नरेंद्र मोदी सरकार के तीसरे मंत्रिमंडल विस्तार की सबसे बड़ी वजह यह बताई जा रही थी कि कई मंत्रालयों का अतिरिक्त प्रभार दूसरे मंत्रियों के पास है और ऐसे में अगर ठीक से सरकार चलानी है तो उनका बोझ कम करना चाहिए. इसके अलावा दूसरी वजह के तौर पर इस साल गुजरात और हिमाचल प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों को बताया जा रहा था. लेकिन रविवार को जो मंत्रिमंडल विस्तार हुआ और विभागों के बंटवारे की जो अंतिम सूची सामने आई, उससे पता चलता है कि यह मंत्रिमंडल विस्तार मोदी सरकार के अब तक के तीन मंत्रिमंडल विस्तार में सबसे अजीबोगरीब है.
अजीबोगरीब फेरबदल
आज के मंत्रिमंडल विस्तार की सबसे चौंकाने वाली बात रही निर्मला सीतारमन को रक्षा मंत्री बनाना. इस नई नियुक्ति से पहले वे व्यापार एवं वाणिज्य मंत्रालय का काम स्वतंत्र प्रभार वाली राज्य मंत्री के तौर पर संभाल रही थीं. ऐसे में उनका प्रमोशन करके न सिर्फ उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाया गया बल्कि रक्षा जैसा बेहद संवेदनशील और बड़ा मंत्रालय भी दे दिया गया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस निर्णय को कुछ उसी तरह का बताया जा रहा है जैसा उन्होंने प्रधानमंत्री बनते वक्त स्मृति ईरानी को मानव संसाधन विकास मंत्रालय देकर किया था.
ऐसे ही रेल मंत्री के तौर पर पीयूष गोयल की नियुक्ति की सराहना तो हर कोई कर रहा है, लेकिन असल सवाल यह है कि नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में जिस तरह का काम वे कर रहे थे, अब उसका क्या होगा. अब यह मंत्रालय पूर्व गृह सचिव आरके सिंह को दिया गया है. खास तौर पर ऐसे समय में, जब भारत का लक्ष्य 2022 तक 175 गीगावाॅट बिजली नवीकरणीय स्रोतों से बनाने का है, इस तरह के फेरबदल का मतलब बहुत लोगों को समझ में नहीं आ रहा.
प्रशासनिक बोझ जस का तस
एक ही मंत्री पर एक से अधिक मंत्रालय का बोझ होने को मंत्रिमंडल विस्तार की बड़ी वजह बताया जा रहा था. लेकिन इस मंत्रिमंडल विस्तार के बाद भी यह स्थिति बनी हुई है. अनिल माधव दवे के निधन के बाद हर्षवर्धन के पास पर्यावरण मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार था. अब भी यह मंत्रालय उनके पास है. ऐसे ही वेंकैया नायडू के उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनने के बाद सूचना और प्रसारण मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार स्मृति ईरानी को दिया गया था. अब भी यह मंत्रालय उनके पास रहा. सड़क परिवहन, राजमार्ग और पोत परिवहन मंत्रालय संभाल रहे नितिन गडकरी को जल संसाधन और गंगा पुनरुद्धार मंत्रालय का अतिरिक्त भार दे दिया गया है, जबकि उनके पहले के मंत्रालय में उनके काम की तारीफ हो रही थी. अब ऐसे में इतने मंत्रालयों में गडकरी अच्छा प्रदर्शन कैसे बनाए रखेंगे, यह देखने वाली बात होगी.
चुनावी समीकरणों की उपेक्षा
इस साल गुजरात और हिमाचल प्रदेश में होने वाले चुनावों को देखते हुए यह लग रहा था कि इन दोनों राज्यों के कुछ मंत्रियों को कैबिनेट में शामिल किया जा सकता है. यह भी लग रहा था गुजरात के कुछ मंत्रियों का प्रमोशन हो सकता है. लेकिन इस मंत्रिमंडल विस्तार में ऐसा कुछ नहीं हुआ. मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान से भी किसी राजनीतिक प्रभाव वाले चेहरे को शामिल नहीं किया गया. अगर चुनावी राज्यों से देखें तो सिर्फ एक मंत्री कर्नाटक से बनाए गए हैं. इससे साफ है कि इस बार के मंत्रिमंडल विस्तार में प्रधानमंत्री ने चुनावी समीकरणों का बिल्कुल ध्यान नहीं रखा. जबकि पहले के फेरबदल में चुनावी राज्यों का समीकरण साधने की स्पष्ट कोशिश दिखती थी. कहां तो बिहार से मंत्रियों की संख्या कम करने की बात हो रही थी, लेकिन एक मंत्री हटाने के बदले बिहार से दो मंत्री लाए गए.
खराब मानव संसाधन प्रबंधन
कई वैसे मंत्रालयों में जहां पहले से ही कम काम था, वहां एक से अधिक राज्य मंत्री बनाए गए हैं. वहीं कुछ ऐसे मंत्रालयों में, जिनके मुखिया को दूसरा मंत्रालय भी मिला, वहां राज्य मंत्रियों की संख्या घटाई गई है. उदाहरण के तौर पर नितिन गडकरी के सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय को लें. गडकरी को जल संसाधन भी मिला. इस नाते उनके पास काम बढ़ना तय है. लेकिन उनके सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय में जहां पहले से दो राज्य मंत्री थे, वहीं अब सिर्फ एक राज्य मंत्री रहेंगे. इस तरह के उदाहरणों से कई मंत्रालय भरे पड़े हैं. कहीं-कहीं तीन-तीन राज्य मंत्री हैं तो कहीं सिर्फ एक राज्य मंत्री हैं.
सहयोगी दलों का साथ नहीं
इस मंत्रिमंडल विस्तार में जितने भी नए चेहरे लाए गए, वे सभी भाजपा के हैं. सहयोगी दलों से कोई भी नया चेहरा लाने की जहमत प्रधानमंत्री मोदी ने नहीं उठाई. यहां तक की अपने नए सहयोगी नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड (जदयू) को भी मंत्रिमंडल में नरेंद्र मोदी ने जगह नहीं दी. जबकि चर्चा थी कि दो मंत्री जदयू से आ सकते हैं. जदयू से नए मंत्रियों को लाने के बदले नरेंद्र मोदी ने बिहार से भाजपा के दो नए मंत्री लाने का निर्णय लिया. ऐसे ही अन्नाद्रमुक के केंद्र सरकार में शामिल होने को लेकर भी चर्चाएं थीं. लेकिन उन्हें भी जगह नहीं दी गई. पहले से सरकार में शामिल भाजपा के दूसरी सहयोगी दलों के किसी भी मंत्री को प्रमोशन नहीं दिया गया
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