करना. सत्य को अपने अनुभवों की कसौटी पर कसते हुए धारण करना श्रद्धा है. वह किसी व्यक्ति के प्रति न हो, वह उस विचार के प्रति हो या उस तत्व के प्रति हो जिसे तात्कालिक रूप से उस विचार को धारण करनेवाले प्रतिनिधि चरित्र ने अपनी अनुभूतियों के जरिए जाना है.

ऐसे व्यक्ति होते रहे हैं जो अध्यात्म-साधना की कसौटियों पर अपने जीवन को कसते हैं. उन्हें जीवन और प्रकृति के सत्य की साक्षात अनुभूति होती है. वे धन, सत्ता, वासना जैसे सांसारिक लोभों में नहीं पड़ते. वास्तविक शांति के लिए इसकी व्यर्थता को वे समझ जाते हैं. ऐसे लोग ही कर्म सिद्धांत या प्रकृति में कार्य-कारण के शाश्वत नियम जैसे वैज्ञानिक और अनुभूत सिद्धांत को सत्य साबित करने वाले होते हैं. वे उन विचारों के प्रतिनिधि चरित्र मात्र होते हैं. इसलिए वे हमारे अपने शरीर और मन की आदतों और प्रवृत्तियों को बदलने और आत्मानुशासित करने पर जोर देते हैं. वे मनुष्य-मनुष्य के बीच समानता और प्रेम पर जोर देते हैं, स्त्री और पुरुष के बीच अभेद पर जोर देते हैं. वे संयम यानी भौतिक या प्राकृतिक संसाधनों के कम इस्तेमाल पर जोर देते हैं, मन की बेलगाम महत्वाकांक्षाओं को समझकर उसे सीमित करने पर जोर देते हैं. साथ ही वे शांति का देखा-परखा मार्ग बताते हैं.

ऐसे लोग अपने इन सिद्धांतों को अपने वास्तविक जीवन में भी जीते हैं. यानी वे धनसंग्रह नहीं करते. वे राजनीतिक सत्ता से प्रभावित नहीं होते, इसलिए किसी दल के समर्थन और विरोध में भी नहीं पड़ते. वे निर्भय, निर्वैर और निष्पक्ष होते हैं. क्रोध या कामवासना परेशान उन्हें भी करती है, लेकिन वे उन्हें अपने ऊपर हावी नहीं होने देते और यह उनके आचरण में झलकता है. समाज इन्हें ही संत कहकर पुकारता है. सामान्य लोग मानने लगते हैं कि अपने मन पर काबू पा लेना वास्तव में एक असाधारण उपलब्धि है और इसलिए वह संत श्रद्धा का पात्र है. हालांकि ऐसे संतों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनके पास चेलों की भीड़ और श्रद्धालु भक्तों की फौज है या नहीं. वे गुमनाम भी हो सकते हैं. वास्तव में उनकी यह गुमनामी या उनका सामान्य जीवन ही उनके सच्चे संत होने का प्रमाण भी हो सकती है.

कबीर आजीवन जुलाहे का काम करते रहे. नानक ने भी खेती नहीं छोड़ी. नामदेव ने रंगरेज का काम किया, सैन तो नाई ही रहे और रैदास ने चर्मकार का कार्य करते हुए संतत्व को प्राप्त किया. बुद्ध ने तो राजपाट ही छोड़ दिया और भिक्षा में जो भी मिला उसी से आजीवन गुजारा किया. राजनीतिक पृष्ठभूमि के लाओत्से और माणिक्कवाचकर ने हमेशा के लिए सत्ता की राजनीति से दूरी बरत ली और बाद में उन्हें अपने पास तक नहीं फटकने दिया. राजपाट तो मीरा ने भी छोड़ दिया. किन्हीं कुम्भनदास ने तो ‘संतन को कहां सीकरी सों काम’ का उद्घोष कर दिया. और तुलसीदास ने कह दिया कि ‘मांगि के खाइबो, मसीति में सोइबो, लेबे के एक न देबे को दोऊ’. सुकरात ने तो सत्य की खातिर जहर पीने तक से गुरेज न किया. इनमें से जो पुरुष या नारी संत ब्रह्मचारी हुए, उन्होंने भी परीक्षा की घड़ी में अपनी कामवासना को संभाले रखा. और जो गृहस्थ थे उन्होंने मध्यमार्ग अपनाकर शरीरधर्म का निर्वाह किया और संतति पैदा की, लेकिन संयम नहीं खोया. उनके मन, वचन और कर्म में एकरूपता रही. उनका जीवन असाधारण रूप से सादा और सरल रहा.

इसलिए आज भले ही हमारे बीच सच्चे संतों का घोर अकाल हो चला हो, और सामाजिक-राजनीतिक जटिलताओं और असुरक्षाओं की वजह से अंध-श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ती जा रही हो, ऐसे समय में भी हमें संतत्वमात्र के प्रति अश्रद्धा के प्रचार से बचना होगा. अंध-श्रद्धा का जवाब प्रतिक्रियावादी अंध-अश्रद्धा नहीं हो सकती. धान की भूसी के साथ-साथ चावल भी फेंकने की मूर्खता से हमें बचना होगा. अपने ज्ञानचक्षु खुले रखने होंगे, ताकि हम सच्चे और झूठे की पहचान कर सकें. सच्चे संतों को पहचानने का एक आसान तरीका यह जानना भी हो सकता है कि उस कथित स्वघोषित संत का धन के प्रति, अन्य संप्रदायों के प्रति और राजनीतिक सत्ता के प्रति रवैया क्या है. उसकी निजी जीवन-शैली भर से उसकी निर्भयता, निर्वैरता, निष्पक्षता, निष्कलुषता, और निर्भोलता का पता कर लेना कोई मुश्किल काम नहीं है.

और न हो तो बीजक में संकलित स्वयं कबीरदास की इस रमैनी की कसौटी पर उन्हें कस लें-

कब दत्ते मावासी तोरी। कब शुकदेव तोपची जोरी।।

नारद कब बंदूक चलाया। ब्यासदेव कब बम्ब बजाया।।

करहिं लराई मति के मन्दा। ई अतीत की तरकसबन्दा।।

भये विरक्त लोभ मन ठाना। सोना पहिरि लजावैं बाना।।

घोरा घोरी कीन्ह बटोरा। गांव पाय जस चले करोरा।।

सुन्दरी न सोहै, सनकादिक के साथ। कबहुंक दाग लगावै, कारी हांड़ी हाथ।।

कबीर ने यह रमैनी पुरुष संतों के लिए कहा था. इसलिए ‘सुन्दरी’ से बचने के लिए कहा था. स्त्री-पुरुष की भावनाओं से परे उनके सच्चे निहितार्थ को समझते हुए जेंडर के प्रति संवेदनशील लोग इस रमैनी के अंतिम पद में महिला संतों के संदर्भ में ‘सुन्दरी’ के स्थान पर ‘सुन्दर’ शब्द भी रख सकते हैं.