भारत में बैडमिंटन के खेल में क्रांतिकारी बदलाव लाने का श्रेय अगर किसी को जाता है, तो निश्चित रूप से वह नाम साइना नेहवाल का ही है. अपने अब तक के करियर में चीन के खिलाड़ियों को, उन्हीं की विशेषज्ञता वाले समझे जाने वाले इस खेल में वे लगातार कई बार हरा चुकी हैं. लंदन में हुए 2012 के ओलम्पिक में उन्होंने कांस्य पदक जीता. दुनिया की नंबर-एक बैडमिंटन खिलाड़ी बनीं. और इस तरह वे भारतीय बैडमिंटन का मौजूदा चेहरा बन सकीं.

दूसरी तरफ पुसरला वेंकट (पीवी) सिंधु, जो खेलती तो अच्छा थीं, मगर उनका प्रदर्शन में निरंतरता की कमी थी. इसलिए वे बीते साल तक साइना के कद की छाया से बाहर नहीं निकल पाई थीं. हालांकि बीते चार साल के उनके सतत संघर्ष का परिणाम रियो ओलम्पिक में सामने आया. उन्होंने रियो में एकल बैडमिंटन प्रतिस्पर्धा का रजत जीतकर न सिर्फ भारतीय बैडमिंटन में इतिहास बनाया, बल्कि अपनी वरिष्ठ खिलाड़ी साइना को भी इस मामले में पीछे छोड़ दिया.

वहीं, चोटों से जूझ रहीं साइना रियो में दुनिया की 61वें नंबर की खिलाड़ी मारिजा यूलिटिना से मुकाबला नहीं कर सकीं और शुरुआती दौर में ही हारकर बाहर हो गईं. उनकी हार और सिंधु की सफलता से, जैसा कि भारत में अक्सर होता है, आलोचक कहने लगे कि साइना का वक्त अब खत्म और सिंधु का शुरू हो चुका है. हालांकि साइना को जानने वाले अच्छी तरह समझते हैं कि उनमें अभी काफी खेल बचा है. बहरहाल, यह चर्चाएं अपनी जगह हैं. लेकिन, इस नए परिदृश्य ने एक काल्पनिक बहस को आधार भी दिया है कि भारत की इन दोनों खिलाड़ियों में कौन दूसरे पर भारी पड़ेगा? हालांकि, इस पर बात करने के लिए दो बिंदुओं को दिमाग में रखना होगा. पहला कि साइना पूरी तरह फिट हों जो कि अब वह करीब साल भर बाद नजर भी आ रही हैं और दूसरा कि दोनों खिलाड़ियों ने पिछले दो साल में किस तरह का प्रदर्शन किया है.

अतीत को देखें तो सिंधु से मुकाबले में साइना ही आगे दिखती हैं

सिंधु के लिए 2015 की शुरुआत मिली-जुली रही. इस साल सुपर सीरीज टूर्नामेंट के शुरुआती दौर में ही वे बाहर हो गईं. लेकिन विश्व चैम्पियनशिप के क्वार्टर फाइनल तक पहुंची और डेनमार्क सुपर सीरीज के फाइनल तक. हालांकि 2015 की ग्रांड प्रिक्स स्पर्धाओं में वे अप्रेक्षाकृत ज्यादा सफल रहीं. वे मलेशिया मास्टर्स ग्रांड प्रिक्स गोल्ड व सैयद मोदी ग्रांड प्रिक्स गोल्ड टूर्नामेंटों के सेमीफाइनल मुकाबलों तक पहुंचीं. जबकि मकाऊ ग्रांड प्रिक्स गोल्ड का खिताब उन्होंने लगातार तीसरी बार जीता. इसके बावजूद उनका प्रदर्शन ऐसा नहीं रहा कि वे सुपर सीरीज मास्टर्स टूर्नामेंट के लिए क्वालीफाई कर सकें. इस प्रतियोगिता में सालभर के भीतर सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले शीर्ष आठ खिलाड़ी हिस्सा लेते हैं. जबकि सिंधु ने 2015 का साल दुनिया की 12वीं खिलाड़ी के तौर पर पूरा किया था.

इसके बजाय सिंधु के लिए 2016 की शुरुआत तुलनात्मक रूप से ठीक रही. इस साल वे इंडिया ओपन और मलेशिया सुपर सीरीज के क्वार्टर फाइनल तक पहुंचीं. जर्मनी, स्विट्जरलैंड और चीन में हुए तीन ग्रांड प्रिक्स गोल्ड टूर्नामेंट में वे शीर्ष आठ खिलाड़यों में शुमार रहीं. फिर मलेशिया मास्टर्स ग्रांड प्रिक्स गोल्ड टूर्नामेंट में उन्होंने खिताबी जीत हासिल की. इन सफलताओं ने उन्हें रियो की ऐतिहासिक रजत-विजय का आत्म-विश्वास दिया, जो स्वाभाविक भी कहा जा सकता है.

साल 2017 की बात करें तो यह साल पीवी सिंधु के लिए काफी ख़ास रहा है. इस साल की शुरुआत उन्होंने सैय्यद मोदी बैडमिंटन ग्रांड प्रिक्स गोल्ड टूर्नामेंट जीतकर की थी. उन्होंने यह टूर्नामेंट पहली बार जीता था. साथ ही वे इस टूर्नामेंट को जीतने वाली दूसरी भारतीय महिला खिलाड़ी भी बनी. इससे पहले साइना नेहवाल यह टूर्नामेंट तीन बार जीत चुकी हैं. इसके बाद इसी साल मार्च में पीवी सिंधु ने इंडिया ओपन सुपर सीरीज भी अपने नाम की. उन्होंने ने यह खिताब ओलंपिक चैंम्पियन स्पेन की कैरोलिना मरीन को हराकर जीता था. 2017 में ही सिंधु ने बैडमिंटन वर्ल्ड चैंपियनशिप में अपने मेडल का रंग भी बदलकर सिल्वर कर लिया. इससे पहले सिंधु साल 2013 और 2014 में वर्ल्ड चैंपियनशिप का कांस्य पदक जीत चुकी हैं.

अपनी इस युवा स्वदेशी प्रतिस्पर्धी की तुलना में साइना नेहवाल के लिए 2015 की शुरुआत बेहद शानदार रही. वे विश्व चैम्पियनशिप के फाइनल तक पहुंचीं. प्रतिष्ठित ऑल इंग्लैंड सुपर सीरीज और चाइना ओपन सुपर सीरीज में फाइनल तक का सफर भी उन्होंने पूरा किया. मलेशियन ओपन के सेमीफाइनल के अलावा वे एशियन चैम्पियनशिप, इंडोनेशियन सुपर सीरीज, ऑस्ट्रेलियन सुपर सीरीज और फ्रेंच ओपन सुपर सीरीज के क्वार्टर फाइनल में भी पहुंचीं. उन्होंने सैयद मोदी ग्रांड प्रिक्स और इंडियन ओपन सुपर सीरीज में खिताबी जीत दर्ज की. अप्रैल, 2015 में वे दुनिया की नंबर एक खिलाड़ी बनीं. हालांकि उन्होंने विश्व वरीयता सूची में दूसरे क्रम पर रहते हुए साल खत्म किया.

साइना के लिए 2016 की शुरुआत भी काफी बढ़िया रही. उन्होंने तीन प्रतिष्ठित प्रतिस्पर्धाओं के सेमीफाइनल में जगह बनाई. जबकि जून में ऑस्ट्रेलियाई ओपन सुपर सीरीज का खिताब भी जीता. लेकिन दुर्भाग्यवश वे ऐन मौके पर चोटिल हो गईं. इसकी वजह से रियो ओलम्पिक के शुरुआती दौर में ही उन्हें हारकर बाहर होना पड़ा.

घुटने की चोट और उसके बाद हुए ऑपरेशन के चलते लम्बे समय तक कोर्ट से बाहर रहीं साइना ने 2017 में जबर्दस्त वापसी की. उन्होंने साल के शुरूआत में मलेशिया ओपन ग्रैंड प्रिक्स गोल्ड खिताब अपने नाम किया. इसके बाद अगस्त में उन्होंने विश्व बैडमिंटन चैंपियनशिप के सेमीफाइनल तक पहुंचकर इसका कांस्य पदक जीता. यह साइना का विश्व चैम्पियनशिप में लगातार दूसरा पदक है. उन्होंने इस टूर्नामेंट के क्वार्टर फाइनल में दुनिया की दूसरी सीड और चौथे नंबर की खिलाड़ी कोरियाई सुंग जी ह्यून को भी मात दी थी. वे इस टूर्नामेंट के क्वार्टर फाइनल में लगातार सात बार पहुंची हैं जो कि एक विश्व रिकॉर्ड है. इसके अलावा खेल विशेषज्ञ साइना के खेल में एक बार फिर वही पुरानी निरंतरता और फुर्ती देख रहे हैं. इन लोगों का मानना है कि साइना एक बार फिर अपने पुराने रंग में लौटती नजर आ रही हैं.

अनुभव मायने रखता है, लेकिन मारक प्रवृत्ति भी

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर साइना 2004 से खेल रही हैं और वे 2009 से लगातार दुनिया के शीर्ष 12 खिलाड़ियों में बनी हुई हैं. उनके नाम अब तक 20 से ज्यादा खिताब दर्ज हो चुके हैं. इनमें से ज्यादातर उन्होंने तब जीते, जब वे खिताबी मुकाबले में पहला गेम हार चुकी थीं. जब प्रतिस्पर्धी खिलाड़ी मैच में बढ़त लेकर गति पकड़ चुका हो, तब बेहद शांत दिमाग से वापसी कर लेना साइना की सबसे बड़ी ताकत और खासियत है. ज्यादातर मुकाबलों में साइना के सामने दुनिया के शीर्ष और ऊंची वरीयता वाले खिलाड़ी थे. फिर भले चाहे वे विश्व में श्रेष्ठतम चीन के खिलाड़ी हों या सुपर सीरीज के फाइनलिस्ट रह चुके प्रतिस्पर्धी. मैदान पर किसी के भी सामने दबाव वाली स्थिति में खेलते हुए भी शानदार तरीके से वापसी कर लेना उन्होंने अपने अनुभव से सीखा है.

दूसरी तरफ, सिंधु अपने से ऊंची रैंकिंग वाले खिलाड़ियों से मुकाबले के मामले में बेहतर स्थिति में नजर आती हैं. जैसे कि चीन की शीर्ष खिलाड़ी ली झुरुई के सामने खेलते हुए उन्होंने दो मैच जीते और तीन हारे. साइना ने भी ली से दो मुकाबले ही जीते लेकिन 12 हारे भी. सिंधु ने अब तक के करियर में अपने से ऊंची पायदान वाले खिलाड़ियों के खिलाफ खेलते हुए 30 से ज्यादा मुकाबले जीते, और 45 से ज्यादा हारे. इनमें कैरोलिना मरीन के साथ हुआ रियो ओलम्पिक का फाइनल और दुनिया की नंबर एक खिलाड़ी रहीं वैंग शिझियान के साथ हुए मुकाबले भी शामिल हैं. सिंधु अब तक के करियर में 16 बार विभिन्न प्रतिस्पर्धाओं के फाइनल में पहुंचीं. इनमें से उन्होंने नौ जीतीं. लेकिन वे अक्सर अहम मौकों पर ठीक स्थिति में होने के बावजूद दबाव में आ जाती हैं, इससे उनके प्रतिस्पर्धी को उन पर हावी होने का मौका मिल जाता है. जैसा कि ओलंपिक फाइनल और पिछले हफ्ते हुई विश्व चैंपियनशिप के फाइनल में भी हुआ.

ताकत और कमजोरी

खेल के लिहाज से साइना अब युवा नहीं कही जा सकतीं. वे 27 साल की हो चुकी है. चुस्ती-फुर्ती के मामले में वे सिंधु से पिछड़ रही हैं. उनका स्मैश (हवा में उछलकर शॉट मारना) कमजोर है. लेकिन संघर्ष करने की योग्यता और शीर्ष पर पहुंचने की भूख के कारण वे इस कमी की भरपाई करती भी नजर आती हैं. वे अब भी देश की शीर्ष बैडमिंटन खिलाड़ी हैं. बैक हैंड (उल्टे हाथ का शॉट) और नेट पर उनका खेल लाजवाब है. वे प्रतिस्पर्धी पर हावी होकर खेलती हैं. ऊंचाई को कभी आड़े नहीं आने देतीं और सामने वाले खिलाड़ी को अमूमन अपनी लय तोड़ने की इजाजत भी नहीं देतीं.

वहीं सिंधु अपनी ऊंचाई का भरपूर फायदा उठाती हैं. मैच के दौरान प्वाइंट हासिल करने के लिए ज्यादा से ज्यादा शॉट लगाने पर ध्यान देती हैं. उनका स्मैश जोरदार है. कोच पुलेला गोपीचंद ने उनके रक्षात्मक खेल पर भी काफी काम किया है. वे आक्रामक हैं और उनके स्ट्रोक्स ताकतवर होते हैं. हालांकि सामने वाला खिलाड़ी अगर जोरदार स्मैश लगा दे तो अक्सर वे उसे संभाल नहीं पातीं.

खेल की मानसिक तैयारी

बीते कुछ साल में सिंधु के सितारे ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बुलंदी की तरफ रुख किया है. उनकी उम्र अभी 22 साल है. उन्होंने अपने रक्षात्मक खेल को बेहतर किया है और दबाव से प्रभावित हुए बिना खेलते रहने की क्षमता भी बढ़ाई है. अब उन्हें सिर्फ प्रतिस्पर्धी के तौर पर नहीं देखा जाता बल्कि चुनौती की तरह समझा जाने लगा है. उनका प्रदर्शन उम्मीद से बेहतर रहा है. मसलन, उनसे शायद ही किसी ने अपेक्षा की होगी कि वे रियो ओलम्पिक से रजत पदक के साथ लौटेंगीं. लेकिन उन्होंने ऐसा कर दिखाया और इससे निश्चित ही उनके आत्म-विश्वास में काफी बढ़ोत्तरी हुई होगी. यही वजह है कि उन्हें अब देश की अगली बैडमिंटन सनसनी समझा जाने लगा है.

वहीं, साइना स्थापित चैम्पियन हैं. हालांकि पिछले कुछ साल में उनका प्रदर्शन एक जैसा नहीं रहा. लेकिन इसकी वजह रही, उनका लगातार चोटिल होना और खेल से इतर दूसरी चीजों में व्यस्तता. शायद इसीलिए वे अब विश्व वरीयता क्रम में नौवें पायदान तक खिसक भी चुकी हैं. पिछले कुछ महीनों में समीक्षकों ने खेल के प्रति उनकी प्रतिबद्धता पर भी सवाल उठाए हैं. उनके बारे में यहां तक कहा जा रहा है कि उनका सर्वश्रेष्ठ समय निकल चुका है. मगर वे इस आलोचना से प्रभावित नजर नहीं आतीं. उनमें वापसी करने की क्षमता है और पहले कई मौकों पर वे ऐसा कर भी चुकी हैँ.

मुकाबला में कौन किस पर भारी पड़ेगा?

निश्चित रूप से फिटनेस, दमदार स्ट्रोक्स और रियो की सफलता से बुलंद हुए हौसले के साथ सिंधु इन मामलों में साइना से आगे दिखती हैं. अपने से ऊंची वरीयता वाली खिलाड़ियों को हराने का उनका रिकॉर्ड भी शानदार है. जब वे अपने मौलिक मिजाज (जो कि खेल में आक्रामकता है) और पूरे कौशल का इस्तेमाल करते हुए खेलती हैं, तो वे किसी को भी हरा सकती हैं. बढ़ा हुआ मनोबल उनकी सबसे बड़ी ताकत है, जो साइना के साथ मुकाबले में भी उनके काम आएगा.

लेकिन दूसरी तरफ, यकीनी तौर पर साइना के पास अनुभव ज्यादा है. उन्होंने ज्यादा संख्या में बड़े मुकाबले खेले हैं. इसीलिए उनमें सामने वाली खिलाड़ी की तमाम चाल-चतुराइयों को समझने की काबिलियत है. इसी काबिलियत की वजह से तनाव के वक्त भी वे दिमाग ठंडा रखती हैं और अंत में मैच का पासा अपनी तरफ पलटकर ही दम लेती हैं. यानी सिंधु के साथ अगर उनका कोई मुकाबला होता है, तो वे अपने इस अनुभव का भरपूर इस्तेमाल करेंगी.

…और इस तरह दोनों भारतीय खिलाड़ियों के बीच मुकाबला बेहद दिलचस्प और नजदीकी होने की उम्मीद है. क्योंकि दोनों का खेल कौशल अलग-अलग खासियतों वाला है. फिर भी समृद्ध अनुभव के बल पर साइना इस काल्पनिक मुकाबले में बढ़त बनाते हुए दिखती हैं.