राजस्थान में विधानसभा का चुनाव होने में अभी सवा साल से भी ज्यादा का वक्त बाकी है, लेकिन सियासी सरगर्मी अभी से शुरू हो गई है. पिछले महीने यानी अगस्त की शुरुआत में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी बाढ़ पीड़ितों से मिलने सूबे के दौरे पर आए. उधर, महीने के आखिर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विकास कार्यों के उद्घाटन-शिलान्यास के सिलसिले में उदयपुर में बड़ी रैली की. कांग्रेस उपाध्यक्ष और प्रधानमंत्री भले ही अलग-अलग वजह से राजस्थान आए, लेकिन दोनों का मकसद एक ही था- विधानसभा चुनाव.

राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी के इन पगफेरों के बीच कांग्रेस और भाजपा की प्रदेश इकाइयां भी ‘इलेक्शन मोड’ में हैं. राजस्थान की राजनीति के लिए यह अस्वाभाविक है, क्योंकि यहां आमतौर पर चुनाव के छह महीने पहले ही इसकी सरगर्मी शुरू होती रही है. असल में जब से प्रदेश में ‘एक बार भाजपा और एक बार कांग्रेस’ का चुनावी चलन शुरू हुआ है, सत्ताधारी दल यह मान लेता है कि उसकी विदाई होनी है और विपक्षी दल यह सोच लोता है कि इस बार उसे ही सत्ता के सिंहासन पर सवार होना है.

इस लिहाज से देखें तो राजस्थान में इस बार कांग्रेस की सरकार बननी चाहिए. लेकिन देशभर में जिस तरह से कांग्रेस की दुर्गति हो रही है और अमित शाह के चुनावी प्रबंधन व नरेंद्र मोदी के चेहरे ने धूम मचा रखी है, उसे देखते हुए इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में राजस्थान की राजनीति में नया ट्रेंड बन जाए. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव का परिणाम काफी हद तक इस पर निर्भर करेगा कि दोनों दल किसके नेतृत्व में मैदान में उतरते हैं.

कांग्रेस की उम्मीद वसुंधरा

कांग्रेस यह मानकर चल रही है कि इस बार सत्ता में आने की बारी उसकी है. पार्टी को लगता है कि सत्ता विरोधी लहर और वसुंधरा राजे की कार्यशैली उसकी नैया पार लगाएगी. भाजपा के कई विधायक ही ‘ऑफ द रिकॉर्ड’ बातचीत में कहते हैं कि भाजपा जो वादे कर सत्ता में आई थी, उनमें से ज्यादातर अधूरे हैं. सरकार के खाते में गिनाने के लिए तो कई उपलब्धियां हैं, लेकिन जमीन और समाज के बड़े तबकों पर इसका असर नहीं है. विशेष रूप से युवा सरकार से खुश नहीं हैं. वसुंधरा राजे से चुनाव से पहले युवाओं को 15 लाख नौकरियां देने का वादा किया था, लेकिन अब तक 50 हजार को भी नौकरी नहीं मिली. सरकार जो भर्तियां निकाली भी, उनमें से ज्यादातर कानूनी पचड़े में फंस गई हैं.

जानकारों के मुताबिक सत्ता के खिलाफ स्वाभाविक नाराजगी के अलावा वसुंधरा राजे की कार्यशैली भी कांग्रेस के लिए आशा की किरण है. संघ खेमे के ही नहीं, राजे के विश्वासपात्र माने जाने वाले नेता भी यह मानते हैं कि मुख्यमंत्री को किसी का दखल बर्दाश्त नहीं है. वे जो भी करती हैं अपनी मर्जी से करती हैं. संघ और भाजपा के कई नेताओं को यह शिकायत लंबे समय से है कि वसुंधरा पार्टी के जमीनी और समर्पित नेताओं व कार्यकर्ताओं की अनदेखी कर रही हैं. यदि यही स्थिति रही तो पार्टी के नेता और कार्यकर्ता एकजुट होकर चुनाव में नहीं उतरेंगे, जिसका खामियाजा नतीजों में देखना पड़ेगा. कांग्रेस को लगता है कि इस स्थिति का लाभ पार्टी को तभी होगा जब भाजपा वसुंधरा राजे के नेतृत्व में चुनाव लड़ेगी.

भाजपा का पायलट प्रेम

भाजपा में भले ही इस बात पर मतभेद हों कि चुनाव वसुंधरा राजे के नेतृत्व में चुनाव लड़ा जाए या नहीं, लेकिन इस बात पर पार्टी की राय एक है कि चुनाव में कांग्रेस की अगुवाई सचिन पायलट करें. भाजपा को लगता है कि यदि चुनाव में अमित शाह, नरेंद्र मोदी और वसुंधरा राजे की साझा रणनीति का मुकाबला सचिन पायलट सरीखे कम अनुभवी नेता से हुआ तो आसानी से फतह हासिल की जा सकती है. असल में भाजपा चाहती है कि चुनावों के समय पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की भूमिका जितनी सीमित होगी, उतना ही उसके लिए अच्छा होगा. पार्टी का मानना है कि अशोक गहलोत के अनुभव और नेटवर्क, दोनों से पार पाना आसान काम नहीं है.

भाजपा को सचिन पायलट की कार्यशैली भी अपने हिसाब से मुफीद लगती है. माना जाता है कि उनकी शैली कुछ-कुछ वसुंधरा राजे जैसी ही है. वसुंधरा की तरह पायलट को भी लोगों से कम मिलना पसंद है. जानकारों के मुताबिक दोनों को लगता है कि ‘ग्लैमर’ की वजह से ही उन्हें राजनीति में तवज्जो मिल रही है और अगर वे लोगों से आसानी से मिलेंगे तो उनका यह ‘ग्लैमर’ कम हो जाएगा. भाजपा ही नहीं, कांग्रेस के भी कई नेता पायलट को ‘कांग्रेस की वसुंधरा’ कहते हैं. प्रदेश कांग्रेस के एक वरिष्ठ पदाधिकारी नाम उजागर न करने की शर्त पर कहते हैं, ‘सचिन पायलट की कार्यशैली की वजह से कार्यकर्ता और नेता उनसे जुड़ नहीं पा रहे. इसका नुकसान चुनाव में भी उठाना पड़ेगा.’

असमंजस में भाजपा नेतृत्व

हालांकि भाजपा ने अभी तक यह घोषणा नहीं की है कि अगले विधानसभा चुनाव में पार्टी का चेहरा कौन होगा, लेकिन मुख्यमंत्री होने के नाते वसुंधरा राजे इसकी स्वाभाविक दावेदार हैं. इसके बावजूद सूबे के सियासी गलियारों में यह चर्चा हमेशा ही गर्म रहती है कि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व वसुंधरा राजे को जल्द ही दिल्ली बुलाकर मोदी मंत्रिमंडल में शामिल करने वाला है. यही नहीं, उनकी जगह मुख्यमंत्री के लिए कभी ओम माथुर के नाम की चर्चा होती है तो कभी अर्जुन मेघवाल की. इस चर्चाओं को हवा देने वाला और कोई नहीं, बल्कि संघ और वसुंधरा से नाराज नेता ही हैं.

इन चर्चाओं के बीच वसुंधरा खेमे के माने जाने वाले प्रदेश अध्यक्ष अशोक परनामी कई बार सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि राजे पूरे पांच साल मुख्यमंत्री रहेंगी और अगला चुनाव भी उन्हीं के नेतृत्व में लड़ा जाएगा. हालांकि पार्टी अध्यक्ष अमित शाह अभी इस मुद्दे पर मौन हैं. सूत्रों के मुताबिक वे अभी न तो वसुंधरा को मुख्यमंत्री पद से हटाने जैसा कड़ा फैसला करेंगे और न ही उन्हें अगले चुनाव का चेहरा घोषित करने सरीखा बड़ा फैसला. वे फिलहाल संतुलन साधने की कोशिश कर रहे हैं. नौ साल से खाली संगठन महामंत्री पद पर चंद्रशेखर मिश्रा की नियुक्ति इसी कवायद की एक कड़ी है.

कांग्रेस आलाकमान की दुविधा

भाजपा नेतृत्व की तरह कांग्रेस आलाकमान भी यह निर्णय नहीं कर पा रहा है कि विधानसभा चुनाव में पार्टी का चेहरा कौन होगा. अब तक अशोक गहलोत और डॉ. सीपी जोशी के बीच खेमेबाजी में जूझती रही कांग्रेस में सचिन पायलट के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद नया गुट बन गया है. इस स्थिति में सबको संतुष्ट करना किसी भी तरीके से संभव नहीं है. सूत्रों के अनुसार आलाकमान फिलहाल किसी को भी मुख्यमंत्री के तौर पर ‘प्रोजेक्ट’ नहीं करने की रणनीति पर विचार कर रहा है. इससे चुनाव तक तो पार्टी सिर-फुटव्वल की स्थिति से बच जाएगी, लेकिन चेहरा घोषित नहीं करने से चुनाव में नुकसान होने का खतरा भी है.

राजनीतिक विश्लेषक यह आशंका भी जताते हैं कि यदि आलाकमान ने ध्यान नहीं दिया तो राजस्थान में भी पंजाब जैसी स्थिति पैदा हो सकती है. पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह ने न सिर्फ खुद को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने की सार्वजनिक रूप से मांग की थी, बल्कि इसे नहीं मानने पर बगावत की चेतावनी भी दी थी. पार्टी को उनकी मांग के सामने झुकना पड़ा था, जो आखिरकार सही निर्णय साबित हुआ. कांग्रेस विधायक विश्वेंद्र सिंह कई बार कह चुके हैं कि पार्टी को चेहरा घोषित कर चुनाव में उतरना चाहिए, इसमें जितनी देर होगी उतना ही नुकसान होगा. यह देखना रोचक होगा कि कांग्रेस आलाकमान इस स्थिति से कैसे निपटता है.