‘वरना क्या बात कर नहीं आती..’ ग़ालिब ने पूछा उनसे जो बात बात में कुछ भी कहने पर कहते हैं आखिर तुम कौन! आखिर बात समझी क्यों नहीं जा रही जो मुझे इतनी सीधी जान पड़ती है? आजिज आकर शायर कहता है कि जब ऐसी हालत हो गई है तो या तो सुननेवाले को कोई और दिल दे या मुझे ही कोई और जुबां दे दे. आखिर बात करना इतना दुश्वार क्यों है?

बातचीत में कहना, सुनना, सोचना, समझना शामिल रहता है. बहस तो उसका ज़रूरी हिस्सा है ही. बहस के मायने क्या हैं?स्कूलों में जो वाद-विवाद प्रतियोगिताएं होती रहती हैं, वे आपको कितना संवाद प्रिय बनाती हैं और कितना विवादी, यह जांच का विषय है. हमने इसपर कभी विचार नहीं किया कि जिस शिक्षा प्रणाली में वाद-विवाद इतना लोकप्रिय हो, वहां से निकले सफल लोग स्वभावतः जी हुजूर क्योंकर हो जाते हैं! अगर हमारी शिक्षा हमें बहस करना सिखाती है तो अपनी ज़िंदगी में हम प्रचलित मत को मानने वालों से सवाल क्यों नहीं पूछ पाते? अक्सर विसंवादी स्वर को अकेले रह जाने की नियति क्यों झेलनी पड़ती है?

वाद-विवाद की स्कूली संस्कृति की एक बड़ी खामी यह भी है कि वह हमें यह सिखाती है कि हर समस्या के सिर्फ दो पक्ष होते हैं. वह स्थिति की जटिलता पर विचार करने से ही हमें रोक देती है. दूसरा यह कि आप किसी भी पक्ष में तर्क दे सकते हैं. आपके अध्यापक आपका पक्ष तय कर देंगे और आपको अपनी वाक कला या वाकपटुता के बल पर प्रतियोगिता जीत लेनी है. इस प्रकार आपको अपना पक्ष चुनने की स्वतंत्रता से तो वंचित कर ही दिया जाता है, वाद-विवाद किसी भी नैतिकता से भी परे हो जाता है. वह इस तरह कि किसी भी विषय या प्रसंग में अपना पक्ष चुनना एक काम है जिसपर वक्त और दिमाग लगाना होता है. पक्ष चुनने के क्रम में ही आप उसके लिए तर्क भी जुटाते हैं. इस अनिवार्य श्रम के अभाव में वाकचातुर्य एक मात्र गुण बन कर रह जाता है जिसे हासिल करना या जिसका अभ्यास करना एक सफल ‘डिबेटर’ बनने की गारंटी है.

जब अमर्त्य सेन भारतीयों को तर्कप्रिय बताते हैं और हम खुशी खुशी इसे भारतीयों के एक सहज गुण के रूप में स्वीकार भी कर लेते हैं तो हम एक अप्रिय सत्य से आंख चुरा लेते हैं. वह यह कि तर्क करने की इजाजत समाज के कई तबकों को रही ही नहीं है. जब यह समाज के बहुलांश के लिए अनुपलब्ध है तो फिर यह हमारा सामाजिक, सांस्कृतिक या राष्ट्रीय स्वभाव कैसे है? किसी भी समस्या की बारीक से बारीक परत को उधेड़ना कला या दक्षता है लेकिन वह अगर अनैतिक नहीं तो नैतिकता से उदासीन अवश्य है. हमारे बड़े से बड़े न्यायवेत्ता ने अपने इर्द गिर्द की भीषण असमानता को न देखा, सामाजिक विभेद को न देखा जो शास्त्रसम्मत थी लेकिन न्याय दर्शन अत्यंत परिष्कृत रूप में विकसित हो सका, यह विडंबना नहीं तो और क्या है! फिर स्त्रियों और बच्चों को जब सवाल करने की छूट ही न हो तो समाज तर्कशील कैसे बने! संस्कृति तो अनुपालन, अनुकरण की है!

यह बात करते हुए अचानक हमारा ध्यान इस पर जाता है कि अगर एक तबके को सोचने की इजाजत नहीं, उसका अधिकार नहीं तो इसके मायने यही हुए कि सोचना व्यक्ति के अकेले के बस का नहीं. हम चलताऊ ढंग से जब यह कहते हैं कि मनुष्य एक चिंतनशील प्राणी है तो साथ ही इस वाक्य को अर्थपूर्ण बनाने के लिए यह भी कहना चाहिए कि प्रत्येक मनुष्य के पास सोचने की क्षमता तो है लेकिन उसके सोच पाने की दूसरी शर्तें भी हैं. वे कौन सी शर्तें हैं?

यह किसी एक के बस की बात नहीं कि वह किसी भी एक समस्या से जुड़ी हर चीज़ से वाकिफ हो. हर चीज़ एक संदर्भ में होती है और उसका एक परिप्रेक्ष्य भी होता है

यह किसी एक के बस की बात नहीं कि वह किसी भी एक समस्या से जुड़ी हर चीज़ से वाकिफ हो. हर चीज़ एक संदर्भ में होती है और उसका एक परिप्रेक्ष्य भी होता है. ये दोनों ही इकहरी या सरल अवधारणाएं नहीं हैं. किसी एक शख्स के लिए क्या यह मुमकिन है कि वह दुनिया की हर चीज़ के बारे में सब कुछ जान सके? अगर ऐसा नहीं है तो इसका मतलब यह है कि हमें जानने और सोचने के लिए अपने अलावा और भी लोगों और संस्थाओं की ज़रूरत है.

हाल में स्टीवन स्लोमन (ब्राउन यूनिवर्सिटी) और फिलिप फर्नबक (यूनिवर्सिटी ऑफ़ कॉलराडो) की एक किताब आई है, ‘द नॉलेज इल्यूज़न’. इसमें वे कहते हैं कि मनुष्य को अकेले नहीं सामूहिक रूप से सोचने की आदत है. वैयक्तिक रूप से सोचने की बात ही छलावा है. मनुष्य दूसरे प्राणियों से इस वजह से ही कुछ लाभ की स्थिति में है कि वह समूह में सोचता है.

मानव सभ्यता के दिन बीतने के साथ उसके विकसित होने का भ्रम तो है ही, आज के इंसान को यह खुशफहमी भी है कि वह पहले के इंसान के मुकाबले ज़्यादा जानता है. इन विद्वानों के मुताबिक असलियत यह है कि वह पहले के इंसान के मुकाबले किसी एक चीज़ में बारे में कहीं कम जानता है. क्योंकि अपने लिए हर चीज़ वही नहीं सोचता. यह काम और लोग उसके लिए किया करते हैं.

सामूहिकता एक लिहाज से अच्छी चीज़ भी है और बुरी भी. बुरी इसलिए कि यह देखा गया है कि किसी मसले पर अगर आप किसी एक शख्स को ऐसे अकाट्य तथ्य भी दे दें जिनके चलते तार्किक रूप से उसकी राय बदल जानी चाहिए तो भी अकसर ऐसा होता नहीं. वह जिस समुदाय या समूह का सदस्य है अगर वह अपनी राय उस मामले में नहीं बदलता तो इसकी गुंजाइश बहुत कम है कि तर्क से सहमत होते हुए भी वह व्यक्ति अपनी राय बदल दे. वह पहले की तरह अपने समूह के मुताबिक़ ही चलना तय करेगा. प्रायः देखा गया है कि अगर आप तथ्यों की बौछार भी कर दें तो राय नहीं बदली जाएगी. अपनी राय के खिलाफ तथ्य अक्सर पसंद नहीं किए जाते और यह मानना लोगों के लिए अपमानजनक है कि अब तक वे अतार्किक थे, या सादा ढंग से कहें तो मूर्ख थे. इसलिए वे पहले की राय पर ही अडिग रहना चाहेंगे.

अच्छा पक्ष इस सामूहिकता का यह है कि अगर हम सावधान रहें तो शुरुआत से ही इसका अभ्यास बनाया जा सकता है कि सोचने और राय बनाने के क्रम में किनकी किनकी सहायता अनिवार्यतः लेनी है. लेकिन यहां यह भी ज़रूरी होगा कि सोचने और तर्क निर्माण के कार्य में जिनकी भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है, वे अपनी जिम्मेवारी और जवाबदेही को लेकर सजग और ईमानदार हों. मसलन, अगर मुझे सरकार की तरफ से आंकड़े ही गलत दिए जाएंगे तो शिक्षा हो या स्वास्थ्य, मैं किसी के बारे में ठीक राय नहीं बना सकूंगा. यहीं अखबारों या सारे जनसंचार माध्यमों की भूमिका अहम हो उठती है. विश्वविद्यालयों और शोष संस्थानों की तो है ही. उनका काम ही है समाज को सोचने में मदद करना.

यह भी ज़रूरी होगा कि सोचने और तर्क निर्माण के कार्य में जिनकी भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है, वे अपनी जिम्मेवारी और जवाबदेही को लेकर सजग और ईमानदार हों

संस्थान जब अपने इस दायित्व को निभाने में कोताही करने लगते हैं या जानबूझ कर बेईमानी करते हैं तो समाज का दिग्भ्रमित होना स्वाभाविक है. समाज के ज्यादातर लोगों के पास इन संस्थानों के बराबर के साधन होना नामुमकिन है. ज्ञान और जानकारी के क्षेत्र में लगे संस्थानों का इसीलिए सत्ता से स्वतन्त्र होना आवश्यक है.

सत्ता का दावा खुद एक बड़े ज्ञानसर्जक का होता है. उसके द्वारा दी गई जानकारी और ज्ञान को अंतिम मान लेना ही जनता के लिए आसान है. इसी जगह विश्वविद्यालयों और जनसंचार माध्यमों को हस्तक्षेप करना होता है. वे सत्ता के दावों की अपनी विशेषज्ञता के सहारे जांच करते हैं और जांच की पद्धति से भी साधारण जनता को परिचित कराते हैं.

स्कूली पाठ्यपुस्तकें इसी कारण लोगों की निगाह में धर्मग्रंथ से कम दर्जा नहीं रखती हैं. वयस्क हो जाने के बाद भी स्कूली किताब के सहारे, जो आधिकारिक ज्ञान-स्रोत मानी जाती है, निर्मित नज़रिया मुश्किल से बदलता है. और आगे जब भी ऐसा होता है तो वह सदमे से कम नहीं होता.

अभी अमरीका में हमने इन संस्थानों को अपना काम करते देखा. हार्वर्ड विश्वविद्यालय के तीन अध्यापकों ने , जो मनोविश्लेषक हैं, चेतावनी दी कि उनके ज्ञान के मुताबिक़ डोनाल्ड ट्रंप में जो लक्षण देखे जा रहे हैं वे एक अस्थिर मस्तिष्क वाले व्यक्ति के ही हो सकते हैं जिसे राष्ट्रपति नहीं बनना चाहिए. यह बिलकुल अलग बात है कि इन विशेषज्ञों की राय का ट्रंप समर्थकों पर कोई असर शायद ही पड़ा हो.लेकिन कम से कम उन्होंने अमरीकी समाज को इस मामले में सोचने में सहायता पहुंचाने का कर्तव्य तो पूरा किया. यह पर्याप्त न हो, आवश्यक या अनिवार्य अवश्य है.

जनसंचार माध्यमों का काम इसी तरह का है. साधारण जन उनके सहारे अपनी समझ बनाते हैं. क्या ये माध्यम अपने प्रति लोगों की इस अपेक्षा से वाकिफ हैं? या वाकिफ होने के कारण ही वे अपनी सत्ता का किसी हित में दुरुपयोग कर रहे हैं?

भारत में अंग्रेज़ी जनसंचार माध्यम का रुतबा है लेकिन उसकी पहुंच सीमित है. भाषाओं में काम करने वाले माध्यम क्या कह सकते हैं कि उन्होंने सोचने में अपने समाज की मदद की है? या, उन्होंने सोचने की प्रक्रिया को गड्डमड्ड ही किया है?

जो भी हो, सब कुछ होने के बाद भी जब एक बातचीत का नया रास्ता, एक नया ठिकाना खुलता या न्योता देता दीखता है तो उसे ईमानदार मानने की ही इच्छा होती है. यह हर किसी के लिए परीक्षा का अवसर भी है.